भारत में बढ़ती असुरक्षा का सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण
तीसरा पक्ष आलेख पटना,5 फरवरी — भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बाला देश है, जहाँ विविधता केवल पहचान नहीं बल्कि आत्मा माना जाता है.अलग-अलग धर्म, भाषा, संस्कृति और परंपराओं से मिलकर बना यह देश सदियों से,विविधता में एकता, का उदाहरण रहा है. लेकिन आज यही विविधता सवालों के घेरे में है.
अल्पसंख्यक होना आज डर क्यों बन गया? यह सवाल केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक चिंता का विषय बन चुका है.
देश के मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना तेजी से बढ़ रहा है.कहीं पहचान का डर है, कहीं हिंसा का, तो कहीं कानून और राजनीति के जरिए हाशिए पर धकेले जाने का भय.यह लेख इन्हीं कारणों का गहन विश्लेषण करता है और यह समझने की कोशिश करता है कि अल्पसंख्यक असुरक्षा आज एक संरचनात्मक समस्या क्यों बन चुका है.
अल्पसंख्यक असुरक्षा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकार देता है.अनुच्छेद 25 से 30 तक स्पष्ट रूप से यह सुनिश्चित किया गया है कि हर नागरिक को अपने धर्म, शिक्षा और पहचान की रक्षा का अधिकार है.
फिर भी, इतिहास गवाह है कि इन संवैधानिक आदर्शों और जमीनी हकीकत के बीच एक गहरी खाई रहा है.
1984 के सिख विरोधी दंगे.
1992 के बाद हुए सांप्रदायिक तनाव.
2002 के गुजरात दंगे.
इन सभी घटनाओं ने यह दिखाया है कि जब राजनीति, सत्ता और भीड़ का गठजोड़ बनता है, तो अल्पसंख्यक सबसे पहले निशाने पर आता हैं.
ब्रिटिश शासन की ,फूट डालो और राज करो, नीति ने जिस साम्प्रदायिक विभाजन की नींव रखा था, आज वही विभाजन नए राजनीतिक रूप में सामने आ रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह डर अधिक संगठित और वैचारिक रूप ले चुका है.
राजनीतिक ध्रुवीकरण: डर की सबसे बड़ी वजह
आज अल्पसंख्यक असुरक्षा के केंद्र में राजनीति है. चुनावी लाभ के लिए धार्मिक पहचान को हथियार बनाया जा रहा है.
कुछ कानून और नीतियाँ भी है जैसे, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), एंटी-कन्वर्ज़न कानून, लव जिहाद जैसे नैरेटिव
अल्पसंख्यक समुदायों में यह भावना पैदा करता हैं कि वे संदिग्ध नागरिक हैं.
राजनीतिक भाषणों और चुनावी अभियानों में, हम और वे, की भाषा ने सामाजिक ताने-बाने को बहुत कमजोर किया है. जब सत्ता से जुड़े लोग चुप रहता हैं या हेट स्पीच पर सख्ती नहीं दिखाता है, तो संदेश साफ होता है कि, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा प्राथमिकता नहीं है.
कानून का डर और समानता का संकट
कानून लोकतंत्र की रीढ़ होता हैं, लेकिन जब कानून चुनिंदा समुदायों के लिए डर का कारण बन जाता है , तो सवाल उठना स्वाभाविक है.
अनेक अल्पसंख्यकों का मानना है कि,
कानून लागू करने में दोहरा मापदंड अपनाया जाता है.
हिंसा करने वाले समूहों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है.
पीड़ित को ही आरोपी बना दिया जाता है.
इससे न्याय प्रणाली पर भरोसा कमजोर होता है और डर संस्थागत का रूप ले लेता है.
मीडिया और सोशल मीडिया: डर को बढ़ाने वाला माहौल
आज की राजनीति में मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि विचार निर्माण का हथियार बन चुका है.
टीवी डिबेट्स, सोशल मीडिया पोस्ट्स और वायरल वीडियो में अल्पसंख्यकों को अक्सर, देश विरोधी, घुसपैठिया, आतंक से जोड़कर, दिखाया जाता है.
सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहें और नफरत भरा संदेश जमीनी हिंसा में बदल जाता हैं. भीड़ को उकसाने में कुछ सेकंड की क्लिप या एक झूठी पोस्ट हि काफी होता है. यह माहौल अल्पसंख्यकों को हर समय सतर्क और भयभीत रहने पर मजबूर करता है.
हिंसा के उदाहरण और उनका सामाजिक प्रभाव
बीते वर्षों में कई घटनाओ ने यह साबित करता हैं कि अल्पसंख्यक डर केवल भावना नहीं, बल्कि अनुभव है.
लिंचिंग की घटनाएँ.
धार्मिक स्थलों पर हमले.
छात्रों और मजदूरों को पहचान के आधार पर निशाना बनाना.
इन घटनाओं का असर केवल शारीरिक नहीं होता, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी काफी गहरा होता है. शिक्षा छूटती है, रोजगार प्रभावित होता है ,और अगली पीढ़ी में भी डर स्थानांतरित हो जाता है.
अल्पसंख्यक ही नहीं, लोकतंत्र भी खतरे में
यह समझना जरूरी है कि अल्पसंख्यक असुरक्षा अंततः बहुसंख्यक समाज के लिए भी खतरा है. जब एक वर्ग की आवाज दबाया जाता है, तो लोकतंत्र कमजोर होता है.
हिंदुत्व या किसी भी प्रकार की कट्टर राजनीति केवल अल्पसंख्यकों को नहीं, बल्कि संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता को भी नुकसान पहुँचाता है.
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समाधान: डर से विश्वास की ओर
समस्या जितना गहरी है, समाधान उतना ही व्यापक होना चाहिये .
कानून का निष्पक्ष पालन – हेट स्पीच और हिंसा पर जीरो टॉलरेंस.
राजनीतिक जिम्मेदारी – सत्ता में बैठे लोगों की स्पष्ट और सख्त भूमिका.
जिम्मेदार मीडिया – सनसनी नहीं, संवेदनशीलता.
शिक्षा और संवाद – विविधता को डर नहीं, ताकत के रूप में पढ़ाया जाये .
संवैधानिक संस्थाओं को मजबूत करना – अल्पसंख्यक आयोग और न्यायपालिका की स्वतंत्रता.
निष्कर्ष
अल्पसंख्यक होना आज इसलिए डर बन गया है क्योंकि राजनीति, समाज और मीडिया ये तीनों स्तरों पर असंतुलन पैदा हो गया है.यह डर केवल किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य का संकेत है.
भारत की असली पहचान बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक में नहीं, बल्कि समान नागरिकता, सम्मान और सह-अस्तित्व में है.
अगर डर को सामान्य मान लिया गया, तो संविधान केवल किताबों में रह जाएगा.
लेकिन अगर संवाद, न्याय और समावेश को चुना गया,तो भारत फिर से भरोसे का देश बन सकता है.

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