अपना–पराया का खेल: देश को कौन बाँट रहा है और क्यों?

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Ajit Kumar

तीसरा पक्ष आलेखभारत
अपना–पराया का खेल: देश को कौन बाँट रहा है और क्यों?

क्या भारत को जानबूझकर तोड़ा जा रहा है?

तीसरा पक्ष आलेख पटना —भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन साथ ही सबसे विविध समाजों में से एक भी. यहाँ धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और संस्कृति की असंख्य परतें हैं. यही विविधता भारत की पहचान और ताकत रहा है.लेकिन हाल के वर्षों में एक सवाल बार-बार उभरता है कि,क्या भारत को योजनाबद्ध तरीके से ,अपना और “पराया में बाँटा जा रहा है?

यह सवाल केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं रहा. यह अब सोशल मीडिया की टाइमलाइन, टीवी डिबेट, चुनावी भाषण और आम नागरिक की सोच में प्रवेश कर चुका है.यह लेख इसी सवाल की जड़ तक जाने की कोशिश है.

अपना–पराया की राजनीति क्या होती है?

अपना–पराया की राजनीति का अर्थ है समाज को पहचान के आधार पर बाँटना.

किसी एक वर्ग को राष्ट्र का असली प्रतिनिधि बताया जाता है.

दूसरे वर्ग को, संदेह, खतरा या समस्या के रूप में पेश किया जाता है.

यह राजनीति डर पैदा करती है—डर कि अगर,वे मजबूत हो गए तो,हम कमजोर हो जाएंगे. इसी डर से वोट, समर्थन और सत्ता हासिल किया जाता है.

इतिहास गवाह है: विभाजन कोई संयोग नहीं था

भारत में विभाजन की राजनीति कोई नई खोज नहीं है.
ब्रिटिश शासन ने इसे बाकायदा नीति के रूप में अपनाया है फूट डालो और राज करो.

औपनिवेशिक रणनीतियाँ, धार्मिक आधार पर अलग चुनाव क्षेत्र, 1905 का बंगाल विभाजन,

हिंदू-मुस्लिम अलगाव को संस्थागत रूप देना, इन नीतियों का अंतिम परिणाम 1947 का विभाजन था, जिसने लाखों लोगों की जान ली है और पीढ़ियों तक असर छोड़ा है.

आज़ादी के बाद भी क्यों नहीं रुका यह खेल?

संविधान निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्षता, समानता और बंधुत्व को भारत की आत्मा बनाया.
लेकिन सच्चाई यह है कि राजनीति में पहचान आधारित ध्रुवीकरण कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.

1980–90 के दशक में, मंडल राजनीति, धार्मिक आंदोलनों, ने समाज में नई दरारें पैदा किया है. आज वही राजनीति और ज्यादा आक्रामक, संगठित और तकनीक-सक्षम रूप में लौट आई है.

आज के भारत में, अपना–पराया के नए औज़ार

चुनावी ध्रुवीकरण: वोट बैंक की गणित

आज चुनावों में, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं, और पहचान आधारित भावनाएँ आगे आ जाता हैं.
ध्रुवीकरण राजनीति को जीत दिला सकता है, लेकिन समाज को हार मिलता है.

सोशल मीडिया: नफरत का सबसे तेज़ माध्यम

सोशल मीडिया ने लोकतंत्र को आवाज़ दी है , लेकिन साथ ही अफवाहों को पंख भी दे दिया है.

आधे-अधूरे वीडियो, संदर्भ से काटी गई बातें, भड़काऊ हेडलाइन्स, कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती हैं. यह डिजिटल ज़हर वास्तविक जीवन में अविश्वास और हिंसा में बदल जाता है.

मीडिया ट्रायल और शोर की राजनीति

कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म सवाल पूछने के बजाय फैसला सुनाने लगे हैं.टीआरपी की होड़ में, मुद्दों को सनसनीखेज बनाया जाता है.

हम बनाम वे की भाषा इस्तेमाल होती है, इससे लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ता है.

भाषा और क्षेत्र के नाम पर खाई

उत्तर बनाम दक्षिण, हिंदी बनाम क्षेत्रीय भाषाएँ, स्थानीय बनाम प्रवासी— ये सभी मुद्दे भी, पराया की भावना को हवा देता हैं.
जबकि भारत की ताकत उसकी भाषाई और क्षेत्रीय विविधता ही रहा है.

आर्थिक असमानता: असली मुद्दा, गलत दिशा

महंगाई, बेरोज़गारी और असमान विकास से पैदा गुस्से को अक्सर, धर्म या जाति की ओर मोड़ दिया जाता है.
इससे असली समस्याएँ जस की तस रह जाती हैं.

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जब समाज बंटता है, तो देश क्या खोता है?

सामाजिक ताना-बाना: अविश्वास, डर और हिंसा सामान्य होने लगती है.

आर्थिक नुकसान: निवेश, विकास परियोजनाएँ और रोजगार प्रभावित होता हैं.

युवाओं का भविष्य : नई पीढ़ी सवाल पूछने के बजाय नफरत सीखती है.

अंतरराष्ट्रीय छवि : दुनिया भारत को एकजुट शक्ति की बजाय आंतरिक रूप से बंटा हुआ देखती है.

देश को बाँटने वाले कौन हैं?

देश को बाँटने वाले कोई एक व्यक्ति या पार्टी नहीं हैं.वे सभी ताकतें इसमें शामिल हैं जो,

सत्ता के लिए डर बेचती हैं.

असली सवालों से ध्यान भटकाती हैं,

नागरिकों को पहचान की कैद में बाँधती हैं,

लेकिन यह खेल तभी चलता है, जब समाज उसे स्वीकार करता है.

समाधान: एकजुट भारत कैसे संभव है?

शिक्षा और संवैधानिक चेतना: संविधान केवल किताब नहीं, जीवन मूल्य है. बराबरी, स्वतंत्रता और बंधुत्व को व्यवहार में लाना होगा

जवाबदेह राजनीति : विकास, रोजगार और शिक्षा को राजनीति का केंद्र बनाना होगा.

मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी: सूचना देनी है, उकसाना नहीं, सवाल पूछना हैं, फैसला नहीं सुनाना है .

नागरिक विवेक : हर साझा किया गया पोस्ट, हर किया गया कमेंट, हर डाला गया वोट— देश की दिशा तय करता है.

निष्कर्ष: बाँटने से नहीं, जोड़ने से बनेगा भारत

अपना–पराया का खेल भारत की आत्मा के खिलाफ है.
यह खेल अल्पकालिक राजनीतिक फायदे दे सकता है, लेकिन दीर्घकालिक राष्ट्रीय नुकसान तय है.

महात्मा गांधी की एकता, डॉ. अंबेडकर का संविधान, और भारत की विविधता, यही हमारी असली शक्ति है.

अगर हम एक रहेंगे, तो कोई हमें बाँट नहीं सकता. एकजुट भारत ही सशक्त भारत है.

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