SC/ST/OBC आरक्षण सुरक्षा को लेकर तेजस्वी सरकार के फैसले को संवैधानिक ढाल देने की मांग तेज
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली 13 फरवरी : बिहार में 65% आरक्षण सीमा को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग अब राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनता जा रहा है.इसी मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के माननीय सांसदों ने संसद भवन परिसर में जोरदार प्रदर्शन किया है. यह प्रदर्शन सामाजिक न्याय, संवैधानिक सुरक्षा और पिछड़े वर्गों के अधिकारों की रक्षा के सवाल को लेकर किया गया, जिसने देशभर में राजनीतिक बहस को नई दिशा दी है.
राजद नेताओं का कहना है कि बिहार में तेजस्वी सरकार द्वारा लागू 65% आरक्षण सामाजिक संतुलन और ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने की दिशा में एक बड़ा कदम था.अब इस आरक्षण को कानूनी चुनौतियों से बचाने और स्थायी सुरक्षा देने के लिए इसे संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करना बेहद जरूरी हो गया है.
आरक्षण सुरक्षा को लेकर संसद में उठा बड़ा सवाल
राजद सांसदों ने अपने प्रदर्शन के दौरान स्पष्ट कहा है कि देश-प्रदेश में SC, ST और OBC वर्गों के आरक्षण के साथ लगातार छेड़छाड़ हो रहा है.उनका आरोप है कि विभिन्न स्तरों पर आरक्षण के प्रावधानों को कमजोर करने की कोशिश किया जा रहा है, जिससे सामाजिक न्याय की मूल भावना प्रभावित हो रहा है.
सांसदों ने नारेबाजी करते हुए कहा कि जब तक 65% आरक्षण को संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को उनका पूरा अधिकार नहीं मिल पाएगा। यह प्रदर्शन केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि संविधानिक अधिकारों की रक्षा का आंदोलन बताया गया।
9वीं अनुसूची क्यों है महत्वपूर्ण?
संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल कानूनों को न्यायिक समीक्षा से विशेष सुरक्षा प्राप्त होती है. इसका अर्थ यह है कि यदि बिहार का 65% आरक्षण इस अनुसूची में शामिल हो जाता है, तो इसे अदालतों में चुनौती देना कठिन हो जाएगा. इसी कारण राजद और सामाजिक न्याय के समर्थक दल लगातार इस मांग को प्रमुखता से उठा रहा हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि 9वीं अनुसूची में शामिल होना किसी भी सामाजिक नीति को स्थायित्व देने का मजबूत संवैधानिक उपाय होता है. यही वजह है कि बिहार मॉडल को सुरक्षित करने के लिए यह मांग लगातार जोर पकड़ रहा है.
सामाजिक न्याय की राजनीति का केंद्र बना बिहार मॉडल
बिहार लंबे समय से सामाजिक न्याय की राजनीति का केंद्र रहा है. मंडल आयोग की सिफारिशों से लेकर आज तक पिछड़े वर्गों के अधिकारों की लड़ाई में बिहार की भूमिका अहम रहा है. 65% आरक्षण का फैसला इसी परंपरा की एक नई कड़ी माना जा रहा है.
राजद नेताओं का तर्क है कि बिहार की सामाजिक संरचना में पिछड़े, दलित और अति पिछड़े वर्गों की बड़ी आबादी है, इसलिए 50% आरक्षण की सीमा सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं थी. इसी असमानता को दूर करने के लिए 65% आरक्षण लागू किया गया था.
SC/ST/OBC आरक्षण चोरी का आरोप
प्रदर्शन के दौरान राजद सांसदों ने यह भी आरोप लगाया है कि देश और कई राज्यों में आरक्षण के अधिकारों को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है. उनका कहना था कि नई नीतियों, भर्ती प्रक्रियाओं और निजीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति से आरक्षण के अवसर कम हो रहा हैं, जिसे उन्होंने, आरक्षण चोरी करार दिया है.
सांसदों का कहना है कि यदि समय रहते संवैधानिक सुरक्षा नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में सामाजिक न्याय की पूरी व्यवस्था खतरे में पड़ सकता है.
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विपक्ष बनाम केंद्र: टकराव के राजनीतिक मायने
इस मुद्दे पर विपक्ष और केंद्र सरकार के बीच टकराव की स्थिति बनता दिखाई दे रहा है. विपक्षी दल जहां इसे सामाजिक न्याय का बड़ा सवाल बता रहा हैं, वहीं सत्तापक्ष इसे राजनीतिक एजेंडा करार दे सकता है. आने वाले सत्रों में यह मुद्दा संसद की बहस का प्रमुख विषय बनने की संभावना है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल बिहार का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे देश में आरक्षण नीति के भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है. यदि 65% आरक्षण को 9वीं अनुसूची में शामिल किया जाता है, तो अन्य राज्य भी इसी तरह की मांग उठा सकता हैं.
सामाजिक प्रभाव और भविष्य की दिशा
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा प्रभाव सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर देखने को मिल सकता है. एक ओर जहां पिछड़े और वंचित वर्गों के बीच इस मांग को लेकर उत्साह है, वहीं दूसरी ओर संवैधानिक और न्यायिक बहस भी तेज होने की संभावना है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह मांग स्वीकार होती है, तो यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा. लेकिन इसके साथ ही संविधान की मूल संरचना और न्यायिक समीक्षा के अधिकार को लेकर भी गहन विमर्श आवश्यक होगा.
निष्कर्ष
संसद भवन में राजद सांसदों का यह प्रदर्शन केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की व्यापक मांग का प्रतीक बन गया है. बिहार के 65% आरक्षण को 9वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है.
अब निगाहें केंद्र सरकार और संसद की कार्यवाही पर टिकी हैं कि क्या इस मांग को स्वीकार कर सामाजिक न्याय के नए अध्याय की शुरुआत होगी या फिर यह मुद्दा लंबे संवैधानिक और राजनीतिक संघर्ष का रूप लेगा.

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