दलित होना आज भी अपराध क्यों बनता जा रहा है?

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Ajit Kumar

तीसरा पक्ष आलेखभारत
भारत में दलितों के खिलाफ जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता का प्रतीकात्मक दृश्य

कानून के बावजूद भेदभाव और हिंसा की जड़ें अब भी समाज में गहरी

तीसरा पक्ष आलेख पटना ,16 जनवरी— संविधान के बाद भी क्यों बना है सवाल,दलित होना आज भी अपराध क्यों है?,यह सवाल केवल सामाजिक बहस नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ा एक गंभीर सच है. भारत का संविधान समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय की गारंटी देता है. अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष कानून, आरक्षण व्यवस्था और सुरक्षा प्रावधान मौजूद हैं.इसके बावजूद, देश के कई हिस्सों में दलितों के खिलाफ भेदभाव, अपमान और हिंसा की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्टों के अनुसार, हर साल अनुसूचित जातियों के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या चिंता बढ़ाने वाली रही है. सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि दर्ज मामलों के अलावा बड़ी संख्या में घटनाएं रिपोर्ट ही नहीं हो पातीं है .

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सदियों पुरानी जाति व्यवस्था

भारत की जाति व्यवस्था हजारों वर्षों से सामाजिक ढांचे को प्रभावित करती रही है.मनुस्मृति जैसी प्राचीन व्यवस्थाओं ने समाज को ऊंच-नीच में बांट दिया है.दलित समुदायों को लंबे समय तक शिक्षा, भूमि, संसाधनों और सम्मान से वंचित रखा गया.

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस अन्याय के खिलाफ संघर्ष करते हुए संविधान में समानता, अस्पृश्यता की समाप्ति और सामाजिक न्याय को मूल अधिकार बनाया. वर्ष 1950 में संविधान लागू होने के साथ ही अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया गया, लेकिन सामाजिक सोच को बदलना कानून से कहीं अधिक कठिन साबित हुआ है.

वर्तमान हालात: आंकड़े क्या कहते हैं

NCRB की Crime in India रिपोर्ट के अनुसार

अनुसूचित जातियों के खिलाफ हर दिन औसतन 80 से अधिक अपराध दर्ज होते हैं.

इनमें हत्या, बलात्कार, मारपीट, सामाजिक बहिष्कार और संपत्ति से वंचित करने जैसे मामले शामिल हैं.

ग्रामीण क्षेत्रों में जातिगत हिंसा के मामले अपेक्षाकृत अधिक पाए जाते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, कई मामलों में पीड़ित परिवार पुलिस तक पहुंचने से डरता है या सामाजिक दबाव के कारण शिकायत दर्ज नहीं करा पाता है.

रोज़मर्रा का भेदभाव: जो आंकड़ों में नहीं दिखता

विशेषज्ञों के अनुसार, दलितों के साथ होने वाला भेदभाव केवल हिंसक घटनाओं तक सीमित नहीं है.

मंदिर प्रवेश पर रोक

अलग बर्तनों में चाय या पानी

सार्वजनिक आयोजनों में अलग बैठाना

स्कूलों में बच्चों के साथ भेदभाव

गांवों में सामाजिक बहिष्कार

ये घटनाएं अक्सर,सामान्य परंपरा कहकर छिपा दी जाती हैं, लेकिन इनके सामाजिक और मानसिक प्रभाव गहरा होता हैं.

कानून मौजूद, लेकिन अमल कमजोर क्यों

भारत में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम जैसे सख्त कानून मौजूद हैं. इसके बावजूद, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि,

FIR दर्ज करने में आनाकानी, कमजोर जांच, गवाहों पर दबाव, लंबी न्यायिक प्रक्रिया

इन कारणों से पीड़ितों को न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं. कई मामलों में दोषियों को सजा नहीं मिल पाती, जिससे डर और अविश्वास का माहौल बनता है.

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सामाजिक सोच और सत्ता संरचना

समाजशास्त्रियों के मुताबिक, जातिवाद केवल व्यक्तिगत मानसिकता नहीं, बल्कि सत्ता और संसाधनों के नियंत्रण से जुड़ा मुद्दा है. भूमि, रोजगार और स्थानीय सत्ता पर प्रभुत्व बनाए रखने के लिए कई जगहों पर जातिगत वर्चस्व का इस्तेमाल किया जाता है.

दलितों की शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी बढ़ने के साथ ही कुछ क्षेत्रों में टकराव भी बढ़ा है, जिसे कई विशेषज्ञ सामाजिक परिवर्तन का प्रतिरोध बताते हैं.

विशेषज्ञों की राय

दिल्ली स्थित एक सामाजिक अध्ययन संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, जब तक, शिक्षा प्रणाली में सामाजिक समानता पर ज़ोर, पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही, त्वरित न्याय, सामुदायिक स्तर पर संवाद, नहीं बढ़ेगा, तब तक केवल कानून सामाजिक बदलाव नहीं ला सकते.

निष्कर्ष: समाधान की दिशा में सोच

दलित होना आज भी अपराध क्यों है—इस सवाल का जवाब केवल कानून की किताबों में नहीं, बल्कि समाज की सोच में छिपा है। समाधान के लिए ज़रूरी है कि, कानून का निष्पक्ष और सख्त पालन हो, पीड़ितों को सुरक्षा और भरोसा मिले, शिक्षा और संवाद के जरिए सामाजिक चेतना बढ़े, राजनीति और प्रशासन संवेदनशील भूमिका निभाए.

लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि समाज का कोई भी वर्ग डर और अपमान के बिना सम्मानपूर्वक जीवन जी सके. जाति आधारित भेदभाव न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि मानवता के भी विरुद्ध है.

स्रोत: NCRB, Ministry of Social Justice & Empowerment, NCSC, PIB और BBC Hindi, The Hindu, Indian Expres

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