भारत नारे से नहीं, संविधान से चलता है: धार्मिक हिंसा पर गंभीर सवाल

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Ajit Kumar

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भारत नारे से नहीं, संविधान से चलता है: धार्मिक हिंसा पर गंभीर सवाल

भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकार

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,13 दिसंबर 2025— भारत एक ऐसा लोकतांत्रिक देश है जिसकी बुनियाद संविधान, कानून और नागरिक स्वतंत्रताओं पर टिका है. यहां हर व्यक्ति को अपनी आस्था मानने, न मानने और व्यक्त करने की आज़ादी है. लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह से धार्मिक पहचान के नाम पर डर, हिंसा और जबरदस्ती की घटनाएँ सामने आ रही हैं, वे न केवल मानवाधिकारों पर चोट हैं बल्कि संवैधानिक मूल्यों के लिए भी एक गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं.

मध्यप्रदेश के झाबुआ ज़िले के पाटड़ी चौकी क्षेत्र की ताज़ा घटना और इससे पहले आगरा में एक बुज़ुर्ग टैक्सी चालक के साथ हुई घटना इसी बढ़ती प्रवृत्ति का उदाहरण हैं. ये घटनाएँ यह सवाल खड़ा करता हैं कि क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ आस्था व्यक्तिगत नहीं, बल्कि भीड़ के दबाव का विषय बनती जा रही है?

झाबुआ की घटना: जब आस्था पर हमला हुआ

झाबुआ ज़िले के पाटड़ी चौकी क्षेत्र में ईसाई समाज के रावजी डामर के साथ जो हुआ, वह किसी एक व्यक्ति पर हमला नहीं था, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार था. कथित रूप से उन्हें जबरन एक धार्मिक नारा बोलने के लिए मजबूर किया गया और मना करने पर उनके साथ मारपीट की गई. यह घटना केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि किस तरह भीड़तंत्र और धार्मिक कट्टरता मिलकर भय का वातावरण बना रही है.

किसी भी नागरिक से उसकी आस्था के बारे में सवाल करना या उसे किसी विशेष धार्मिक नारे के लिए मजबूर करना न तो कानून सम्मत है और न ही नैतिक. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता देता है. इस स्वतंत्रता का अर्थ यही है कि कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी धार्मिक पहचान को अपनाने या प्रदर्शित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.

आगरा की घटना: डर का फैलता दायरा

झाबुआ की घटना कोई अपवाद नहीं है. इससे पहले आगरा में 38 वर्षों से टैक्सी चला रहे बुज़ुर्ग कैब ड्राइवर रहीस के साथ भी इसी तरह की घटना सामने आई थी. ताजमहल मेट्रो पार्किंग में उन्हें धार्मिक नारा बोलने के लिए मजबूर किया गया. मना करने पर उनके साथ बदसलूकी की गई, दाढ़ी खींची गई और धमकियाँ दी गईं.

इस घटना का सबसे दर्दनाक पहलू यह था कि इसका असर केवल पीड़ित तक सीमित नहीं रहा. उनके पूरे परिवार में डर बैठ गया. बेटे अपने पिता से कहने लगे कि वे घर से बाहर न निकलें, टैक्सी बेच दें. यह भय किसी एक परिवार का नहीं, बल्कि उन लाखों अल्पसंख्यक नागरिकों का प्रतीक है जो आज असुरक्षा की भावना में जीने को मजबूर हैं.

धार्मिक नारे और राष्ट्रवाद का भ्रम

धार्मिक नारे किसी की देशभक्ति का प्रमाण नहीं होते. देशभक्ति का संबंध संविधान, कानून और नागरिक कर्तव्यों के पालन से है, न कि किसी विशेष नारे से. जब किसी व्यक्ति को धमकी दी जाती है कि नारा बोलो, नहीं तो अंजाम भुगतो, तो यह न धर्म होता है और न राष्ट्रवाद. यह सीधी-सीधी आतंक की मानसिकता है.

राष्ट्रवाद का अर्थ है—देश के हर नागरिक की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों की रक्षा. जो लोग आस्था को हथियार बनाकर दूसरों को डराते हैं, वे वास्तव में देश की एकता और सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करते हैं.

कानून बनाम भीड़तंत्र

भारत का कानून किसी को भी सरेआम सज़ा सुनाने की इजाज़त नहीं देता. यदि धर्म परिवर्तन या किसी अन्य गतिविधि को लेकर कोई शिकायत है, तो उसका समाधान केवल संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया से ही हो सकता है. सड़क पर भीड़ इकट्ठा कर किसी व्यक्ति को पीटना, अपमानित करना या धमकाना गंभीर अपराध है.

भीड़तंत्र का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह न्याय व्यवस्था को कमजोर करता है. जब लोग कानून अपने हाथ में लेने लगते हैं, तो इसका सीधा नुकसान समाज के सबसे कमजोर वर्गों को होता है.

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सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी

ऐसी घटनाओं में सरकार और प्रशासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है. केवल बयानबाज़ी से काम नहीं चलेगा. दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई, पीड़ितों को सुरक्षा और न्याय, तथा निष्पक्ष जांच,ये सब राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियाँ हैं.

धर्म परिवर्तन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी राजनीति या पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि तथ्यों और कानून के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए. किसी भी आरोप के नाम पर हिंसा को सही ठहराना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है.

बढ़ती धार्मिक हिंसा: एक राष्ट्रीय चिंता

धार्मिक पहचान के आधार पर बढ़ती हिंसा केवल किसी एक राज्य या समुदाय की समस्या नहीं है. यह एक राष्ट्रीय चिंता का विषय है. जबरन धार्मिक नारे लगवाना, अल्पसंख्यकों को डराना और उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर अपमानित करना देश की अंतरात्मा पर आघात है.

आज ज़रूरत है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर ऐसी घटनाओं पर स्पष्ट नीति बनाएं, जवाबदेही तय करें और यह संदेश दें कि भारत में कानून से ऊपर कोई नहीं है.

निष्कर्ष

भारत नारे से नहीं, संविधान से चलता है. यह वाक्य केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र का सार है. आस्था व्यक्तिगत विषय है और इसे किसी पर थोपना संविधान का अपमान है. जो लोग धर्म को लाठी बनाकर दूसरों पर वार करते हैं, वे केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि देश की आत्मा पर हमला करते हैं.

यदि हमें भारत को सचमुच एक मजबूत, समावेशी और लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाना है, तो हमें हर उस सोच का विरोध करना होगा जो डर, नफ़रत और हिंसा को बढ़ावा देती है. कानून का राज तभी सार्थक होगा जब हर नागरिक, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से हो, खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे.

लेख का आधार: चंद्रशेखर आज़ाद (@BhimArmyChief) द्वारा X (Twitter) पर व्यक्त विचारों व सार्वजनिक बयान के अनुसार

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