गाजियाबाद की घटना ने खोली डिजिटल झूठ और गैर-जवाबदेही की खतरनाक सच्चाई
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली, 6 फ़रवरी — डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति को ताक़त दिया है, लेकिन इसी ताक़त के साथ एक ख़तरनाक लापरवाही भी जन्म ले चुका है. आज सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति बिना तथ्य जाँचे, बिना जिम्मेदारी लिए, किसी पर भी आरोप लगा देता है. एक झूठी पोस्ट कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाता है और किसी की प्रतिष्ठा, मानसिक शांति और जीवन तक को तबाह कर सकता है. कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक X (Twitter) हैंडल @INCIndia पर साझा किए गए वक्तव्य में इसी गंभीर संकट की ओर देश का ध्यान खींचा गया है.
एक पोस्ट, और टूट जाती है ज़िंदगी
आज स्थिति यह है कि सोशल मीडिया पर लिखा गया झूठ वापस लेना लगभग असंभव हो चुका है. जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक नुकसान हो चुका होता है. अफ़वाहें, ट्रोलिंग, चरित्र हनन और मानसिक उत्पीड़न,ये सब मिलकर एक ऐसा दबाव बनाता हैं, जिससे व्यक्ति टूट जाता है.
गाजियाबाद में कोरियन गेम्स देखते हुए तीन नाबालिग लड़कियों की आत्महत्या की दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. इस मामले में सामने आया कि सोशल मीडिया कंटेंट और फैल रही अफ़वाहों ने उनकी मानसिक स्थिति पर गहरा नकारात्मक असर डाला है. यह कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है,कि डिजिटल हिंसा भी उतनी ही जानलेवा हो सकताहै जितनी शारीरिक हिंसा होता है.
जिम्मेदारी से भागते प्लेटफॉर्म
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरे तंत्र में जवाबदेही का अभाव है.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कहते हैं कि वे केवल माध्यम हैं.
पोस्ट करने वाला व्यक्ति गुमनामी के पीछे छिप जाता है.
पीड़ित न्याय के लिए दर-दर भटकता रह जाता है.
आज हथियारों, ज़हर और अन्य खतरनाक चीज़ों पर कड़ा कानून हैं, लेकिन झूठ, नफ़रत और अफ़वाहें फैलाने वाले डिजिटल हथियारों पर कोई ठोस नियंत्रण नहीं है. क्या झूठ फैलाना कम घातक है? क्या किसी की मानसिक हत्या करना अपराध नहीं?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही
कांग्रेस पार्टी ने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन स्वतंत्रता का मतलब निरंकुशता नहीं हो सकता है.
राज्य सभा में कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने इस विषय पर सरकार से स्पष्ट नीति लाने का आग्रह किया है.
ऐसी नीति जो दो अहम बातों को संतुलित करे.
नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे.
गलत सूचना, अफ़वाह और झूठ फैलाने वालों की स्पष्ट जवाबदेही तय हो.
आज का कानून इस तेज़ी से बदलते डिजिटल यथार्थ के सामने कमजोर पड़ता दिखाइ दे रहा है.
सोशल मीडिया: मनोरंजन नहीं, जनमत निर्माण का औज़ार
अब यह मानने का समय आ गया है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का मंच नहीं रहा. अब यह जनमत निर्माण का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन चुका है.चुनाव, सामाजिक माहौल, सांप्रदायिक सद्भाव, युवाओं की सोच,सब कुछ इससे प्रभावित होता है.
जब झूठ और नफ़रत को बिना रोक-टोक फैलने दिया जाता है, तो उसका असर केवल एक व्यक्ति पर नहीं, पूरे समाज पर पड़ता है.नाबालिगों और युवाओं के लिए यह और भी घातक साबित हो रहा है, जिनका मानसिक विकास अभी अधूरा होता है.
ये भी पढ़े: अल्पसंख्यक होना आज डर क्यों बन गया?
ये भी पढ़े :सवालों से डरती सत्ता? संसद से लेकर सोशल मीडिया तक उठता लोकतंत्र का प्रश्न
सरकार की भूमिका और ज़िम्मेदारी
सरकार का दायित्व है कि वह डिजिटल युग की चुनौतियों को समझे और समय रहते ठोस कदम उठाए. केवल घटनाओं पर शोक जताना पर्याप्त नहीं है.ज़रूरत है,
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कानूनी जवाबदेही तय करने का ,
फ़ेक न्यूज़ और अफ़वाह फैलाने पर कड़े दंड का ,
नाबालिगों की डिजिटल सुरक्षा के लिए विशेष नियमों का ,
त्वरित शिकायत और न्याय तंत्र की
जब तक नीति स्पष्ट नहीं होगा, तब तक ऐसी घटनाएँ दोहराता रहेंगा.
निष्कर्ष
@INCIndia द्वारा उठाया गया यह मुद्दा केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी है. गाजियाबाद की घटना हमें बताती है कि सोशल मीडिया पर फैलने वाला झूठ भी एक हथियार है,जो चुपचाप ज़िंदगियाँ छीन रहा है.
अब सवाल यह नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता रहे या नहीं. सवाल यह है कि क्या झूठ बोलने की आज़ादी, सच से बड़ा हो सकता है?
समय आ गया है कि सरकार एक संतुलित, स्पष्ट और सख़्त डिजिटल नीति लाए,ताकि अभिव्यक्ति भी सुरक्षित रहे और इंसान की ज़िंदगी भी.

I am a blogger and social media influencer. I have about 5 years experience in digital media and news blogging.



















