UGC के नए नियमों पर रोक से बहुजन समाज में बढ़ा असंतोष
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,30 जनवरी — सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक न्याय से जुड़े विमर्श को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है. यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) से जुड़े नियमों पर दिया गया इस निर्णय को लेकर बहुजन समाज में गहरा असंतोष देखने को मिल रहा है.आरजेडी की राष्ट्रीय प्रवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंका भारती के एक्स (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट ने इस असंतोष को सार्वजनिक स्वर दिया, जिसके बाद यह मुद्दा तेजी से चर्चा में आ गया.
यह लेख UGC एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की पृष्ठभूमि, इसके सामाजिक प्रभाव, बहुजन समाज के विरोध के कारणों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का विस्तृत व संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करता है.
UGC एक्ट क्या है?
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) अधिनियम, 1956 के तहत गठित एक वैधानिक संस्था है, जिसका उद्देश्य भारत में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, समन्वय और मानकों को बनाए रखना है. UGC समय-समय पर विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नियम और विनियम जारी करता है.
वर्ष 2012 में UGC ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की रोकथाम के लिए विशेष नियम बनाए थे. इन नियमों का उद्देश्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को संस्थागत भेदभाव से सुरक्षा देना था. इसमें शिकायत निवारण प्रणाली, अनुशासनात्मक कार्रवाई और जवाबदेही तय करने जैसे प्रावधान शामिल थे.
2026 के नए विनियम और उनका उद्देश्य
2026 में UGC द्वारा Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations नाम से नए नियम अधिसूचित किया गया इन नियमों का उद्देश्य था.
जातिगत भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा तय करना
हर संस्थान में अनिवार्य शिकायत समिति बनाना
भेदभाव, बहिष्कार और उत्पीड़न जैसे मामलों में कड़ी कार्रवाई
संवेदनशील मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करना
बहुजन समाज के कई संगठनों ने इन नियमों को उच्च शिक्षा संस्थानों में व्याप्त संस्थागत भेदभाव के खिलाफ एक मजबूत कदम माना.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: क्या कहा गया?
29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने UGC के 2026 के नए विनियमों पर अंतरिम रोक लगा दिया है. अदालत ने कहा कि इन नियमों के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता की जांच आवश्यक है. कोर्ट ने तब तक 2012 के पुराने नियमों को लागू रखने का निर्देश दिया है.
अदालत की प्रमुख चिंता यह थी कि नए नियम समाज में विभाजन की भावना को बढ़ा सकता हैं और सभी वर्गों के लिए समान कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करता है.
बहुजन समाज क्यों कर रहा है विरोध?
बहुजन समाज – जिसमें दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग शामिल हैं – इस फैसले को अपने अधिकारों की सुरक्षा में कमी के रूप में देख रहा है. विरोध के प्रमुख कारण हैं.
संस्थागत भेदभाव की वास्तविकता
उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं, जिनका असर सबसे अधिक वंचित वर्गों पर पड़ता है.
नए नियमों से उम्मीदें
2026 के विनियमों को बहुजन समाज ने सुरक्षा कवच के रूप में देखा था. स्टे लगने से उन्हें यह सुरक्षा कमजोर होती प्रतीत हो रही है.
आवाज़ दबने की आशंका
प्रदर्शनकारियों का मानना है कि यह फैसला सामाजिक रूप से शक्तिशाली वर्गों के दबाव में लिया गया है.
दिल्ली सहित कई विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी और ज्ञापन सौंपे जाने की खबरें सामने आई हैं.
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राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस फैसले पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग रहा हैं.
कुछ दलों ने फैसले को सामाजिक संतुलन के लिए जरूरी बताया है .
बहुजन राजनीति से जुड़े दलों और संगठनों ने इसे सामाजिक न्याय के खिलाफ करार दिया है .
वामपंथी संगठनों ने इसे वंचित वर्गों के अधिकारों पर आघात बताया है .
यह मतभेद दर्शाता है कि शिक्षा और जाति का सवाल आज भी भारतीय राजनीति का संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है.
आगे की राह: संभावित समाधान
विशेषज्ञों के अनुसार, इस विवाद का समाधान संतुलित दृष्टिकोण से ही संभव है.
शिकायत तंत्र को सभी वर्गों के लिए पारदर्शी और प्रभावी बनाना
बहुजन समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना
संस्थानों में संवेदनशीलता और जागरूकता कार्यक्रम बढ़ाना
नियमों की संवैधानिक समीक्षा के साथ सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखना
निष्कर्ष
UGC एक्ट से जुड़े नियमों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे उत्पन्न बहुजन समाज का असंतोष भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. प्रियंका भारती का बयान इस व्यापक सामाजिक भावना का प्रतीक बन गया है.
शिक्षा समानता और सामाजिक न्याय की नींव है. ऐसे में आवश्यक है कि नीतियां सभी को सुरक्षा दें और किसी भी वर्ग को हाशिये पर न धकेलें.

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