सामाजिक न्याय या सामाजिक अन्याय? OBC के सवाल पर सरकार की कथनी-करनी बेनकाब

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Ajit Kumar

बिहार
राजद सांसद संजय यादव सामाजिक न्याय और OBC अधिकारों पर संसद में बोलते हुए

राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर राजद सांसद संजय यादव का तीखा विरोध

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,3 फरवरी — भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की आत्मा सामाजिक न्याय में निहित है. संविधान ने समानता, अवसर और सम्मान का जो सपना देखा था, वह आज भी देश के करोड़ों वंचित वर्गों के लिए अधूरा प्रतीत होता है.राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद संजय यादव ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आज सामाजिक न्याय एक नारा भर बनकर रह गया है, जबकि ज़मीनी हकीकत सामाजिक अन्याय की कहानी बयान कर रही है.

सामाजिक न्याय: नाम बड़ा, काम छोटा

संजय यादव ने कहा कि आज भारत में एक विचित्र राजनीति चल रही है,
नाम सामाजिक न्याय का, काम सामाजिक अन्याय का.
शासक वर्ग सामाजिक न्याय की भाषा का उपयोग अपने विशेषाधिकारों की रक्षा के लिए कर रहा है, न कि सबसे वंचित वर्गों के वास्तविक उत्थान के लिये.

उन्होंने स्पष्ट कहा कि आज शोषक और शोषित, दोनों सामाजिक न्याय की बातें करते हैं, लेकिन फर्क नीयत का है. सरकार की नीतियों और व्यवहार में भारी विरोधाभास है. कथनी और करनी के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है.

OBC: Only Bhashan Content?

राजद सांसद ने तीखे शब्दों में कहा कि मौजूदा सरकार के लिए OBC अब Only Bhashan Content बनकर रह गया है.

पोस्टर में OBC, प्रचार में OBC, भाषणों में OBC लेकिन नीति में OBC ग़ायब, नियुक्ति में OBC ग़ायब, निर्णय प्रक्रिया में OBC ग़ायब

उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश की लगभग 60% आबादी OBC है, तो क्या उन्हें सत्ता, प्रशासन और नीति-निर्माण में उनका वाजिब हिस्सा मिल रहा है?

आधी आबादी, आधा हक भी नहीं

संजय यादव ने दो टूक कहा, ओबीसी आधे से ज़्यादा हैं, फिर भी अपना हक़ नहीं पाते हैं.

उन्होंने सरकार से पूछा कि आज देश के सचिवालयों, संवैधानिक आयोगों, विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक उपक्रमों में कितने OBC निर्णायक पदों पर हैं?

तथ्य बताता हैं कि, OBC को मिलने वाली 9 लाख से अधिक नौकरियां अब तक नहीं दी गईं.

मंडल कमीशन लागू हुए 36 साल हो चुके हैं. फिर भी OBC आरक्षित कोटे की 7% से अधिक पद रिक्त हैं.

यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है.

NFS (Not Found Suitable): नया हथियार

राजद सांसद ने NFS यानी Not Found Suitable नीति पर गंभीर सवाल उठाया है.
उन्होंने कहा कि आजकल OBC/SC/ST उम्मीदवारों को बड़े पैमाने पर NFS घोषित किया जा रहा है.

सवाल यह है,

क्या देश के हर दूसरे व्यक्ति में कोई भी योग्य नहीं है?

क्या यह योग्यता का संकट है या मानसिकता का?

उन्होंने मांग किया कि OBC को NFS घोषित करने वालों की सामाजिक पृष्ठभूमि और मानसिकता की जांच होनी चाहिए. क्या वे जन्मजात श्रेष्ठता के अहंकार से ग्रस्त लोग हैं, जो वंचित वर्गों को अयोग्य मानते हैं?

उच्च शिक्षा में भेदभाव: UGC के आंकड़े

संजय यादव ने UGC के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव और उत्पीड़न के मामलों में 118.4% की वृद्धि हुई है.

यह आंकड़ा दर्शाता है कि शिक्षा, जो सामाजिक समानता का माध्यम होनी चाहिए थी, वह आज भी वंचित वर्गों के लिए संघर्ष का मैदान बनी हुई है.

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न्यायिक हस्तक्षेप और आरक्षण

राजद सांसद ने कहा कि OBC आरक्षण और अधिकारों को कमजोर करने में न्यायिक हस्तक्षेपों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.आरक्षण के संवैधानिक उद्देश्य को तकनीकी व्याख्याओं और प्रक्रियात्मक अड़चनों के जरिए कमजोर किया गया है.

आत्ममंथन का सवाल

संजय यादव ने अंत में एक गंभीर प्रश्न देश के सामने रखा है,

क्या 78 वर्षों में हम वंचित, उपेक्षित, उत्पीड़ित और लांछित वर्गों के लिए वास्तव में समान अवसर पैदा कर पाए हैं?

उत्तर साफ है— नहीं.

उन्होंने कहा कि जब हम पिछड़े, दलित, गरीब और ज़रूरतमंदों की बात करते हैं तो हमें जातिवादी कहा जाता है, और जब सत्ता नफरत की राजनीति करती है तो उसे राष्ट्रवाद का नाम दिया जाता है. यही आज के भारत की विडंबना है.

निष्कर्ष

यह वक्त आत्ममुग्ध भाषणों का नहीं, बल्कि नीतिगत ईमानदारी का है. सामाजिक न्याय केवल नारों, पोस्टरों और भाषणों से नहीं आएगा. इसके लिए वास्तविक प्रतिनिधित्व, ठोस नीतियां और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता ज़रूरी है.

यदि देश की आधी से अधिक आबादी आज भी अपने हक और सम्मान के लिए संघर्ष कर रही है, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है.

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