यह सूची साफ़ बताती है कि यह समस्या स्थानीय नहीं—राष्ट्रीय है !
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,24 नवंबर 2025 — भारत आज जिस लोकतांत्रिक ढांचे पर गर्व करता है, उसकी बुनियाद को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने अपने पिन किए हुए X (Twitter) पोस्ट में एक चौंका देने वाला दावा किया है —सिर्फ 19 दिनों में 7 राज्यों से 17 BLOऔर Polling Officers की मौतें रिपोर्ट हुई हैं.
यह सिर्फ संख्या नहीं, यह लोकतंत्र की उस अदृश्य मशीनरी की त्रासदी है, जिस पर भारत का चुनाव तंत्र टिका हुआ है.
उनके अनुसार, वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर कथित वोट चोरी कराने के लिए SIR का जबरदस्त दबाव बनाया जा रहा है, और इसी दबाव में BLOs आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं. सवालों का यह तूफ़ान अब प्रतिदिन ज़ोर पकड़ रहा है.
7 राज्यों से आई मौतों की सूची: लोकतंत्र का काला सच
सुप्रिया श्रीनेत की पोस्ट में दर्ज नाम हर भारतीय को झकझोर देने के लिए काफी हैं.ये वे लोग हैं जिन्हें संविधान ने चुनावी प्रक्रिया की नींव कहा—BLOs.
गुजरात
ऊषा बेन – सहायक BLO
कल्पनावेन – सहायक BLO
अरविंद वाढ़ेर – BLO
रमेश – BLO
पश्चिम बंगाल
शांति मुनि – BLO
रिंकू तरफदार – BLO
नमिता – BLO
उत्तर प्रदेश
विजय कुमार वर्मा – BLO
केरल
अनीश जॉर्ज – BLO
मध्य प्रदेश
उदयभान सिंह – BLO
भुवन सिंह – BLO
रमाकांत पांडे – BLO
सीताराम गोंड – BLO
राजस्थान
मुकेश जांगिड – BLO
हरिओम – BLO
संतराम – SIR सुपरवाइज़र
तमिलनाडु
जहिता – BLO
आंगनबाड़ी सेविका – आत्महत्या का प्रयास
यह सूची साफ़ बताती है कि यह समस्या स्थानीय नहीं—राष्ट्रीय है. और यह किसी सिस्टम की गलती नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का संकेत है.
क्या SIR का दबाव मौत की असली वजह है?
सुप्रिया श्रीनेत का आरोप बेहद स्पष्ट और गंभीर है,
युद्धस्तर पर वोट चोरी करने के लिए SIR का ज़बरदस्त प्रेशर है.
इस कथन के भीतर कई छुपे हुए सवाल हैं.
क्या SIR का इस्तेमाल वोटर लिस्ट में मनमाने बदलाव करने के लिए किया जा रहा है?
क्या BLOs को अवास्तविक लक्ष्य देकर दबाव में काम कराया जा रहा है?
क्या यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता के बजाय प्रेशर-ड्रिवन मैकेनिज्म बन चुकी है?
सुप्रिया का आरोप है कि BLOs पर इतना अधिक मानसिक दबाव है कि वे आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर हो रहे हैं.
अगर यह सच है, तो यह लोकतंत्र का अब तक का सबसे भयावह दृश्य है.
सुप्रिया श्रीनेत का सीधा आरोप: जिम्मेदार कौन?
उन्होंने अपने पोस्ट में इस संकट के लिए तीन नाम साफ तौर पर जिम्मेदार बताये है ,
चुनाव आयोग
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
उनका सवाल दो टूक है,
ऐसी कौन सी जल्दी है जो एक इंसान की जान से भी ज़्यादा कीमती हो गई?
वह नोटबंदी और लॉकडाउन का जिक्र करते हुए कहती हैं कि इसी तरह के तुग़लकी फैसलों की भारी कीमत देश ने पहले भी चुकाई है.
अब वही दौर BLOs पर टूट रहा है.
सबसे बड़ा सवाल उन्होंने चुनाव आयोग की चुप्पी पर उठाया है.
ड्रामा करने वाले ज्ञानेश गुप्ता जी की चुप्पी ही सबसे बड़ा सवाल है.क्या मृतकों के परिवार से आंख मिलाने की हिम्मत है आपकी?
यह सवाल सिर्फ राजनीतिक नहीं—नैतिक भी है.
BLO का काम आसान नहीं — लेकिन सुरक्षा शून्य क्यों?
BLO चुनाव प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है.
उनका काम
वोटर लिस्ट की सत्यापन
नए वोटर्स का पंजीकरण
फर्जी नाम हटाना
घर-घर जाकर दस्तावेज़ जांच
SIR के दौरान भारी भरकम लक्ष्य पूरा करना
लेकिन इस काम की प्रकृति अब ओवरलोड + ओवरप्रेशर = ओवरस्ट्रेस फॉर्मूला बन चुकी है.
ज़्यादातर BLO
बिना उचित प्रशिक्षण
बिना सुरक्षा
बिना मानसिक स्वास्थ्य सपोर्ट
बिना पर्याप्त वेतन
काम करते हैं.कई राज्य इन्हें अस्थायी या कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त करते हैं.
ज़िम्मेदारी भारी, लेकिन सुरक्षा शून्य—यही इस त्रासदी की जड़ दिखती है.
क्या वोट चोरी के बड़े खेल में BLO पहले शिकार हैं?
वोटर लिस्ट में बदलाव लोकतंत्र की संरचना को बदल सकते हैं.
अगर मतदाता सूची ही पारदर्शी न रहे, तो चुनाव कैसे निष्पक्ष रहेंगे?
यहाँ सवाल यह है कि,
क्या BLOs को मजबूर” करके वोटर लिस्ट में बदलाव करवाया जा रहा है?
क्या SIR का इस्तेमाल चुनावी इंजीनियरिंग के औजार की तरह हो रहा है?
क्या इसका विरोध करने पर BLOs को डांट, सस्पेंशन या दबाव का सामना करना पड़ता है?
इन सवालों के जवाब अगर सामने आए, तो यह भारत की चुनाव प्रणाली के इतिहास का सबसे बड़ा खुलासा हो सकता है.
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लोकतंत्र में कर्मचारियों की मौतें—सबसे खतरनाक संकेत
यदि चुनाव कर्मचारी ही अपनी जान देने पर मजबूर हो जाएं, तो यह सीधे-सीधे बताता है कि सिस्टम में कुछ बहुत गलत है.
BLO की मौतें प्रशासनिक असफलता हैं
चुनाव आयोग की चुप्पी संवैधानिक असफलता है
सरकार की निष्क्रियता राजनीतिक असफलता है
लोकतंत्र की प्रक्रिया उतनी ही मजबूत होती है, जितना उसे संभालने वाला तंत्र.
और जब वही तंत्र टूट रहा है, तो चुनाव की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
निष्कर्ष: जवाबदेही ज़रूरी है, नहीं तो लोकतंत्र लड़खड़ा जाएगा
सुप्रिया श्रीनेत की पोस्ट कोई राजनीतिक हमला नहीं—यह एक चेतावनी है.
देश को यह स्वीकार करना होगा कि,
BLOs की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर तुरंत ध्यान देना जरूरी है
SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी
चुनाव आयोग को हर मौत पर जवाब देना होगा
परिवारों को आर्थिक सहायता और न्याय मिलना चाहिए
सरकार और आयोग दोनों को सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण देना चाहिए
अगर वोट बनाने वाले कर्मचारी ही जिंदा न रहें, तो लोकतंत्र किसके लिए बचेगा?

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