भारत-अमेरिका समझौते के बाद 18% टैरिफ: मायावती ने जताई बहुजन हितों की चिंता

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Ajit Kumar

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भारत अमेरिका व्यापार समझौते पर मायावती की प्रतिक्रिया

जमीनी अमल के बाद ही सही आकलन संभव, संसद में चर्चा न होने पर उठे सवाल

तीसरा पक्ष ब्यूरो लखनऊ 3 फरवरी 2026 — भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापारिक समझौते के बाद अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने की खबर ने देशभर में चर्चा को जन्म दिया है. इस मुद्दे पर बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने संतुलित और जिम्मेदार प्रतिक्रिया दिया है. उन्होंने स्पष्ट कहा है कि समुचित जानकारी के अभाव में तत्काल कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी, क्योंकि इसका वास्तविक असर जमीनी स्तर पर अमल के बाद ही सामने आयेगा . यह टिप्पणी देशहित, जनहित और खासकर बहुजन समाज के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है.

समझौते की पृष्ठभूमि

भारत-अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते लंबे समय से रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी पर आधारित रहा हैं. हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात, तकनीक, रक्षा और सेवा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है. इसी क्रम में अनेक शर्तों के साथ एक नया आपसी समझौता सामने आया, जिसके बाद अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 18 प्रतिशत टैरिफ लागू करने की घोषणा किया . टैरिफ का सीधा अर्थ है कि भारतीय वस्तुएँ अमेरिकी बाज़ार में महंगी हो जाएँगी, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है.

18% टैरिफ का संभावित आर्थिक असर

टैरिफ बढ़ने से सबसे पहले असर निर्यात-आधारित उद्योगों पर पड़ता है.भारत के कपड़ा, कृषि-उत्पाद, हस्तशिल्प, स्टील और ऑटो-पार्ट्स जैसे क्षेत्र अमेरिकी बाज़ार पर काफी हद तक निर्भर हैं.यदि इन क्षेत्रों से निर्यात घटता है, तो उत्पादन कम हो सकता है, जिससे रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है.यह स्थिति खासकर गरीबों, मजदूरों और छोटे किसानों के लिए चिंता का विषय बन सकती है.

बहुजन समाज के संदर्भ में चिंता

मायावती ने अपने वक्तव्य में विशेष रूप से बहुजनों, गरीबों, मजदूरों, किसानों और महिलाओं का उल्लेख किया है. यह वर्ग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन वैश्विक नीतिगत फैसलों का सबसे ज्यादा बोझ भी अक्सर इन्हीं पर पड़ता है.

मजदूर वर्ग: निर्यात घटने पर फैक्ट्रियों में छँटनी या मजदूरी में कटौती हो सकती है.

किसान: कृषि-उत्पादों पर टैरिफ का असर सीधे किसानों की आमदनी पर पड़ सकता है.

महिलाएँ: वस्त्र और घरेलू उद्योगों में बड़ी संख्या में महिलाएँ कार्यरत हैं, जिनकी आजीविका प्रभावित हो सकती है.

संसद में चर्चा का अभाव

मायावती ने यह भी कहा कि बेहतर होता यदि सरकार संसद सत्र के दौरान ही इस समझौते और टैरिफ के बारे में विस्तार से जानकारी देती. संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है, जहाँ जनप्रतिनिधियों के माध्यम से देश की जनता तक सही और पूरी जानकारी पहुँचाई जानी चाहिये. पारदर्शिता के अभाव में भ्रम और आशंका का माहौल बनता है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है

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सरकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही

सरकार का दायित्व है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते से पहले उसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का आकलन करे.खासकर ऐसे समय में जब महंगाई, बेरोजगारी और आय-असमानता पहले से ही चुनौती बनी हुई है, तब किसी भी नीति का असर बहुजन समाज पर नकारात्मक नहीं पड़ना चाहिये. मायावती का बयान इसी संवेदनशीलता को दर्शाता है, जिसमें न तो जल्दबाज़ी में समर्थन है और न ही बिना तथ्य के विरोध.

जमीनी अमल के बाद ही सही आकलन

यह सच है कि किसी भी नीति का वास्तविक प्रभाव उसके क्रियान्वयन के बाद ही स्पष्ट होता है. टैरिफ के लागू होने के बाद यह देखा जाएगा कि भारतीय निर्यात पर इसका कितना असर पड़ता है, सरकार इसके जवाब में क्या कदम उठाती है और प्रभावित वर्गों के लिए क्या राहत उपाय किए जाते हैं. तब तक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना ही समझदारी है.

निष्कर्ष

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद 18 प्रतिशत टैरिफ का मुद्दा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय से भी जुड़ा हुआ है. मायावती का बयान एक जिम्मेदार राजनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें देशहित और जनहित को प्राथमिकता दी गई है. बहुजनों, गरीबों, मजदूरों, किसानों और महिलाओं के हितों की रक्षा तभी संभव है जब नीतियाँ पारदर्शी हों, संसद में उन पर खुली चर्चा हो और जमीनी स्तर पर उनके प्रभाव का ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाये .आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस दिशा में क्या ठोस कदम उठाती है.

समाचार स्रोत: बसपा प्रमुख मायावती का आधिकारिक X (Twitter) पोस्ट के आधार पर

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