बीमा क्षेत्र में शत प्रतिशत विदेशी निवेश: गरीब और मध्यम वर्ग के भविष्य पर मंडराता खतरा

| BY

Ajit Kumar

भारत
बीमा क्षेत्र में शत प्रतिशत विदेशी निवेश: गरीब और मध्यम वर्ग के भविष्य पर मंडराता खतरा

बीमा कोई मुनाफे का सौदा नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा की आखिरी ढाल है

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,17 दिसंबर — बीमा केवल एक वित्तीय उत्पाद नहीं है, बल्कि आम आदमी के लिए वह भरोसा है, जो उसे जीवन की अनिश्चितताओं से लड़ने की ताकत देता है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश (FDI) को मंजूरी देने वाले विधेयक का कड़ा विरोध करते हुए इस मुद्दे को देश के गरीब, मध्यम वर्ग और कमजोर तबकों से जोड़कर सामने रखा है.

राजद के माननीय सांसद श्री संजय यादव जी ने संसद में इस विधेयक का विरोध करते हुए बेहद संवेदनशील और दूरदर्शी विचार रखा है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि,

बीमा कोई लग्जरी नहीं है, यह जिंदा रहते हुए आदमी की आखिरी उम्मीद और मृत्यु के बाद उसके परिवार का सहारा होता है.

यह वक्तव्य केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि देश के करोड़ों परिवारों की सच्चाई को बयान करता है.

बीमा: मुनाफे का साधन नहीं, सामाजिक सुरक्षा की रीढ़

भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र में काम करती है, बीमा ही वह माध्यम है जो दुर्घटना, बीमारी, मृत्यु या प्राकृतिक आपदा के बाद परिवार को आर्थिक संबल देता है. सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों ने वर्षों तक सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए उन लोगों तक बीमा पहुंचाया, जिन्हें निजी और विदेशी कंपनियां कभी प्राथमिकता नहीं देतीं.

लेकिन जब सरकार बीमा क्षेत्र को लाभ और नुकसान के तराजू पर तौलने लगती है, तो सवाल उठता है कि क्या सामाजिक सुरक्षा की भावना को बाजार की ताकतों के हवाले कर देना उचित है?

शत प्रतिशत FDI: विदेशी कंपनियों की प्राथमिकता क्या होगी?

माननीय सांसद संजय यादव जी ने बेहद अहम सवाल उठाया कि,

जब सरकार ही बीमा क्षेत्र को लाभ और नुकसान के तराजू पर तौलने लगे, तो विदेशी कंपनियां देश के गरीबों और मध्यम वर्ग के हितों का ख्याल क्यों रखेंगी?

विदेशी कंपनियों का मुख्य उद्देश्य मुनाफा होता है, न कि सामाजिक कल्याण. ऐसे में आशंका स्वाभाविक है कि,

प्रीमियम महंगे होंगे

गरीब और ग्रामीण इलाकों की उपेक्षा होगी

जोखिम वाले वर्गों को बीमा से बाहर किया जाएगा

दावों (Claims) के निपटान में जटिलताएं बढ़ेंगी

इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ेगा, जिनके लिए बीमा जीवन और मृत्यु के बीच का फर्क तय करता है.

सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों की भूमिका कमजोर होगी

बीमा क्षेत्र में 1शत प्रतिशत विदेशी निवेश से सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियां धीरे-धीरे कमजोर होंगी. यह वही कंपनियां हैं जिन्होंने,

किसानों को फसल बीमा दिया

मजदूरों को दुर्घटना बीमा से जोड़ा

गरीब परिवारों को न्यूनतम प्रीमियम पर सुरक्षा दी

राजद का मानना है कि यह विधेयक निजीकरण को बढ़ावा देकर सार्वजनिक संस्थानों को खत्म करने की साजिश का हिस्सा है, जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा.

ये भी पढ़े :सत्ता के अहंकार पर सत्य की भारी जीत: नेशनल हेराल्ड केस पर अदालत का बड़ा फैसला
ये भी पढ़े :मनरेगा का नाम बदलने की मानसिकता क्या है?

गरीब और मध्यम वर्ग के भविष्य से खिलवाड़

भारत में मध्यम वर्ग पहले ही महंगाई, बेरोजगारी और स्वास्थ्य खर्च से जूझ रहा है. ऐसे में अगर बीमा भी महंगा और जटिल हो गया, तो यह वर्ग पूरी तरह असुरक्षित हो जायेगा.

बीमा का उद्देश्य जोखिम को साझा करना होता है, न कि उसे व्यापार में बदल देना. विदेशी निवेश के नाम पर अगर बीमा को केवल मुनाफे का जरिया बना दिया गया, तो यह सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ होगा.

राष्ट्रीय जनता दल का स्पष्ट स्टैंड

राष्ट्रीय जनता दल ने हमेशा से गरीब, पिछड़े, दलित और मध्यम वर्ग के हितों की राजनीति किया है. बीमा क्षेत्र में शत प्रतिशत FDI के विरोध में उठी आवाज इसी प्रतिबद्धता का प्रमाण है.

राजद नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री श्री तेजस्वी यादव जी के नेतृत्व में पार्टी लगातार ऐसे फैसलों का विरोध कर रही है, जो आम जनता की सुरक्षा को खतरे में डालता हैं.

निष्कर्ष: बीमा को बाजार नहीं, भरोसा रहने दिया जाए

बीमा कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य जरूरत है. इसे पूरी तरह विदेशी कंपनियों के हवाले करना देश की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर कर सकता है.

माननीय सांसद श्री संजय यादव जी द्वारा संसद में उठाई गई आवाज न केवल राजनीतिक विरोध है, बल्कि देश के करोड़ों परिवारों के भविष्य की चिंता भी है.जरूरत है कि सरकार इस विधेयक पर पुनर्विचार करे और बीमा को मुनाफे के नहीं, बल्कि मानवता और सामाजिक सुरक्षा के नजरिये से देखे.

Trending news

Leave a Comment