सीमा विवाद से लेकर व्यापार तक – क्यों चीन के सामने झुक रही है भारत सरकार?
तीसरा पक्ष ब्यूरो लखनऊ, 12 सितंबर 2025 – समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक बार फिर मोदी सरकार की विदेश नीति को कठघरे में खड़ा किया है. उन्होंने कहा कि भारत सरकार बार-बार अपनी कूटनीति में नाकाम साबित हुई है और जनता ने इसे कई मौकों पर महसूस किया है. सपा के आधिकारिक एक्स (पूर्व ट्विटर) अकाउंट से साझा किए गए एक वीडियो में अखिलेश यादव को मंच से यह बयान देते हुए देखा गया, जहां वे किसानों, सीमा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर बोल रहे थे.
यह वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है. विदेश नीति को लेकर विपक्ष के तेवर तेज हो गया है. वहीं समर्थक भाजपा सरकार की उपलब्धियों का बचाव कर रहे हैं. सवाल यह है कि अखिलेश के ये आरोप कितने गंभीर हैं और इनका राजनीतिक असर क्या होगा.
चीन और अमेरिका पर केंद्रित आलोचना
अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा सरकार अमेरिका के दबाव में आकर चीन की तरफ झुक रही है. उनका तर्क है कि चीन भारत का भरोसेमंद साझेदार कभी नहीं हो सकता, क्योंकि एक तरफ वह सीमा पर अतिक्रमण करता है और दूसरी तरफ भारतीय उत्पादों को नुकसान पहुँचाने के लिए अपने सस्ते सामान से बाजार भर देता है.
उन्होंने साफ कहा कि भारत को चीन से 24 घंटे सतर्क रहना चाहिए. लद्दाख में चीनी घुसपैठ और पूर्वी लद्दाख की गलवान झड़प जैसी घटनाएँ भारत की विदेश नीति की कमजोरियों को दर्शाती हैं. पूर्व राजनयिक जमिनी भगवती भी पहले कह चुके हैं कि अनुच्छेद 370 के बाद चीन ने भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की और भारत ने इसे नजरअंदाज कर दिया.
विदेश नीति पर विपक्ष की पुरानी नाराज़गी
यह आलोचना कोई नई बात नहीं है. जुलाई 2025 में लोकसभा में बोलते हुए अखिलेश यादव ने,ऑपरेशन सिंदूर को खुफिया नाकामी का प्रतीक बताया था। उन्होंने पाकिस्तान के साथ अचानक हुए संघर्षविराम पर सवाल उठाए और कहा कि आतंकवादियों की घुसपैठ पर सरकार जवाबदेही से बच रही है.
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इतना ही नहीं, उन्होंने राफेल सौदे को भी कटघरे में खड़ा किया और सवाल किया कि क्या यह सौदा वास्तव में भारत की सैन्य ताकत बढ़ा रहा है या नहीं. आत्मनिर्भर भारत नीति पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि भारत धीरे-धीरे सिर्फ एक व्यापारी देश बनता जा रहा है. जबकि विनिर्माण और उत्पादन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है.
पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में गिरावट
भारत की विदेश नीति की असफलताओं के कई उदाहरण विपक्ष गिनाता है –
मालदीव में चीन समर्थक सरकार का आना और भारत की पकड़ कमजोर होना.
नेपाल के साथ मानचित्र विवाद और सीमा संबंधी तनाव.
बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और भारत विरोधी माहौल.
कनाडा के साथ खालिस्तान मुद्दे पर गहराता तनाव.
साथ ही, रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत की तटस्थता को तो सराहा गया, लेकिन वैश्विक दक्षिण के नेता के रूप में भारत की भूमिका कमजोर हो गया.विपक्षी नेता संजय झा ने तो यहां तक कहा कि विदेश नीति में असली कूटनीति की जगह प्रधानमंत्री का व्यक्तिगत पीआर हावी हो गया है.
अमेरिका-भारत संबंध और ट्रंप का टैरिफ संकट
अगस्त 2025 में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वापसी की संभावनाओं के बीच अमेरिका ने भारत पर कड़े व्यापारिक टैरिफ लगाए गये. इसके कारण भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान हुआ और आयात-निर्यात संतुलन बिगड़ गया.
अखिलेश यादव का कहना है कि मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ दोस्ताना रिश्ते खराब कर दिए हैं.उन्होंने कहा कि यह विदेश नीति की नाकामी है कि अब भारत को चीन का सहारा लेना पड़ रहा है. जबकि वही चीन सीमा पर सबसे बड़ा खतरा है.
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में रिश्ते बेहतर करने चाहिए.ताकि भारतीय छात्रों और पेशेवरों को अवसर मिल सके.
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सुरक्षा और रक्षा नीति पर सवाल
विदेश नीति के साथ-साथ अखिलेश यादव ने रक्षा नीतियों को भी कटघरे में खड़ा किया है. उन्होंने अग्निवीर योजना को गलत बताते हुए कहा कि पुरानी भर्ती प्रणाली बहाल की जानी चाहिये. उनके अनुसार, सीमाओं की सुरक्षा तभी मजबूत होगी जब सेना के पास पर्याप्त संसाधन और स्थायी भर्ती व्यवस्था होगी.
विपक्ष का आरोप है कि रक्षा खर्च और स्वदेशी हथियारों पर पर्याप्त ध्यान न देने से भारतीय सेना की ताकत प्रभावित हो रही है.
राजनीतिक असर और आगे की राह
फिलहाल भाजपा ने अखिलेश यादव के इस ताज़ा हमले का कोई औपचारिक जवाब नहीं दिया है. पार्टी अक्सर विपक्षी दलों पर राष्ट्रविरोधी बयानबाज़ी का आरोप लगाती रही है.
हालांकि, अखिलेश का कहना है कि उनकी आलोचना राष्ट्रहित के लिए है.उन्होंने कहा कि विदेश नीति टकराव पर नहीं, बल्कि शांति और साझेदारी पर आधारित होनी चाहिये.
जैसे-जैसे 2027 लोकसभा चुनाव करीब आएंगे, विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहेंगे. विपक्ष इन्हें सरकार की सबसे बड़ी कमजोरियां बता रहा है, जबकि भाजपा इन्हें अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश करेगी.
निष्कर्ष
अखिलेश यादव के ताज़ा बयान ने एक बार फिर भारत की विदेश नीति पर बहस छेड़ दिया है.पड़ोसी देशों के साथ बिगड़ते रिश्ते, अमेरिका-चीन संतुलन की चुनौती, और घरेलू स्तर पर रक्षा नीति पर उठते सवाल आने वाले महीनों में राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकते हैं.
अब देखना यह होगा कि मोदी सरकार इन आरोपों का ठोस जवाब देती है या विपक्ष इस मुद्दे को चुनावी हथियार बनाकर आगे बढ़ाता है.
नोट : यह रिपोर्ट समाजवादी पार्टी के आधिकारिक एक्स पोस्ट और विभिन्न समाचार स्रोतों पर आधारित है.
मेरा नाम रंजीत कुमार है और मैं समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर (एम.ए.) हूँ. मैं महत्वपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर गहन एवं विचारोत्तेजक लेखन में रुचि रखता हूँ। समाज में व्याप्त जटिल विषयों को सरल, शोध-आधारित तथा पठनीय शैली में प्रस्तुत करना मेरा मुख्य उद्देश्य है.
लेखन के अलावा, मूझे अकादमिक शोध पढ़ने, सामुदायिक संवाद में भाग लेने तथा समसामयिक सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रमों पर चर्चा करने में गहरी दिलचस्पी है.



















