नेहा सिंह राठौर ने कानून, सम्मान और समानता पर उठाए सवाल
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,26 जनवरी — लोक गायिका और सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहने वाली नेहा सिंह राठौर के एक X (पूर्व में Twitter) पोस्ट ने देश में समानता, सम्मान, जातिगत भेदभाव और सामाजिक न्याय को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है. अपने पोस्ट में नेहा सिंह राठौर ने उन कानूनों का जोरदार समर्थन किया है, जिनका उद्देश्य समाज के वंचित और कमजोर वर्गों को सम्मान और सुरक्षा प्रदान करना है.
उनका यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब देश में कुछ कानूनों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रहा हैं.
कानून से दिक्कत किसे होती है? — बयान का मूल संदेश
नेहा सिंह राठौर ने अपने पोस्ट में सवाल उठाया है कि.चोरी के खिलाफ कानून से दिक्कत चोर को ही होती है,अत्याचार के खिलाफ नियम से परेशानी अत्याचारी को,और भेदभाव रोकने वाले कानूनों का विरोध वही करता है जो भेदभाव करता है.
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई कानून किसी वर्ग या समूह के सम्मान और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए बनाया गया है, तो उस पर आपत्ति करना अपने-आप में सवालों के घेरे में आता है.
जातिगत भेदभाव को,पुरानी बीमारी बताया
नेहा सिंह राठौर ने जातिगत भेदभाव को भारतीय समाज के पुरानी और गहरी बीमारी बताते हुये कहा है कि,
पुरानी बीमारियों का इलाज अक्सर कड़वी दवाइयों से ही होता है.
उन्होंने SC-ST एक्ट और आरक्षण व्यवस्था का उदाहरण देते हुए कहा है कि इन दोनों व्यवस्थाओं का भी अपने समय में तीखा विरोध हुआ था, लेकिन समय ने साबित किया कि इनसे समाज की सेहत में सुधार ही आया है.
कहीं विशेषाधिकार छिनने का डर तो नहीं?
पोस्ट में एक तीखा सवाल उठाते हुये नेहा सिंह राठौर लिखती हैं कि,
कहीं कुछ लोग इसलिए नाराज़ तो नहीं हैं क्योंकि अब वे दूसरों को अपमानित नहीं कर पाएंगे?
या फिर उन्हें यह डर सता रहा है कि उनका अवैध सामाजिक विशेषाधिकार खत्म होने वाला है?
यह सवाल मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में एक अहम बिंदु बनकर उभरा है.
संविधान और हकीकत के बीच की खाई
नेहा सिंह राठौर ने अपने बयान में भारतीय संविधान का हवाला देते हुये कहा है कि,संविधान समानता के सिद्धांत पर आधारित है, लेकिन वास्तविकता यह है कि,देश का हर नागरिक आज भी बराबर सम्मान नहीं पाता है.
उन्होंने यह भी कहा कि बीते वर्षों में अगर कोई एक काम सही दिशा में हुआ है, तो उस पर भी कुछ वर्गों द्वारा विरोध किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है.
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राष्ट्रवाद बनाम बुनियादी मुद्दे
अपने पोस्ट में नेहा सिंह राठौर ने उन लोगों पर भी निशाना साधा है जो,राष्ट्रवाद के नाम पर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों से समझौता करने को तैयार रहता हैं.
उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि ये वही यही लोग है जो ,नागरिकों की लिंचिंग को सही ठहराते हैं.
सरकार से सवाल पूछने वालों को देशद्रोही बताते हैं,और अब जब कोई कानून नागरिकों के आत्मसम्मान को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, तो वही लोग उसका विरोध कर रहे हैं.
मजबूत देश की बुनियाद सम्मान है
नेहा सिंह राठौर के अनुसार, जब तक देश का हर नागरिक गौरव, सम्मान और आत्मविश्वास महसूस नहीं करेगा, तब तक देश वास्तव में मजबूत नहीं हो सकता है .
उन्होंने यह भी कहा कि देशवासियों के आत्मसम्मान को बढ़ाने वाला कोई भी कानून देशहित में होता है, और ऐसे कानूनों के खिलाफ बोलना अप्रत्यक्ष रूप से देशहित के खिलाफ खड़ा होना है.
रोहित वेमुला का संदर्भ और भावनात्मक अपील
पोस्ट के अंत में नेहा सिंह राठौर ने वीडियो का उल्लेख किया, जिसमें, पक्षपात के शिकार स्वर्गीय रोहित वेमुला की प्रतिमा के साथ उनकी माता नजर आती हैं.
यह संदर्भ पूरे बयान को एक भावनात्मक और सामाजिक संदर्भ प्रदान करता है, जो समानता और सम्मान की बहस को और गहरा करता है.
निष्कर्ष
नेहा सिंह राठौर का यह बयान केवल एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं, बल्कि,सामाजिक न्याय, समानता और नागरिक सम्मान पर एक व्यापक टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है.
उनका साफ संदेश है कि,सबसे पहले देश है, जाति-बिरादरी बाद में.
ऐसे समय में जब समाज कई स्तरों पर बंटा हुआ दिखाई देता है, यह बयान एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि
क्या हम सच में एक समान और सम्मानजनक समाज की ओर बढ़ रहे हैं, या बदलाव से डर रहा हैं?
नोट :यह समाचार Neha Singh Rathore (@nehafolksinger) के X (Twitter) पर प्रकाशित आधिकारिक पोस्ट के आधार पर तैयार किया गया है.

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