आइसा–ऐपवा की बेटी बचाओ न्याय यात्रा ने गोह पहुँचकर उठाए प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल
तीसरा पक्ष ब्यूरो गोह, औरंगाबाद: 7 फ़रवरी — बिहार में छात्राओं की सुरक्षा एक बार फिर कठघरे में है. पटना के परफेक्ट पीजी हॉस्टल में रहकर नीट की तैयारी कर रही औरंगाबाद जिले के गोह की रहने वाली छात्रा अनामिका की संदिग्ध मौत ने न केवल उसके परिवार को तोड़ दिया है, बल्कि पूरे राज्य में बेटियों की सुरक्षा, सम्मान और न्याय को लेकर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया हैं.इसी पृष्ठभूमि में आइसा–ऐपवा की संयुक्त बेटी बचाओ न्याय यात्रा आज औरंगाबाद जिले के गोह पहुँची, जहाँ प्रतिनिधिमंडल ने पीड़िता के परिजनों से मुलाकात कर न्याय की लड़ाई में उनके साथ खड़े होने का भरोसा दिया.

बेटी बचाओ न्याय यात्रा: उद्देश्य और पृष्ठभूमि
आइसा–ऐपवा की यह संयुक्त यात्रा 3 फरवरी 2026 को पटना के बुद्धा पार्क से जन-सुनवाई के साथ शुरू हुई थी.जहानाबाद, नालंदा, नवादा और गया जिलों में जनसंवाद के बाद यह यात्रा गोह पहुँची. इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य बिहार में छात्राओं के साथ हो रही हिंसा, बलात्कार और संदिग्ध मौतों के मामलों में प्रशासनिक लीपापोती को उजागर करना और इन्हें राज्यव्यापी मुद्दा बनाना है.
आइसा और ऐपवा का स्पष्ट कहना है कि महिलाओं की आज़ादी और न्याय की बात तभी सार्थक होगा, जब सरकार और प्रशासन दोषियों को बचाने की बजाय पीड़ितों के साथ खड़ा होंगा.
अनामिका की मौत: आत्महत्या या सुनियोजित हत्या?
औरंगाबाद जिले के गोह की रहने वाली अनामिका की मौत कई सवाल खड़ी करती है. 6 जनवरी को दोपहर लगभग 1 बजे परिवार को सूचना दिया गया कि अनामिका ने फांसी लगा लिया है. लेकिन इसी दिन सुबह 9 बजे उसकी माँ से अनामिका की सामान्य बातचीत हुई थी. वह किसी मानसिक दबाव या परेशानी का संकेत नहीं दे रही थी.
यह विरोधाभास पूरे मामले को संदेह के घेरे में लाता है. सवाल यह है कि कुछ ही घंटों में ऐसी कौन-सी परिस्थिति बनी, जिसने एक मेहनती छात्रा को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया, या फिर यह आत्महत्या नहीं, बल्कि हत्या है?
परिवार के साथ प्रशासन का अमानवीय व्यवहार
घटना की सूचना मिलते ही जब परिजन पटना पहुँचे, तो उन्हें पीएमसीएच समेत कई अस्पतालों में घंटों भटकाया गया. काफी देर बाद शव तक पहुँचने दिया गया. सबसे गंभीर बात यह रही कि परिवार को हॉस्टल के कमरे में प्रवेश नहीं करने दिया गया, जबकि उसी दौरान रूम पार्टनर का सामान दूसरे कमरे में शिफ्ट कराया गया.
यह पूरा घटनाक्रम साक्ष्यों से छेड़छाड़ की ओर इशारा करता है. सवाल उठता है कि अगर प्रशासन निष्पक्ष जाँच चाहता था, तो यह जल्दबाज़ी और गोपनीयता क्यों?
जाँच में देरी और भ्रष्टाचार के आरोप
पुलिस ने अनामिका का मोबाइल फोन जब्त किया, लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद न तो कोई डिजिटल साक्ष्य सार्वजनिक किया गया और न ही मोबाइल फोन परिवार को लौटाया गया.
7 जनवरी को पोस्टमार्टम हुआ, लेकिन उसकी रिपोर्ट 29 जनवरी को दिया गया.परिजनों का गंभीर आरोप है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने के बदले एक लाख रुपये की मांग किया गया.
अगर यह आरोप सही हैं, तो यह पूरी स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था पर एक काला धब्बा है.
आत्महत्या’ का दबाव और प्रशासनिक लीपापोती
एक महीना बीत जाने के बावजूद न तो जाँच की कोई पारदर्शी जानकारी परिवार को दी गई है और न ही किसी दोषी पर कार्रवाई हुई है.प्रशासन लगातार इस मामले को आत्महत्या बताकर खत्म करने की कोशिश कर रहा है.
आइसा–ऐपवा ने इसे मोदी–नीतीश की डबल इंजन सरकार के संरक्षण में चल रही प्रशासनिक लीपापोती करार दिया है.
आइसा–ऐपवा का स्पष्ट संदेश
आइसा और ऐपवा का कहना है कि यह मामला सिर्फ अनामिका की मौत का नहीं है, बल्कि यह बिहार में बेटियों और छात्राओं की सुरक्षा का सवाल है. जब पटना जैसे शहर में नीट की तैयारी कर रही छात्रा को न्याय नहीं मिल पा रहा, तो सरकार के बेटी बचाओ के दावे खोखले नज़र आता हैं.
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यात्रा में शामिल नेता
गोह में हुई इस मुलाकात के दौरान औरंगाबाद भाकपा(माले) जिला सचिव कॉ. मुनारीक राम, ऐपवा नेत्री अलकारी देवी, मीना देवी सहित कई स्थानीय माले नेता मौजूद थे. यात्रा का नेतृत्व ऐपवा महासचिव कॉ. मीना तिवारी, कॉ. संगीता सिंह, कॉ. रीता वर्णवाल, कॉ. लीला वर्मा, आइसा राज्य अध्यक्ष कॉ. प्रीति कुमारी, राज्य सह-सचिव कॉ. दीपांकर मिश्र, कॉ. प्रिया और कॉ. अनु कर रही हैं.
आइसा–ऐपवा की प्रमुख मांगें
आइसा–ऐपवा ने सरकार और प्रशासन के सामने स्पष्ट मांगें रखी हैं,
पूरे मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जाँच कराई जाए.
सभी दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी हो.
सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल साक्ष्य और जाँच रिपोर्ट परिवार के सामने सार्वजनिक की जाए.
छात्राओं के लिए सरकारी छात्रावास की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए.
सभी शिक्षण संस्थानों में GSCASH को सख्ती से लागू किया जाए.
निष्कर्ष
अनामिका की मौत सिर्फ एक छात्रा की मौत नहीं है, यह उस व्यवस्था का आईना है, जो बार-बार बेटियों को असुरक्षित छोड़ देती है. आइसा–ऐपवा की बेटी बचाओ न्याय यात्रा इस चुप्पी को तोड़ने की कोशिश है.अब सवाल यह है कि सरकार इस आवाज़ को सुनेगी या फिर एक और मामला फाइलों में दफन कर दिया जाएगा.

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