मोदी सरकार-अमेरिका ट्रेड डील पर कांग्रेस का बड़ा आरोप: किसानों, ऊर्जा व व्यापार हित दांव पर?

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Ajit Kumar

भारत
भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर कांग्रेस का विरोध, किसानों पर असर की चिंता

खेती, ऊर्जा व व्यापार हितों पर समझौते की आशंका

तीसरा पक्ष ब्यूरो दिल्ली, 16 फरवरी: भारत-अमेरिका संभावित ट्रेड डील को लेकर सियासत और तेज हो गया है. कांग्रेस ने मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि इस समझौते में भारत के कृषि, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों से समझौता किया जा रहा है. पार्टी का दावा है कि 6 फरवरी 2026 के फ्रेमवर्क एग्रीमेंट में ही ऐसे संकेत मिलता हैं कि भारत बिना आयात शुल्क के अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों के लिए अपना बाजार खोल सकता है, जिससे देश के किसानों और घरेलू उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है.

यह बयान कांग्रेस के आधिकारिक हैंडल INCIndia और पार्टी महासचिव Randeep Surjewala के हवाले से सामने आया है, जिसमें तीन प्रमुख मुद्दे खेती, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार की शर्ते को सबसे अहम बताया गया है.

ट्रेड डील के तीन बड़े मुद्दे: खेती, ऊर्जा और व्यापार

कांग्रेस का कहना है कि प्रस्तावित समझौते के तहत यदि अमेरिकी कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क खत्म किया जाता है, तो भारत के किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा बेहद कठिन हो जायेगा. पार्टी ने विशेष रूप से तीन उत्पादों, ड्राईड डिस्टिलर ग्रेन (DDG), ज्वार और सोयाबीन ऑयल,का उल्लेख करते हुए इसके संभावित दुष्प्रभावों को रेखांकित किया है.

ड्राईड डिस्टिलर ग्रेन (DDG) पर खतरे की आशंका

ड्राईड डिस्टिलर ग्रेन, जो मूल रूप से प्रोसेस्ड मक्का है, पशु चारे के रूप में इस्तेमाल होता है. कांग्रेस का तर्क है कि अमेरिका में मक्का उत्पादन भारत की तुलना में कई गुना ज्यादा है, और वह अपने अधिशेष उत्पादन के लिए बड़े बाजार की तलाश में है.

भारत में 2025-26 के दौरान लगभग 4.30 करोड़ मीट्रिक टन मक्का उत्पादन हुआ, जो कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना और गुजरात जैसे राज्यों में किसानों की आय का अहम स्रोत है. यदि अमेरिकी DDG बिना शुल्क के भारतीय बाजार में आने लगेगा, तो घरेलू मक्का उत्पादकों को भारी कीमत गिरावट का सामना करना पड़ सकता है.

कांग्रेस का सवाल है कि ,जब भारत पहले से ही मक्का उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है, तब विदेशी उत्पादों को बिना शुल्क प्रवेश देना क्या किसानों के हित में होगा?

ज्वार आयात: घरेलू उत्पादन पर असर?

दूसरा बड़ा मुद्दा ज्वार आयात का है. भारत में इस साल करीब 52 लाख मीट्रिक टन ज्वार का उत्पादन हुआ, जो महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के किसानों की जीविका का आधार है.

कांग्रेस का दावा है कि अमेरिका दुनिया में ज्वार का सबसे बड़ा उत्पादक है और उसका सालाना उत्पादन लगभग 87 लाख मीट्रिक टन है. यदि अमेरिकी ज्वार को ड्यूटी-फ्री भारत में बेचने की अनुमति मिलता है, तो भारतीय किसानों को बाजार में सस्ती विदेशी फसल से प्रतिस्पर्धा करना पड़ेगा , जिससे उनकी आय और कीमत दोनों प्रभावित हो सकता हैं.

सोयाबीन ऑयल आयात: छोटे किसानों पर दबाव

तीसरा और सबसे संवेदनशील मुद्दा सोयाबीन ऑयल का है. भारत में 2024-25 के दौरान लगभग 153 लाख टन सोयाबीन उत्पादन हुआ, जिसमें मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक प्रमुख उत्पादक राज्य हैं.

कांग्रेस के अनुसार, अमेरिका में सोयाबीन उत्पादन भारत से कई गुना अधिक है.यदि बिना शुल्क अमेरिकी सोयाबीन ऑयल का आयात शुरू होता है, तो घरेलू तेल मिलों और किसानों को गंभीर आर्थिक नुकसान हो सकता है. इससे खासतौर पर छोटे और मध्यम किसानों की आजीविका पर असर पड़ने की आशंका जताया जा रहा है.

ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक शर्तों पर भी चिंता

कांग्रेस ने केवल कृषि क्षेत्र ही नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार की शर्तों पर भी सवाल उठाया हैं.पार्टी का कहना है कि यदि समझौते में ऊर्जा क्षेत्र में भी अमेरिका को ज्यादा छूटदिया गया , तो भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता प्रभावित हो सकता है.

साथ ही, व्यापारिक शर्तों में यदि भारत के घरेलू उद्योगों की सुरक्षा से समझौता किया गया, तो मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों को झटका लग सकता है. कांग्रेस ने सरकार से स्पष्टता की मांग किया है कि आखिर इस संभावित डील में भारत को क्या ठोस लाभ मिलेगा.

किसानों और अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मुक्त व्यापार समझौते का असर केवल आयात-निर्यात तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह घरेलू बाजार, कीमतों, रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डालता है.यदि सस्ते विदेशी कृषि उत्पाद भारत में आता हैं, तो स्थानीय किसानों को अपनी फसलों के उचित दाम मिलने में दिक्कत हो सकता है.

कांग्रेस का आरोप है कि सरकार बड़े व्यापारिक हितों को प्राथमिकता दे रही है, जबकि देश के किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हितों को नजरअंदाज किया जा रहा है.पार्टी ने यह भी कहा कि कृषि क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इस पर कोई भी निर्णय बेहद सावधानी से लिया जाना चाहिये.

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सरकार से जवाब की मांग

कांग्रेस ने मोदी सरकार से कई सीधे सवाल पूछा हैं कि, क्या भारत वास्तव में बिना शुल्क अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने जा रहा है? यदि हां, तो किसानों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे? और इस समझौते से भारत को ठोस आर्थिक लाभ क्या मिलेगा?

पार्टी ने मांग किया है कि सरकार संसद और जनता के सामने इस प्रस्तावित ट्रेड डील की पूरी शर्तें स्पष्ट करे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत के कृषि, ऊर्जा और व्यापारिक हितों से कोई समझौता न हो.

निष्कर्ष

भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर जारी यह विवाद आने वाले समय में राजनीतिक और आर्थिक बहस का बड़ा मुद्दा बन सकता है. कांग्रेस ने जिस तरह से किसानों, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक शर्तों को लेकर चिंता जताई है, वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और घरेलू उद्योगों के भविष्य से जुड़ा संवेदनशील प्रश्न है.

अब निगाहें सरकार के जवाब और आधिकारिक स्पष्टीकरण पर टिकी हैं. यदि यह डील आगे बढ़ती है, तो उसका असर केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि करोड़ों भारतीय किसानों और उपभोक्ताओं की जिंदगी पर भी सीधा प्रभाव डाल सकता है.

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