राज्य दमन पर न्यायालय का बड़ा फैसला, नेताओं को राहत
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 16 फरवरी 2026 — बिहार की राजनीति और लोकतांत्रिक आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ उस समय आया जब एमपी/एमएलए न्यायालय ने औरंगाबाद कांड में काराकाट से सांसद राजाराम सिंह सहित सभी आरोपियों को बरी कर दिया है.इस फैसले को वामपंथी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने राज्य दमन के खिलाफ न्याय की ऐतिहासिक जीत बताया है.
माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि अदालत का यह फैसला लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा और राज्य दमन के विरुद्ध संघर्षरत आंदोलनों के लिए बड़ी राहत है. उन्होंने कहा कि यह केवल एक कानूनी जीत नहीं, बल्कि न्याय और जनआंदोलनों की नैतिक विजय भी है.
औरंगाबाद कांड: क्या था पूरा मामला?
2 मई 2012 को औरंगाबाद में छोटू कुशवाहा हत्याकांड की सीबीआई जांच की मांग को लेकर एक विशाल जनप्रदर्शन आयोजित किया गया था. प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण बताया जाता है, लेकिन प्रशासन ने इसे सख्ती से दबाने का फैसला लिया.प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज, गिरफ्तारी और मुकदमों की बौछार कर दिया था..
इस दौरान सांसद राजाराम सिंह समेत कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. आरोप लगाया गया कि उन्होंने हिंसा भड़काई और कानून-व्यवस्था बिगाड़ी है. हालांकि आंदोलनकारियों का कहना था कि वे केवल निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे थे.
समय के साथ यह मामला राजनीतिक दमन और फर्जी मुकदमों का प्रतीक बन गया.कई सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन का उदाहरण बताया.
न्यायालय का फैसला: आरोप निराधार साबित
लंबे कानूनी संघर्ष के बाद एमपी/एमएलए कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि आंदोलनकारी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगाया गया आरोप टिकाऊ नही था .अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा और आरोप मनगढ़ंत प्रतीत होता हैं.
इस फैसले के बाद यह संदेश गया कि शांतिपूर्ण विरोध को अपराध की तरह पेश करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है.अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी संकेत दिया कि प्रशासनिक कार्रवाई संतुलित और संविधानसम्मत होनी चाहिए.
मानवाधिकार आयोग की टिप्पणी भी रही महत्वपूर्ण
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा हुआ था. वर्ष 2017 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बिहार सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए उसे दोषी ठहराया था और जुर्माना भी लगाया था.आयोग का यह कदम इस बात का संकेत था कि प्रदर्शनकारियों के साथ की गई कार्रवाई अनुचित था.
अब न्यायालय के फैसले ने आयोग की उस टिप्पणी को और मजबूत आधार प्रदान किया है, जिससे यह साबित होता है कि उस समय राज्य की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए जाना उचित था.
सुशासन’ बनाम लोकतांत्रिक अधिकारों की बहस
दीपंकर भट्टाचार्य ने फैसले के बाद बयान में कहा कि जिस दौर को सुशासन कहा गया, उसी दौर में पुलिसिया दमन की यह घटना सामने आई. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन ने लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने का प्रयास किया और राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर फर्जी मुकदमा थोपा
उनका कहना है कि अगर न्यायालय ने हस्तक्षेप नहीं किया होता, तो निर्दोष नेताओं और कार्यकर्ताओं को वर्षों तक अन्याय झेलना पड़ता.इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज को दबाने की कोशिश अंततः न्याय के सामने टिक नहीं सकता.
केंद्र सरकार की नीतियों पर भी सवाल
माले महासचिव ने अपने बयान में केंद्र सरकार की नीतियों की भी आलोचना किया है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में देशभर में असहमति की आवाजों पर दबाव बढ़ा है. संसद से लेकर सड़क तक, विरोध और आंदोलनों को कई बार कानूनी और प्रशासनिक तरीकों से रोकने की कोशिश की गई है.
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हाल के दिनों में पार्टी के पूर्व विधायक मनोज मंजिल और राज्य कमिटी सदस्य जितेंद्र पासवान को सजा सुनाया जाना भी इसी क्रम की कड़ी है. इससे यह धारणा मजबूत होता है कि राजनीतिक असहमति को अपराध की तरह पेश किया जा रहा है.
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लोकतंत्र, संविधान और संघर्ष की दिशा
यह फैसला केवल एक कानूनी प्रक्रिया का अंत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का संकेत भी है. जब किसी शांतिपूर्ण आंदोलन पर दमन होता है, तो वह केवल व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर आघात होता है.
भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति, संगठन और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है.औरंगाबाद कांड ने दिखाया कि इन अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है.अदालत के इस निर्णय ने यह संदेश दिया है कि लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने की कोशिशें अंततः कानून और न्याय की कसौटी पर परखा जायेगा.
सामाजिक न्याय की लड़ाई जारी रहेगी
दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि मानवाधिकार और सामाजिक न्याय की लड़ाई दमन और उत्पीड़न से रुकने वाली नहीं है. उनका मानना है कि यह फैसला जनआंदोलनों को नई ऊर्जा देगा और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष और मजबूत होगा.
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में भी पार्टी और जनसंगठन संविधान सम्मत अधिकारों की रक्षा के लिए सड़क से संसद तक आवाज उठाते रहेंगे. यह निर्णय उन सभी आंदोलनों के लिए प्रेरणा है, जो न्याय और अधिकारों की मांग को लेकर संघर्षरत हैं.
निष्कर्ष: न्याय की जीत, लोकतंत्र की मजबूती
औरंगाबाद कांड में सभी आरोपियों की बरी होने का फैसला भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है. यह निर्णय बताता है कि न्यायिक प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन अंततः सच सामने आता है.
यह मामला आने वाले समय में एक उदाहरण के रूप में देखा जाएगा कि राज्य शक्ति के दुरुपयोग के आरोपों के बावजूद न्यायपालिका कैसे संतुलन स्थापित करती है. लोकतंत्र में विरोध की आवाज को दबाना संभव नहीं, क्योंकि संविधान और न्याय की नींव इतनी मजबूत है कि वह हर अन्याय का जवाब देने में सक्षम है.
इस फैसले ने यह भरोसा फिर से मजबूत किया है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता, और अंततः न्याय की जीत होती है.

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