बिहार में जातीय और क्षेत्रीय ध्रुवीकरण की राजनीति: विकास के रास्ते में रोड़ा या विपक्ष की हताशा?

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Ajit Kumar

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प्रेम रंजन पटेल, प्रदेश प्रवक्ता भाजपा – प्रेस बयान पर आधारित विश्लेषणात्मक लेख

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,12 दिसम्बर 2025— बिहार की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां विपक्षी दल जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को फिर से हवा देने की कोशिश में जुटे हुये हैं. चुनावी परिणामों के बाद यह सिलसिला और तेज हो गया है. भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक प्रेम रंजन पटेल ने अपने प्रेस बयान में स्पष्ट कहा है कि विपक्ष जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से भटकाने के लिए जातीय ध्रुवीकरण का सहारा ले रहा है.

बीते वर्षों में बिहार की राजनीति और विकास यात्रा दोनों ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन इस समय राज्य एक निर्णायक दौर से गुज़र रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बुनियादी ढांचा, उद्योग, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और युवाओं के रोजगार को लेकर गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं.ऐसे में विपक्ष द्वारा बार-बार जातीय व क्षेत्रीय भावनाओं को उभारने का प्रयास न सिर्फ प्रासंगिकता खो चुका है, बल्कि जनता की समझदारी के आगे पूरी तरह विफल भी हो रहा है.

विपक्ष की राजनीति क्यों भटक रही है?

बयान में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि जब राज्य विकास की राह पर है, तब विपक्ष क्यों बार-बार वही पुराना और घिसा-पिटा जातीय नैरेटिव दोहराने पर मजबूर है?

कारण साफ हैं,
विपक्ष के पास न स्पष्ट एजेंडा है न विकास का ठोस विज़न.

रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य या उद्योग पर ये दल कोई ठोस वैकल्पिक मॉडल पेश नहीं कर पाते.

न योजना, न नेतृत्व, न भविष्य की दिशा—इस खालीपन को छिपाने के लिए जातीय विभाजन सबसे आसान हथकंडा बन जाता है.

बिहार की जनता यह भली-भांति समझती है कि केवल जातीय नारों से न उनकी ज़िंदगी बदलती है और न उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित होता है . यही कारण है कि राज्य में इस नकारात्मक राजनीति की पकड़ लगातार ढीली पड़ रही है.

बिहार में विकास की नई दिशा: नीतीश कुमार सरकार का फोकस

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज का बिहार वह बिहार नहीं है जिसे कभी पिछड़ेपन और अव्यवस्था का प्रतीक माना जाता था.
राज्य सरकार का फोकस अब पूरी तरह इन बिंदुओं पर है,

उद्योग और निवेश को प्रोत्साहन

राज्य में इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, लॉजिस्टिक हब, MSME सेक्टर और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं चल रही हैं. इससे युवाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं.

महिला उद्यमिता में बढ़ोतरी

बिहार में महिला स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमियों को लगातार मजबूत बनाया गया है.परिणामस्वरूप गांवों तक आर्थिक गतिविधियों का विस्तार हुआ है.

बुनियादी ढांचे का तीव्र विस्तार

सड़क, बिजली, पुल, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल—राज्य में कई प्रोजेक्ट तेजी से पूरे हुए हैं, जो विकास के बड़े संकेत हैं.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सशक्तीकरण

कृषि आधुनिकरण, ग्रामीण सड़कें, बाजार तक पहुंच और पंचायत स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन—इन सबने गांवों की आर्थिक क्षमता को बढ़ाया है.

ऐसे माहौल में विपक्ष द्वारा जातीय भावना भड़काने की कोशिशें जनता को असंगत, भटकावपूर्ण और विकास-विरोधी प्रतीत होती हैं.

जातीय राजनीति का सच: बिहार अब बदल चुका है

प्रेम रंजन पटेल ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिहार की जनता अब समझ चुकी है कि जातीय या क्षेत्रीय उकसावे से,न सड़क बनती है

न बिजली आती है , न उद्योग लगते हैं, न युवाओं को नौकरी मिलती है.

विकास किसी जाति का मुद्दा नहीं—संपूर्ण समाज का मुद्दा है.
एनडीए सरकार की प्राथमिकता भी यही है,विकास, स्थिरता और सामाजिक समरसता.

पिछले वर्षों में जनता ने यह प्रत्यक्ष रूप से देखा है कि जब राजनीति जातीय समीकरणों में उलझती है, तब राज्य वर्षों पीछे चला जाता है. लेकिन जब सरकार सकारात्मक विकास की राह पकड़ती है, तो समाज आगे बढ़ता है.

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विपक्ष की रणनीति—बार-बार एक ही असफल प्रयास

विपक्ष की विफलता सिर्फ यह नहीं कि वे विकास पर एक ठोस मॉडल सामने नहीं रख पाते, बल्कि यह भी कि वे बिहार की बदली हुई मानसिकता को समझने में पूरी तरह असफल हैं.
जनता अब यह मान चुकी है कि,

नकारात्मक राजनीति राज्य को पीछे धकेलती है.

जातीय ध्रुवीकरण सामाजिक सौहार्द को कमजोर करता है.

विकास ही स्थायी समाधान है.

इसलिए विपक्ष के जातीय मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया अब पहले जैसी नहीं है.
पिछले वर्षों में कई बार जनता ने ऐसे दलों को सबक दिया है और संकेत साफ हैं—आगे भी देगी.

निष्कर्ष: बिहार की जनता सकारात्मक राजनीति का साथ दे रही है.

बिहार आज विकास के एक नए अध्याय की ओर बढ़ रहा है. ऐसे समय में जातीय और क्षेत्रीय राजनीति का उभार न सिर्फ राज्य की प्रगति को रोकने की कोशिश है, बल्कि यह उन लोगों की हताशा का संकेत भी है जिनके पास न भविष्य की योजना है और न जनता का विश्वास.

एनडीए सरकार के प्रयासों और जनता की बदलती सोच को देखते हुए यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि बिहार अब जातीय राजनीति के दलदल से बाहर निकल चुका है. जनता अब काम, विकास, स्थिरता और शांति चाहती है—और उसी दिशा में आगे बढ़ भी रही है.

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