18% टैरिफ, ज़ीरो ड्यूटी और किसानों–उद्योगों पर मंडराता खतरा
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली,3 फरवरी 2026 — भारत-अमेरिका के बीच घोषित नई ट्रेड डील को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है.कांग्रेस पार्टी ने इस समझौते को भारत के आर्थिक हितों के खिलाफ बताते हुए तीखा हमला बोला है. कांग्रेस का कहना है कि जिस डील को मोदी सरकार और BJP ऐतिहासिक जीत बताकर जश्न मना रही है, वह असल में भारत के लिए एक एकतरफा और नुकसानदेह सौदा है.
कांग्रेस के आधिकारिक X (Twitter) हैंडल @INCIndia पर साझा किए गए बयान में कहा गया है कि बर्बादियों का जश्न मनाया जा रहा है और इस ट्रेड डील पर खुश होना केवल आर्थिक अज्ञानता को दर्शाता है.
18% टैरिफ: भारत को झटका, अमेरिका को फायदा
कांग्रेस के अनुसार, इस डील के तहत अमेरिका अब भारतीय एक्सपोर्ट पर 18% टैरिफ लगाएगा, जबकि अब तक भारत पर औसतन 3% से भी कम टैरिफ लगता था.
यह सवाल स्वाभाविक है कि जब पहले ही कम टैरिफ था, तो अब इसे छह गुना बढ़ाकर भारत की जीत कैसे कहा जा सकता है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो पार्ट्स, आईटी हार्डवेयर और MSME सेक्टर पर सीधा असर पड़ेगा. भारतीय उत्पाद अमेरिका में महंगे होंगे, जिससे निर्यात घटने की आशंका है.
ज़ीरो टैरिफ: भारतीय बाज़ार पूरी तरह खुला?
डील के दूसरे बड़े प्रावधान के तहत भारत अमेरिकी सामान पर शून्य (Zero) टैरिफ लगाएगा, जबकि अभी तक भारत अमेरिका से आने वाले कई उत्पादों पर 30% से 100% तक टैरिफ वसूलता था.
कांग्रेस का सवाल यह है कि,
जिन टैरिफ़ ने अब तक भारतीय उद्योगों और व्यापारियों को सुरक्षा दी, उन्हें हटाकर देश को क्या मिला?
इस फैसले से सस्ते अमेरिकी उत्पाद भारतीय बाज़ार में भर जाएंगे, जिससे घरेलू उद्योग, लघु व्यापारी और स्टार्टअप्स को भारी नुकसान हो सकता है.
500 अरब डॉलर की ख़रीद: मजबूरी या दबाव?
इस ट्रेड डील के अनुसार भारत अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर की ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, कृषि उत्पाद और कोयले की ख़रीद करेगा.
कांग्रेस का कहना है कि यह कोई समान भागीदारी नहीं, बल्कि भारत पर थोपी गई खरीदारी है.
इतनी बड़ी खरीद से, भारत का व्यापार घाटा बढ़ेगा, घरेलू उत्पादन प्रभावित होगा ,आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा कमजोर पड़ेगी
मेक इन इंडिया पर सीधा हमला?
कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि जब भारत अमेरिकी उत्पादों के लिए अपना बाज़ार पूरी तरह खोल देगा, तो फिर मेक इन इंडिया और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का क्या होगा?
अमेरिकी कृषि सचिव द्वारा इस डील पर खुलकर खुशी जताने से साफ है कि इसका सबसे बड़ा लाभ अमेरिकी किसानों और कंपनियों को मिलने वाला है, जबकि भारतीय किसान पहले से ही संकट में हैं.
रूस से तेल नहीं, अमेरिका से मजबूरी?
डील का एक और विवादित बिंदु यह है कि भारत अब रूस से सस्ता तेल नहीं खरीदेगा और इसके बजाय अमेरिका व वेनेजुएला से तेल खरीदेगा.
कांग्रेस का सीधा सवाल है,
अमेरिका कौन होता है यह तय करने वाला कि भारत किस देश से तेल खरीदे?
यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और विदेश नीति की स्वतंत्रता पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है.
ट्रंप ने पहले घोषणा क्यों की?
कांग्रेस ने यह भी सवाल उठाया हैं कि,
सीजफायर की तरह इस ट्रेड डील की घोषणा भी पहले डोनाल्ड ट्रंप ने क्यों की?
क्या भारत सरकार इस डील में बराबर की भागीदार थी या केवल फैसले की सूचना पाने वाला पक्ष?
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नतमस्तक, सरकार
कांग्रेस ने इस पूरे समझौते को देशविरोधी करार देते हुए कहा है कि मोदी सरकार ने यह डील अमेरिकी दबाव में नतमस्तक होकर किया है.
पार्टी का कहना है कि यह समझौता भारतीय किसानों, मजदूरों, व्यापारियों और युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है.
निष्कर्ष: जश्न नहीं, जवाब चाहिए
भारत-अमेरिका ट्रेड डील केवल आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़ा सवाल है.कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि इस डील पर जश्न मनाने से पहले सरकार को देश को जवाब देना होगा कि,
भारत को वास्तविक लाभ क्या मिला?
घरेलू उद्योगों की सुरक्षा कैसे होगी?
किसानों और रोजगार का भविष्य क्या होगा?
जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक इस डील को ,ऐतिहासिक जीत कहना महज़ एक राजनीतिक प्रचार ही माना जाएगा.

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