यूजीसी रेगुलेशन 2026 पर रोक के खिलाफ आइसा-आरवाईए का देशव्यापी प्रतिवाद
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,31 जनवरी 2026 शैक्षणिक संस्थानों में जातीय, सामाजिक और लैंगिक भेदभाव के बढ़ते मामलों के बीच यूजीसी रेगुलेशन 2026 पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक को लेकर देशभर में विरोध तेज हो गया है. इसी कड़ी में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) और रिवोल्यूशनरी यूथ एसोसिएशन (RYA) के संयुक्त आह्वान परआज देशव्यापी प्रतिवाद दिवस मनाया गया.पटना के कारगिल चौक पर आयोजित विरोध सभा में छात्र-युवाओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अत्याचार किसी भी स्थिति में अधिकार नहीं हो सकता और समानता की मांग को प्रतिशोध कहना असंवैधानिक है.

सामाजिक न्याय के विरुद्ध है यूजीसी रेगुलेशन पर रोक
सभा को संबोधित करते हुए आइसा की राज्य अध्यक्ष प्रीति कुमारी ने कहा कि यूजीसी रेगुलेशन 2026 पर सुप्रीम कोर्ट की रोक सामाजिक न्याय, समानता और संविधान के मूल मूल्यों के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थान लंबे समय से जातीय भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और लैंगिक असमानता जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा हैं.ऐसे में भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों पर रोक लगाना छात्रों के अधिकारों को कमजोर करता है.
उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी, अल्पसंख्यक और वंचित तबकों के छात्रों को आज भी संस्थागत भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है .
यूजीसी एक्ट 2026 भेदभाव पर अंकुश का प्रयास था
आरवाईए के राज्य सह-सचिव विनय कुमार और आइसा के राज्य सह-सचिव कुमार दिव्यम ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि यूजीसी रेगुलेशन 2026 का उद्देश्य शिक्षा परिसरों में भेदभाव और उत्पीड़न पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना था.यह नियम छात्रों के लिए शिकायत निवारण की स्पष्ट व्यवस्था, जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम था.
उनका कहना था कि इस रेगुलेशन पर रोक लगाकर पहले से मौजूद असमानताओं को और मजबूत किया जा रहा है. उन्होंने केंद्र सरकार और न्यायपालिका से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग किया है.
संस्थागत भेदभाव की कड़वी सच्चाई
सभा में वक्ताओं ने रोहित वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये घटनाएं किसी एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र में व्याप्त संस्थागत भेदभाव का परिणाम हैं. आइसा नेत्री सबा ने कहा कि जब तक भेदभाव के खिलाफ सख्त कानून और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं.
उन्होंने कहा कि छात्र आत्महत्या के मामलों को केवल व्यक्तिगत कमजोरी बताकर खारिज करना वास्तविक समस्या से मुंह मोड़ने जैसा है. यह एक सामाजिक और संस्थागत संकट है, जिसे स्वीकार करना और उसका समाधान निकालना जरूरी है.
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रोहित वेमुला एक्ट लागू करने की मांग
आइसा-आरवाईए ने केंद्र सरकार से तत्काल प्रभाव से एक मजबूत और प्रभावी रोहित वेमुला एक्ट लागू करने की मांग किया है . संगठन का कहना है कि इस तरह का कानून ही शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव और उत्पीड़न के मामलों में स्पष्ट जवाबदेही तय कर सकता है.
साथ ही, यूजीसी गाइडलाइंस को और अधिक सख्त, स्पष्ट और प्रभावी बनाकर बिना किसी देरी के लागू करने की मांग भी उठाई गई. प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यदि शिक्षा के परिसर सुरक्षित और समानतामूलक नहीं होंगे, तो सबका विकास केवल एक नारा बनकर रह जाएगा.
बड़ी संख्या में छात्र-युवा रहे मौजूद
इस प्रतिवाद कार्यक्रम में पटना ग्रामीण आरवाईए सचिव मिथिलेश कुमार, रौशन कुमार, नितीश कुमार, ऋषि, शशि रंजन, हरेंद्र दास, सुजीत कुमार, मनोज, सुमित पासवान, सुमित, अभिषेक कुमार, दीपु, रणविजय कुमार, धीरज कुमार, रंजन कुमार और ललन कुमार सहित आइसा-आरवाईए के कई नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे.
निष्कर्ष
देशव्यापी प्रतिवाद दिवस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत के शैक्षणिक संस्थान वास्तव में समान अवसर और सामाजिक न्याय का प्रतीक बन पाए हैं.यूजीसी रेगुलेशन 2026 पर रोक को लेकर उठ रही आवाजें यह संकेत देती हैं कि छात्र-युवा अब भेदभाव को चुपचाप स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। आने वाले समय में यह आंदोलन शिक्षा नीति और न्यायिक विमर्श दोनों पर असर डाल सकता है.

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