चंद्रशेखर आज़ाद ने यूपी सरकार से कार्रवाई पर जवाब मांगा
तीसरा पक्ष ब्यूरो बरेली (उत्तर प्रदेश), 18 जनवरी 2026— उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के बिशारतगंज थाना क्षेत्र स्थित गांव मोहम्मदगंज से सामने आई एक घटना ने धार्मिक स्वतंत्रता, पुलिस की निरोधात्मक कार्रवाई और संविधान प्रदत्त अधिकारों को लेकर गंभीर बहस छेड़ दिया है.
बताया जा रहा है कि गांव के एक निजी मकान में नमाज़ अदा करने के दौरान 12 लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. इस कार्रवाई को लेकर अब सियासी हलकों से लेकर नागरिक अधिकार समूहों तक सवाल उठा रहा हैं.
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिशारतगंज थाना क्षेत्र के मोहम्मदगंज गांव में कुछ लोग एक निजी घर के भीतर शांतिपूर्वक नमाज़ अदा कर रहे थे. इसी दौरान पुलिस द्वारा निरोधात्मक कार्रवाई करते हुए 12 लोगों को हिरासत में लिया गया.
हालांकि, अब तक कोई ठोस सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि उस समय कानून-व्यवस्था के लिए वास्तविक और तत्काल खतरा मौजूद था या नहीं.
चंद्रशेखर आज़ाद का तीखा सवाल
इस घटना को लेकर भीम आर्मी प्रमुख और सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने सोशल मीडिया के माध्यम से कड़ी प्रतिक्रिया दी है.उन्होंने इसे अत्यंत शर्मनाक और चिंताजनक बताते हुए कहा कि यदि किसी प्रकार का कानून-व्यवस्था संकट नहीं था, तो ऐसी कार्रवाई संविधान की मूल भावना के खिलाफ है.
उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तर प्रदेश सरकार से सीधे सवाल पूछते हुए कहा कि,
यदि कोई वास्तविक खतरा नहीं था, तो निरोधात्मक कार्रवाई किस आधार पर की गई?
क्या अब निजी घर में शांतिपूर्वक इबादत भी पुलिस की अनुमति पर निर्भर होगी?
चंद्रशेखर आज़ाद ने यह भी आरोप लगाया कि इस तरह की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि धार्मिक अल्पसंख्यकों की आस्थाओं को संदेह और दमन की दृष्टि से देखा जा रहा है.
संविधान क्या कहता है?
भारत का संविधान अनुच्छेद 25 के तहत प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता, पूजा-पाठ और धार्मिक आचरण का अधिकार देता है, बशर्ते उससे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य को खतरा न हो.
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार,
यदि कोई धार्मिक गतिविधि निजी स्थान पर, शांतिपूर्ण तरीके से हो रही हो और उससे कानून-व्यवस्था भंग होने की ठोस आशंका न हो,
तो निरोधात्मक कार्रवाई को न्यायसंगत ठहराना कठिन हो जाता है.
निरोधात्मक कार्रवाई पर सवाल
पूर्व पुलिस अधिकारियों और कानूनी जानकारों का मानना है कि निरोधात्मक हिरासत एक गंभीर कदम होता है, जिसका इस्तेमाल केवल तब किया जाना चाहिए जब तत्काल हिंसा, उपद्रव या गंभीर अव्यवस्था की आशंका हो.
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या पुलिस के पास ऐसी कोई विशिष्ट खुफिया सूचना या ठोस आधार था, जो इस कार्रवाई को जरूरी बनाता हो?
सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया
घटना सामने आने के बाद कई नागरिक अधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी चिंता जताई है. उनका कहना है कि यदि इस तरह की कार्रवाइयों को सामान्य बना दिया गया, तो यह धार्मिक स्वतंत्रता पर ठंडा असर डाल सकता है और समाज में अविश्वास का माहौल पैदा कर सकता है.
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सरकार और पुलिस का पक्ष?
समाचार लिखे जाने तक उत्तर प्रदेश पुलिस या जिला प्रशासन की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, जिसमें कार्रवाई के स्पष्ट कारण बताए गए हों.
आमतौर पर पुलिस ऐसे मामलों में एहतियातन कानून-व्यवस्था बनाए रखने का तर्क देती है, लेकिन इस मामले में स्पष्टता की कमी सवालों को और गहरा कर रही है.
रिहाई और जवाबदेही की मांग
भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने सरकार से मांग किया है कि,
हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तत्काल रिहा किया जाए.
इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए.
धर्म के आधार पर की जा रही कथित पुलिसिया मनमानी पर तुरंत रोक लगाई जाए.
बड़ा सवाल: भरोसा कैसे बचे?
विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस और प्रशासन की निष्पक्षता लोकतंत्र की बुनियाद होती है.जब किसी समुदाय को यह महसूस होने लगे कि उसकी धार्मिक गतिविधियों को संदेह की नजर से देखा जा रहा है, तो सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक भरोसे को नुकसान पहुंचता है.
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या हिरासत में लिए गए लोगों को राहत मिलती है या नहीं.
निष्कर्ष
बरेली की यह घटना केवल एक स्थानीय पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, कानून-व्यवस्था और संवैधानिक संतुलन से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करती है.
आवश्यक है कि तथ्यों की पारदर्शी जांच हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि संविधान में निहित अधिकार केवल किताबों तक सीमित न रह जाएं.
स्रोत: चंद्रशेखर आज़ाद के आधिकारिक X अकाउंट पर पोस्ट और सार्वजनिक बयानों के आधार पर

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