लोकसभा अध्यक्ष के बयान पर पवन खेड़ा का तीखा हमला, बोले— मोदी सवाल-जवाब से डरते हैं
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली,5 फ़रवरी 2026 — भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संसद को माना जाता है, जहाँ सवाल पूछा जाता हैं, जवाब मांगा जाता हैं और सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह ठहराया जाता है. लेकिन जब संसद में ही सवालों से बचने की कोशिश हो, तो यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं रह जाता है, बल्कि लोकतंत्र की सेहत पर गंभीर सवाल खड़ा कर देता है.कांग्रेस नेता पवन खेड़ा द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर किया गया ताज़ा पोस्ट इसी बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है.
लोकसभा अध्यक्ष का बयान और विवाद
पवन खेड़ा ने अपने पोस्ट में दावा किया कि लोकसभा अध्यक्ष ने यह कहा कि प्रधानमंत्री को सदन में आने से इसलिए रोका गया क्योंकि महिला सांसदों द्वारा हमले का अंदेशा था. यह कथन अपने आप में असामान्य है.संसद, जो विचारों के आदान-प्रदान और बहस का मंच है, वहाँ ,हमले का डर दिखाना न केवल सांसदों की गरिमा पर सवाल उठाता है, बल्कि संसद की कार्यप्रणाली पर भी, यदि प्रधानमंत्री संसद में उपस्थित नहीं होते, तो विपक्ष का सवाल उठाना स्वाभाविक है कि, क्या सरकार आलोचना और सवालों से बच रही है?
पवन खेड़ा का तीखा हमला
पवन खेड़ा ने अपने पोस्ट में सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए लिखा है कि,
आप चीन से डरते हैं.
आप एपस्टीन से डरते हैं.
आप अमेरिका से डरते हैं.
आप अपने साथी सांसदों से डरते हैं.
आप किसान से डरते हैं.
आप नौजवान से डरते हैं.
आप एक किताब से डरते हैं. और अंत में उन्होंने निष्कर्ष दिया है कि, दरअसल आप सवाल-जवाब से डरते हैं.
यह बयान केवल व्यक्तिगत आरोप नहीं है,बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक है, जो यह दर्शाने की कोशिश करता है कि मौजूदा सत्ता संवाद की जगह मौन को प्राथमिकता दे रहा है.
संसद में प्रधानमंत्री की भूमिका
लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री का संसद में उपस्थित होना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक संवैधानिक जिम्मेदारी है. विपक्ष सवाल पूछता है, सरकार जवाब देती है,यही लोकतंत्र का मूल ढांचा है.
जब प्रधानमंत्री लगातार संसद से दूरी बनाते हैं, तो यह धारणा बनती है कि सरकार जवाबदेही से बच रही है.
पवन खेड़ा का आरोप इसी धारणा को मजबूती देता है कि सरकार बहस से ज्यादा प्रचार को महत्व दे रही है.
किसानों और युवाओं का संदर्भ
खेड़ा के बयान में किसानों और युवाओं का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है. हाल के वर्षों में किसान आंदोलन और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया है. विपक्ष का कहना है कि सरकार इन ज्वलंत मुद्दों पर खुलकर चर्चा से बचती रही है.
यदि सत्ता वास्तव में जनता के सवालों से डरने लगे, तो लोकतंत्र कमजोर होता है,यह संदेश खेड़ा के बयान के केंद्र में है.
एक किताब से डर का राजनीतिक अर्थ
पवन खेड़ा द्वारा एक किताब से डर कहना भी प्रतीकात्मक है. यह अभिव्यक्ति स्वतंत्रता, विचारों की आज़ादी और आलोचना के अधिकार की ओर इशारा करता है. लोकतंत्र में किताबें, लेख और विचार डर का नहीं, संवाद का कारण होने चाहिये.
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विपक्ष का नैरेटिव और सत्ता की छवि
यह पोस्ट विपक्ष के उस नैरेटिव को मजबूत करता है जिसमें भाजपा सरकार को सवालों से भागने वाली सत्ता के रूप में दिखाया जाता है. सोशल मीडिया के दौर में ऐसे बयान तेज़ी से फैलते हैं और जनमत को प्रभावित करता हैं.
सरकार भले ही इन आरोपों को खारिज करे, लेकिन सवाल यही है कि,क्या संसद में खुली बहस से बचना सही संदेश देता है?
लोकतंत्र में डर की जगह क्या होनी चाहिए?
लोकतंत्र डर से नहीं, भरोसे से चलता है। सत्ता का काम सवालों से डरना नहीं, बल्कि जवाब देना है. संसद में असहमति, तीखी बहस और आलोचना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत है.
निष्कर्ष
पवन खेड़ा का X पोस्ट केवल एक राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति पर एक गंभीर टिप्पणी है. प्रधानमंत्री का संसद में आना, सवालों का सामना करना और जवाब देना लोकतांत्रिक मर्यादा का हिस्सा है.
यदि सत्ता सवालों से डरने लगे, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ता है. यही कारण है कि यह मुद्दा केवल राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि हर नागरिक के अधिकार और लोकतांत्रिक भविष्य से जुड़ा हुआ है.
स्रोत: पवन खेड़ा (@Pawankhera) का X (Twitter) पोस्ट

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