Epstein Files का डर: क्या मोदी ने ट्रंप के आगे भारत गिरवी रख दिया?

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Ajit Kumar

भारत
Epstein Files और ट्रंप के दबाव में भारत की विदेश नीति पर सवाल

Epstein Files और भारत की विदेश नीति: ट्रंप के दबाव में मोदी सरकार?

तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली, 7 फरवरी 2026 भारत की विदेश नीति हमेशा से रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत पर टिका रहा है.चाहे शीत युद्ध का दौर हो या वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का, भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए वैश्विक शक्तियों से संबंध बनाया हैं.लेकिन हालिया घटनाक्रम और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों ने इस नीति पर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया हैं. कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक X (Twitter) हैंडल @INCIndia के अनुसार, Epstein Files के डर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप के सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया है.

ट्रंप का बयान और भारत पर टैरिफ का दबाव

कांग्रेस के अनुसार, रूस से तेल खरीदने के कारण अमेरिका ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया था. बाद में इस टैरिफ को हटाने की घोषणा करते हुए ट्रंप ने यह दावा किया कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद करने और उसकी जगह अमेरिका से तेल खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है. यही नहीं, ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका भारत पर निगरानी रखेगा और अगर भारत ने दोबारा रूस से तेल खरीदा तो तुरंत फिर से टैरिफ लगा दिया जाएगा.

यह बयान सिर्फ एक व्यापारिक चेतावनी नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता पर सीधा सवाल है.

कांग्रेस का आरोप: मोदी सरकार Compromised

कांग्रेस का कहना है कि ट्रंप के इस बयान से साफ होता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी compromised हैं. पार्टी के अनुसार, ट्रंप जो चाहता हैं, वही मोदी सरकार कर रहा है. कांग्रेस ने इसे आदेश-पालन की राजनीति करार दिया है.

कांग्रेस ने अपने बयान में इसे कुछ इस तरह प्रस्तुत किया है:

ट्रंप ने कहा: रूस से सस्ता तेल मत खरीदो – मोदी बोले,जैसा आपका आदेश

ट्रंप ने कहा: अमेरिका का महंगा तेल खरीदो – मोदी बोले, जैसा आपका आदेश

ट्रंप ने कहा: 18% टैरिफ वसूलेंगे – मोदी बोले,जैसा आपका आदेश

ट्रंप ने कहा: तुम हमसे ZERO टैरिफ लोगे – मोदी बोले, जैसा आपका आदेश

यह सिलसिला दर्शाता है कि देश के अहम आर्थिक और रणनीतिक फैसले किसी और के इशारों पर लिए जा रहा हैं.

रूस से तेल खरीदना: भारत की मजबूरी या रणनीति?

रूस से तेल खरीदना भारत की मजबूरी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक निर्णय रहा है. वैश्विक बाजार में जब कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रहा था , तब रूस से सस्ता तेल खरीदकर भारत ने अपने नागरिकों को महंगाई से राहत दिलाई. इससे न सिर्फ विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हुआ, बल्कि घरेलू अर्थव्यवस्था को भी स्थिरता मिली है.

अगर अब भारत पर दबाव डालकर उसे महंगा अमेरिकी तेल खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, तो इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा.

आर्थिक असर: महंगाई और राजकोषीय दबाव

अमेरिका से महंगा तेल खरीदने का मतलब है ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी, परिवहन लागत में इजाफा और अंततः महंगाई। इसके अलावा, एकतरफा टैरिफ समझौते भारत के उद्योग, निर्यात और रोजगार पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता हैं.

कांग्रेस का कहना है कि मोदी सरकार का यह फैसला देश की अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकता हैं, जिसकी भरपाई आने वाले वर्षों तक मुश्किल होगी.

विदेश नीति और राष्ट्रीय गरिमा का सवाल

भारत हमेशा खुद को एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता रहा है.लेकिन अगर किसी विदेशी नेता की धमकी पर भारत अपने ऊर्जा स्रोत बदलने और व्यापारिक शर्तें स्वीकार करने को मजबूर हो जाए, तो यह राष्ट्रीय गरिमा पर आघात है.

कांग्रेस का आरोप है कि Epstein Files में संभावित खुलासों के डर ने मोदी सरकार को कमजोर बना दिया है और इसी कमजोरी का फायदा उठाकर ट्रंप भारत पर दबाव बना रहा हैं.

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Epstein Files का संदर्भ और राजनीतिक बहस

Epstein Files का नाम आते ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रभावशाली लोगों पर सवाल खड़ा हो चुका हैं. कांग्रेस का दावा है कि इन्हीं फाइलों में मौजूद तथ्यों के डर से मोदी सरकार समझौते कर रहा है.हालांकि सरकार की ओर से इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है, लेकिन विपक्ष का यह आरोप राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है.

दीर्घकालिक परिणाम: देश को क्या कीमत चुकानी पड़ेगी?

कांग्रेस का कहना है कि मोदी सरकार आज जो फैसले ले रही है, उसका खामियाजा देश को लंबे समय तक भुगतना होगा.

ऊर्जा सुरक्षा कमजोर होगी, महंगाई बढ़ेगी, विदेश नीति की विश्वसनीयता घटेगी.

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर सवाल उठेंगे.

निष्कर्ष

कांग्रेस @INCIndia के X (Twitter) पोस्ट के अनुसार, ट्रंप के हालिया बयान सिर्फ एक व्यापारिक समझौते की कहानी नहीं कहता है , बल्कि भारत की विदेश नीति, आर्थिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गरिमा पर भी गंभीर सवाल उठाता हैं. अगर आरोप सही हैं, तो यह देशहित के साथ बड़ा समझौता माना जाएगा.

आज जरूरत है पारदर्शिता की, स्पष्ट जवाबदेही की और एक ऐसी विदेश नीति की जो किसी दबाव में नहीं, बल्कि भारत के हितों के अनुसार तय हो.क्योंकि राष्ट्र के फैसले किसी के डर या मजबूरी से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और स्वाभिमान से होने चाहिए.

स्रोत: कांग्रेस (@INCIndia) के आधिकारिक X (Twitter) पोस्ट के आधार पर

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