तेजस्वी यादव के कार्यकारी अध्यक्ष बनने से क्यों बढ़ी एनडीए की बेचैनी?

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Ajit Kumar

बिहार
तेजस्वी यादव राजद कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद एनडीए पर हमला

बिहार की राजनीति में बदले समीकरण और तेजस्वी के विजन की बढ़ती स्वीकार्यता

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 8 फरवरी — बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव के पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद एनडीए खेमे में बेचैनी साफ दिखाई देने लगी है.राजद के प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन के बयान के बाद यह राजनीतिक बहस और तेज हो गई है कि आखिर तेजस्वी यादव एनडीए नेताओं के लिए इतने बड़े राजनीतिक चुनौती क्यों बनते जा रहे हैं.

तेजस्वी यादव का बढ़ता राजनीतिक कद

तेजस्वी यादव आज केवल एक विपक्षी नेता नहीं रह गए हैं, बल्कि वे बिहार की राजनीति में विजन, ऊर्जा और विकल्प का प्रतीक बनते जा रहे हैं.राजद प्रवक्ता चित्तरंजन गगन के अनुसार एनडीए के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है जो तेजस्वी के राजनीतिक तेज और जनसमर्थन के सामने टिक सके.यही वजह है कि तेजस्वी के कार्यकारी अध्यक्ष बनने की घोषणा के साथ ही एनडीए नेताओं की बेचैनी बढ़ गई है.

तेजस्वी यादव ने कम उम्र में जिस तरह से संगठन, विधानसभा और जनता के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाई है, उसने उन्हें आने वाले समय का सबसे प्रभावशाली नेता बना दिया है.

एनडीए की राजनीति पर तीखा हमला

राजद प्रवक्ता ने अपने बयान में कहा कि आज एनडीए के नेता तेजस्वी यादव के सामने बौने साबित हो चुके हैं.उनके पास न तो बिहार के लिए कोई नया विजन है और न ही कोई ठोस मिशन.एनडीए सरकार आज भी उन्हीं योजनाओं की चर्चा करती है, जिनकी नींव 2015 में राजद के साथ बनी महागठबंधन सरकार के दौरान रखी गई थी.

सात निश्चय योजना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसे आज भी एनडीए अपनी उपलब्धि बताने की कोशिश करता है, जबकि सच्चाई यह है कि यह योजना तेजस्वी यादव के विजन का ही परिणाम था.

तेजस्वी के विजन की नकल को मजबूर एनडीए

राजद का आरोप है कि बिहार की मौजूदा एनडीए सरकार आज तेजस्वी यादव के विजन की नकल करने को मजबूर है.चाहे बात हो,

महिलाओं के खातों में सीधे आर्थिक सहायता भेजने की,

125 यूनिट मुफ्त बिजली देने की,

वृद्धावस्था और सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि बढ़ाने की,

आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका के मानदेय में वृद्धि की,

किसानों की सम्मान राशि बढ़ाने की,

शिक्षकों और अन्य रिक्त पदों पर बहाली की,

इन सभी नीतियों की प्रेरणा तेजस्वी यादव की सोच से ही निकली है. फर्क सिर्फ इतना है कि नकल करने के लिए भी राजनीतिक इच्छाशक्ति और संकल्प चाहिए, जो एनडीए नेताओं के पास दिखाई नहीं देता है ।

केंद्र से हक मांगने में विफल एनडीए

राजद प्रवक्ता ने केंद्र सरकार के सामने एनडीए की कमजोरी को भी उजागर किया. उन्होंने कहा कि बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा और विशेष पैकेज जैसे अहम मुद्दों पर एनडीए नेताओं ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है.

हाल ही में एक केंद्रीय मंत्री द्वारा इन दोनों मांगों को एक शब्द में खारिज किए जाने के बावजूद बिहार के किसी भी एनडीए नेता ने विरोध तक नहीं किया. यह दर्शाता है कि एनडीए के नेता अब केंद्र से अपना हक मांगने की स्थिति में भी नहीं बचे हैं.

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तेजस्वी यादव की निर्णायक पहल

इसके विपरीत तेजस्वी यादव ने बिहार के हित में एक बार फिर निर्णायक पहल की है.उन्होंने,

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने,

विशेष पैकेज की मांग को लेकर,

सर्वदलीय बैठक बुलाने,

प्रधानमंत्री से सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात की मांग,

जैसे ठोस कदम उठाने का ऐलान किया है. यह दिखाता है कि तेजस्वी यादव केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि राज्य के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए गंभीर हैं.

बिहार की राजनीति का बदलता भविष्य

तेजस्वी यादव का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनना केवल एक संगठनात्मक फैसला नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीति में आने वाले बदलाव का संकेत है. जहां एक ओर एनडीए नकल और केंद्र की तारीफ में उलझी हुई है, वहीं तेजस्वी यादव बिहार के भविष्य की स्पष्ट रूपरेखा जनता के सामने रख रहे हैं.

यही कारण है कि आज एनडीए के नेता तेजस्वी यादव से सबसे ज्यादा असहज महसूस कर रहा हैं. आने वाले समय में यह बेचैनी और बढ़ने वाली है, क्योंकि बिहार की जनता अब विजन, विकास और न्याय की राजनीति को पहचानने लगी है.

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