मोदी-अडानी रिश्ते और अमेरिकी SEC समन विवाद: एक विस्तृत विश्लेषण

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Ajit Kumar

भारत
मोदी-अडानी रिश्ते और अमेरिकी SEC समन विवाद: एक विस्तृत विश्लेषण

SEC समन में देरी और मोदी सरकार की भूमिका पर सवाल

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 24 जनवरी 2026 भारतीय राजनीति और कॉरपोरेट जगत के रिश्तों पर सवाल कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब ये सवाल अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचता हैं, तो उनका महत्व और प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है. कांग्रेस नेता और प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के हालिया X (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उद्योगपति गौतम अडानी के संबंधों को लेकर गंभीर बहस छेड़ दिया है. यह लेख उसी पोस्ट के हवाले से तथ्यों, आरोपों और उनके व्यापक राजनीतिक‑आर्थिक संदर्भ का विश्लेषण करता है.

मोदी‑अडानी दोस्ती पर उठते सवाल

सुप्रिया श्रीनेत के अनुसार, आने वाली पीढ़ियाँ मोदी‑अडानी दोस्ती को एक मिसाल के रूप में देखेंगी.आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी ने न केवल अडानी समूह के व्यावसायिक हितों को संरक्षण दिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्हें कानूनी कार्रवाई से बचाने की कोशिश की है .यह दावा भारतीय लोकतंत्र, शासन प्रणाली और कॉरपोरेट जवाबदेही जैसे मूलभूत प्रश्नों को सामने लाता है.

अमेरिकी SEC का समन और 14 महीनों की देरी

पोस्ट के अनुसार, अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (SEC) पिछले 14 महीनों से अडानी समूह को समन देने की कोशिश कर रहा था. SEC ने अदालत में यह कहा कि भारत सरकार के सहयोग न करने के कारण यह समन अडानी तक नहीं पहुँच पाया.यह आरोप यदि सही साबित होता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून और पारदर्शिता के सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है.

फरवरी 2025 से SEC हेग कन्वेंशन के तहत कानूनी प्रक्रिया का पालन कर रहा था, लेकिन आरोप है कि भारत सरकार के क़ानून मंत्रालय ने बार‑बार इसमें बाधा डाली.अंततः अब SEC ई‑मेल के माध्यम से नोटिस भेजने की तैयारी कर रहा है, जो यह दर्शाता है कि मामला किस हद तक गंभीर हो चुका है.

बॉन्ड, निवेश और रिश्वतखोरी के आरोप

सुप्रिया श्रीनेत के पोस्ट में यह भी दावा किया गया है कि सितंबर 2021 में अडानी समूह ने बॉन्ड के माध्यम से अमेरिकी निवेशकों से 1600 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जुटाई.आरोप है कि इसी धन का उपयोग भारत में रिश्वत देकर विभिन्न परियोजनाएँ हासिल करने के लिए किया गया.

इन्हीं आरोपों के आधार पर अडानी समूह के खिलाफ अमेरिका में धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी का मामला दर्ज किया गया है.यह मामला केवल एक कारोबारी समूह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक निवेशकों के भरोसे और भारत की छवि से भी जुड़ा हुआ है.

सरकार की भूमिका पर सवाल

इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल भारत सरकार की भूमिका को लेकर उठता है. यदि किसी निजी कारोबारी समूह के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी प्रक्रिया चल रही है, तो क्या सरकार का दायित्व नहीं बनता कि वह निष्पक्ष सहयोग करे? सुप्रिया श्रीनेत का आरोप है कि मोदी सरकार ने अडानी समूह को बचाने के लिए कानूनी अड़चनें पैदा कीं.

यह स्थिति विपक्ष को यह कहने का मौका देती है कि देश में कानून सबके लिए समान नहीं है. जब आम नागरिकों और छोटे व्यापारियों पर नियमों की सख्ती दिखाई देती है, तब बड़े कॉरपोरेट घरानों को कथित तौर पर विशेष संरक्षण मिलना लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है.

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लोकतंत्र और जवाबदेही का प्रश्न

यह मामला केवल राजनीतिक आरोप‑प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है. यह भारत में कॉरपोरेट‑राजनीतिक गठजोड़, संस्थानों की स्वतंत्रता और जवाबदेही के व्यापक प्रश्नों से जुड़ा है.यदि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ यह महसूस करती हैं कि उन्हें भारत सरकार से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा, तो इसका असर देश की वैश्विक साख पर भी पड़ सकता है.

विपक्ष की रणनीति और जनचर्चा

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं. उनका कहना है कि मोदी सरकार के रहते अडानी पर कोई आंच नहीं आ सकती. समन पहुँचाना तो दूर, आरोपों की निष्पक्ष जांच भी संभव नहीं है.यह मुद्दा आने वाले समय में संसद से लेकर सड़क तक राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है.

निष्कर्ष

सुप्रिया श्रीनेत के X पोस्ट के हवाले से उठे ये आरोप भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था के संवेदनशील पहलुओं को उजागर करता हैं. चाहे ये आरोप सिद्ध हों या नहीं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और कानून के समान पालन की मांग लोकतंत्र की बुनियाद है. आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन सवालों का जवाब किस तरह देती है और क्या अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत अपनी जवाबदेही और विश्वसनीयता बनाए रख पाता है.

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