TRAP DEAL क्या है? जिस पर खड़गे ने सरकार को घेरा

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Ajit Kumar

भारत
मल्लिकार्जुन खड़गे का TRAP DEAL और लेबर कानूनों पर बयान

मजदूरों के हक पर वार? खड़गे ने उठाए गंभीर सवाल

तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली,12 फरवरी — देश की राजनीति में एक बार फिर मजदूर, किसान और ट्रेड यूनियनों के मुद्दे केंद्र में आ गया हैं. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने आधिकारिक X (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट में मोदी सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोलते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की तथाकथित TRAP DEAL नए लेबर कानून और मनरेगा को कमजोर करने की कोशिशें करोड़ों मेहनतकश लोगों के भविष्य को खतरे में डाल रहा हैं.

खड़गे ने कहा है कि देशभर में ट्रेड यूनियन, किसान और मजदूर सड़कों पर उतर आया हैं और यह विरोध सिर्फ किसी एक नीति का नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक और सामाजिक असंतोष का प्रतीक है.

क्या है TRAP DEAL पर विवाद?

मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने पोस्ट में जिस TRAP DEAL का जिक्र किया, उसे उन्होंने जन-विरोधी करार दिया है. उनके अनुसार यह डील विदेशी दबाव में किया गया है, जिससे देश के मजदूरों, किसानों और छोटे व्यापारियों के हितों को नुकसान पहुंच सकता है.

विपक्ष का आरोप है कि इस तरह की व्यापारिक समझौतों में घरेलू उद्योग, लघु व्यापार और श्रमिक हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं किया जाता है . खड़गे ने इसे करोड़ों मेहनतकश नागरिकों के भविष्य को गिरवी रखने जैसा कदम बताया है.

हालांकि सरकार की ओर से इन समझौतों को आर्थिक विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति मजबूत करने के लिए आवश्यक बताया जाता रहा है.लेकिन विपक्ष इसे असंतुलित और आमजन के खिलाफ मानता है.

लेबर कानून और मनरेगा पर घमासान

खड़गे ने अपने बयान में नए लेबर कानूनों और मनरेगा को लेकर भी गंभीर सवाल उठाया है. उनका कहना है कि लेबर कानूनों में किया गया बदलावों से मजदूरों के अधिकार कमजोर हुआ हैं.

देशभर में कई ट्रेड यूनियन पहले भी यह आरोप लगा चुका हैं कि नए श्रम कोड से नौकरी की सुरक्षा, वेतन संरक्षण और यूनियन अधिकारों पर असर पड़ा है.

इसी तरह मनरेगा को लेकर भी विपक्ष लगातार सरकार पर बजट में कटौती और भुगतान में देरी के आरोप लगाता रहा है.खड़गे का दावा है कि मनरेगा ग्रामीण गरीबों और मजदूरों के लिए जीवनरेखा है, जिसे कमजोर करना सीधे तौर पर गरीब वर्ग पर चोट है.

सड़क से संसद तक संघर्ष का ऐलान

अपने पोस्ट में खड़गे ने साफ शब्दों में कहा है कि यह संघर्ष जारी रहेगा.उन्होंने लिखा है कि देश के करोड़ों मजदूर, किसान और श्रमिक सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर हैं और कांग्रेस उनके साथ खड़ा है.

सड़क से संसद तक की रणनीति का मतलब है कि विपक्ष न केवल जन-आंदोलन के जरिए बल्कि संसद के भीतर भी इन मुद्दों को उठाएगा. इससे साफ है कि आने वाले सत्रों में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन सकता है.

विदेशी दबाव और राजनीतिक बयानबाजी

खड़गे ने अपने बयान में यह भी कहा कि विदेशी दबाव में आकर लिया गया फैसला देशहित के खिलाफ हैं. उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में अबकी बार, ट्रंप सरकार जैसे नारों का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने भारत के हितों से समझौता किया है.

यह बयान स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार की विदेश नीति और व्यापारिक समझौतों पर सवाल उठाता है. हालांकि सरकार हमेशा यह दावा करता रहा है कि सभी अंतरराष्ट्रीय समझौते राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर किया जाता हैं.

मजदूर, किसान और छोटे व्यापारियों की भूमिका

देश की अर्थव्यवस्था में मजदूरों, किसानों और छोटे व्यापारियों की भूमिका बेहद अहम है. यदि इन वर्गों में असंतोष बढ़ता है, तो उसका सीधा असर सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता पर पड़ सकता है.

खड़गे का यह बयान ऐसे समय में आया है जब कई राज्यों में श्रमिक संगठनों और किसान संगठनों ने प्रदर्शन और हड़ताल की घोषणाएं की हैं. इससे यह मुद्दा केवल राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि जमीनी आंदोलन का रूप ले सकता है.

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आगामी राजनीतिक प्रभाव

विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रेड यूनियन और किसान संगठनों का विरोध व्यापक स्तर पर जारी रहता है, तो यह आगामी चुनावों में बड़ा मुद्दा बन सकता है.

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे को सामाजिक न्याय, रोजगार सुरक्षा और आर्थिक समानता के सवाल से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की कोशिश कर सकता हैं. वहीं सरकार इसे सुधारवादी कदम और आर्थिक मजबूती के लिए आवश्यक निर्णय के रूप में प्रस्तुत कर सकता है.

निष्कर्ष

मल्लिकार्जुन खड़गे का यह बयान साफ संकेत देता है कि मजदूर और किसान मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और तेज होगा.TRAP DEAL, लेबर कानून और मनरेगा जैसे विषय आने वाले समय में राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रह सकता हैं.

सवाल यह है कि क्या सरकार और विपक्ष के बीच संवाद का कोई रास्ता निकलेगा या फिर यह टकराव और गहरा होगा? फिलहाल इतना तय है कि मजदूर, किसान और ट्रेड यूनियन से जुड़े मुद्दे आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.

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