बाबा साहेब की स्मृतियों वाली धरती से उठा संवैधानिक चेतना का स्वर
तीसरा पक्ष ब्यूरो आगरा — उत्तर प्रदेश के आगरा में आयोजित संवैधानिक अधिकार बचाओ, भाईचारा बनाओ” महारैली ने देश की राजनीति और सामाजिक चेतना में एक नया संदेश दिया है. जिस धरती पर 70 वर्ष पहले परम पूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की आंखों से आंसू गिरे थे, उसी ऐतिहासिक स्थल पर हजारों लोगों की मौजूदगी ने इस महारैली को ऐतिहासिक बना दिया.
भीम आर्मी प्रमुख और आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद ने इस जनसमर्थन के लिए आगरा की जागरूक जनता का हृदय से आभार व्यक्त किया.

संविधान और भाईचारे की रक्षा का संकल्प
महारैली का मुख्य उद्देश्य संविधान की मूल भावना—न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व—की रक्षा करना था. चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने संदेश में कहा कि आज देश में संविधानिक मूल्यों को कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं, ऐसे समय में जनता का जागरूक होना और एकजुट होना बेहद जरूरी है.
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह महारैली किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि हर उस नागरिक के लिए थी जो लोकतंत्र और संविधान में विश्वास रखता है.
ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ा जनआंदोलन
आगरा का यह आयोजन सिर्फ एक राजनीतिक सभा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के इतिहास से जुड़ा एक भावनात्मक क्षण भी था. बाबा साहेब आंबेडकर की पीड़ा और संघर्ष को याद करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज भी दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और वंचित वर्ग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
महारैली में शामिल लोगों ने संविधान की रक्षा और आपसी भाईचारे को मजबूत करने का संकल्प लिया.
चंद्रशेखर आज़ाद का संदेश
चंद्रशेखर आज़ाद ने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा,
आगरा की धरती पर आयोजित ‘संवैधानिक अधिकार बचाओ, भाईचारा बनाओ’ महारैली को ऐतिहासिक रूप से सफल बनाने के लिए आप सभी का हृदय से आभार.आगरा की सम्मानित जागरूक जनता को कोटि-कोटि साधुवाद.
उनके इस संदेश ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह आंदोलन जनता की भागीदारी से आगे बढ़ रहा है।
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राजनीतिक और सामाजिक असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह महारैली उत्तर भारत में सामाजिक न्याय की राजनीति को नई ऊर्जा दे सकती है.बड़ी संख्या में युवाओं, महिलाओं और सामाजिक संगठनों की भागीदारी ने यह संकेत दिया है कि संविधान और अधिकारों को लेकर जनचेतना तेज़ी से बढ़ रही है.
निष्कर्ष
आगरा की ऐतिहासिक महारैली ने यह साबित कर दिया कि जब संविधान और भाईचारे की बात आती है, तो जनता एकजुट होकर आवाज़ उठाती है. बाबा साहेब की स्मृतियों से जुड़ी इस धरती से उठी आवाज़ आने वाले समय में देश की राजनीति और सामाजिक आंदोलन को नई दिशा दे सकती है.

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