दिसंबर में रामलीला मैदान में कांग्रेस की रैली – गहलोत का पहला बड़ा संकेत
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,20 नवंबर 2025 — भारतीय राजनीति में इन दिनों जो घटनाक्रम तेज़ी से बदल रहे हैं, उनमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का हालिया बयान राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है.X (Twitter) पर साझा किए गए उनके वक्तव्य ने न सिर्फ सत्ता पक्ष पर सवाल उठाए बल्कि मीडिया की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणियाँ कीं है.
गहलोत ने साफ कहा कि देश में एक खतरनाक खेल खेला जा रहा है जिसमें अब लक्ष्य कांग्रेस ही नहीं बल्कि पूरा विपक्ष हो गया है. उनका कहना है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए अब मीडिया को अपनी अंतरात्मा से सवाल पूछने होंगे.
इस लेख में हम उनके बयान, राजनीतिक संकेतों, और आने वाली बड़ी राजनीतिक गतिविधियों पर गहराई से नज़र डालेंगे.
दिसंबर में रामलीला मैदान में कांग्रेस की रैली – गहलोत का पहला बड़ा संकेत
अशोक गहलोत ने मीडिया को संबोधित करते हुए बताया कि कांग्रेस हाईकमान ने हाल ही में महत्वपूर्ण निर्णय लिया है.वैणुगोपाल द्वारा ब्रीफ की गई बैठक में तय हुआ कि दिसंबर के पहले सप्ताह में दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल रैली आयोजित की जाएगी.
रैली का मुख्य मुद्दा होगा — SIR या संबंधित मुद्दा, जैसा संदर्भ है) और इसके आधार पर आगे की रणनीति तैयार की जाएगी.
गहलोत ने साफ कहा की,
फैसले बिना सोचे-समझे नहीं होते. पहले रैली हो लेने दीजिए, उसके बाद आगे की रणनीति बनेगी.
उनके इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस फिलहाल किसी बड़े कदम—जैसे चुनाव बहिष्कार या EVM पर सीधा संघर्ष—को बिना सामूहिक सहमति के अपनाना नहीं चाहती.
चुनाव का बहिष्कार अभी निर्णय नहीं—पहले रैली, फिर रणनीति
मीडिया ने उनसे पूछा कि कई नेताओं की राय है कि EVM के चलते चुनावों का बहिष्कार होना चाहिए.इस पर गहलोत ने शांत लेकिन सख्त जवाब दिया.
रामलीला मैदान में रैली होने दीजिए.फैसले बिना सोच-विचार के नहीं हो सकते.
यह बयान बताता है कि कांग्रेस संगठनात्मक रूप से अभी विकल्पों पर विचार कर रही है.पार्टी EVM की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए भी किसी बड़े राजनीतिक कदम से पहले जनसभा के जरिए जनता की नब्ज़ टटोलना चाहती है.
कांग्रेस मुक्त भारत नहीं, अब कांग्रेस मुक्त विपक्ष की कोशिश – गहलोत का बड़ा आरोप
अपने बयान में गहलोत ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय सत्ता पर गंभीर आरोप लगाए.उन्होंने कहा कि,
पहले मोदी कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते थे. अब कांग्रेस मुक्त विपक्ष की बात करने लगे हैं.यह देश के अंदर खतरनाक खेल है.
यह टिप्पणी संकेत देती है कि गहलोत का मानना है कि विपक्ष की ताकत कमज़ोर करने का एक संगठित प्रयास चल रहा है, जिससे लोकतांत्रिक ढाँचे पर सीधा खतरा है.
उनके अनुसार, राजनीतिक संतुलन तब ही स्वस्थ रहता है जब सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी भूमिकाओं में सशक्त हों.यदि विपक्ष को कमजोर किया जाता है, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है.
मीडिया अपनी अंतरात्मा से पूछे—लोकतंत्र कैसे बचेगा?
गहलोत का सबसे तीखा बयान मीडिया को लेकर था.उन्होंने आरोप लगाया कि,
पीएमओ से तय होता है कि कौन सी खबर जाए, कौन सी पंचलाइन बने और कौन सी खबर दबाई जाए. मीडिया जानता है पर बोलता नहीं.
उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि मुख्यधारा मीडिया अपनी अंतरात्मा से सवाल पूछे, क्योंकि इतिहास उन्हें भी उनके कामों के आधार पर याद रखेगा.
उनकी टिप्पणी का सार यह है कि मीडिया लोकतंत्र की रीढ़ है, और यदि रीढ़ ही कमज़ोर हो जाए तो शासन-व्यवस्था का संतुलन टूट जाता है.
क्या वास्तव में लोकतंत्र खतरे में है? – विश्लेषण
अशोक गहलोत का बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि मौजूदा व्यवस्था पर सीधा सवाल है.
आइए देखें कि उनके दावों के पीछे कौन-कौन से प्रमुख संदर्भ छिपे हैं:
विपक्ष का लगातार कमजोर होना
पिछले कुछ वर्षों में विपक्षी दलों पर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई, पार्टी टूटने की घटनाएँ और चुनावी परिदृश्य में असंतुलन देखा गया है.
मीडिया का पक्षपाती कवरेज
कई पत्रकारों और मीडिया स्टडीज़ रिपोर्ट्स ने संकेत दिया है कि चैनलों पर सत्तापक्ष की खबरें अधिक प्रमुखता से दिखाई जाती हैं.
EVM पर बहस और विपक्ष का अविश्वास
लगातार उठते सवालों ने चुनाव प्रक्रिया पर अविश्वास को बढ़ाया है.
जनता में भ्रम और असंतोष
गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता का संदेश यही इंगित करता है कि राजनीतिक माहौल में असंतुलन चिंता का विषय बन चुका है.
आगामी रैली क्यों महत्वपूर्ण है?
दिसंबर की रामलीला मैदान रैली को कई वजहों से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
कांग्रेस इसे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की संविधान-बचाओ रैली के रूप में पेश कर सकती है.
EVM, SIR और लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों को जनता के बीच लेकर जाने का यह पहला बड़ा मंच होगा.
इस रैली के बाद विपक्ष की आगे की संयुक्त रणनीति निर्धारित हो सकती है—चाहे वह बड़े आंदोलन का रूप हो या चुनावी सुधार की मांग.
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निष्कर्ष: गहलोत का संदेश सिर्फ राजनीति नहीं—एक चेतावनी है
अशोक गहलोत के बयान को यदि राजनीतिक चश्मे से देखा जाए तो यह विपक्ष की तैयारियों का हिस्सा लगता है.
लेकिन यदि इसे लोकतांत्रिक दृष्टि से देखा जाए तो यह एक गंभीर चेतावनी भी है.
मीडिया की भूमिका कमजोर हो रही है
विपक्ष को systematically दबाया जा रहा है
चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल बढ़ रहे हैं
जनता में अविश्वास का माहौल बन रहा है
गहलोत ने अपने संदेश के अंत में कहा,
कृपया देश के हित में आगे आएं, वरना इतिहास माफ़ नहीं करेगा.
यह संदेश सिर्फ मीडिया के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए है.
आने वाले महीनों में रामलीला मैदान की रैली और इसके बाद के फैसले भारतीय राजनीति में एक नए मोड़ की शुरुआत कर सकते हैं.
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