सिर्फ चूल्हा नहीं जलता, उम्मीदें भी राख हो रही हैं!

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Ajit Kumar

बिहार
सिर्फ चूल्हा नहीं जलता, उम्मीदें भी राख हो रही हैं! 1650 में जिंदगी: क्या यही है 'न्यू इंडिया' की तस्वीर? रसोइयों का दर्द अब सड़कों पर

1650 में जिंदगी: क्या यही है ‘न्यू इंडिया’ की तस्वीर? रसोइयों का दर्द अब सड़कों पर

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना 18 जुलाई:बिहार की करीब साढ़े तीन लाख स्कूल रसोइयां जो मिड-डे मील योजना की रीढ़ हैं.आज भी केवल ₹1,650 मासिक मानदेय पर काम करने को मजबूर हैं. सोशल मीडिया पर वायरल हो रही पोस्ट्स और जमीन पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर इस मुद्दे को चर्चा में ला दिया है.@Shashi_Aipwa से जुड़ी शशि यादव ने अपने अधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर एक भावुक अपील के ज़रिए इन रसोइयों की मांगों को उजागर किया.जिसमें उन्हें बेहतर वेतन और सम्मान दिलाने की बात की गई है.उन्होंने पोस्ट करते हुये लिखा कि,

प्रधानमंत्री जी, लंबी दूरी की मिसाइलें फेकने से पहले एक नज़र बिहार की उन साढ़े तीन लाख महिला रसोइयों के चेहरों पर भी डालिएगा. जो आपकी ही योजना में महीने भर के लिए मात्र ₹1650 में अपनी मेहनत और पसीना बहा रही हैं. बरसों से सदन से सड़क तक उनकी आवाज़ उठाई जा रही है.लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है.अब उनकी फरियाद लेकर वे मार्च पर हैं. क्या अब भी देश की सबसे शांत आवाज़ें अनसुनी रह जाएंगी?

मिड-डे मील योजना की असली नायिकाएं

हर दिन हज़ारों बच्चों को पौष्टिक भोजन परोसने वाली ये रसोइयां स्कूलों में एक अहम भूमिका निभाती हैं.सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी वे अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करती हैं. इसके बावजूद उन्हें जो पारिश्रमिक दिया जाता है. वह न्यूनतम जीवनयापन के लिए भी अपर्याप्त है.

वर्षों से जारी संघर्ष अब भी अधूरी सुनवाई

रसोइयों की यह लड़ाई कोई नई नहीं है. X और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद रिपोर्ट्स के अनुसार, वे वर्षों से अपनी मांगों को लेकर सरकार और प्रशासन से अपील कर रही हैं. कभी सड़कों पर उतर कर तो कभी विधानसभा के सामने प्रदर्शन कर उन्होंने अपनी आवाज़ बुलंद किया है. लेकिन ठोस निर्णय अब तक कोई नहीं लिया गया है.

क्या बदलेगा हालात? सरकार पर है अब निगाहें

बिहार सरकार की ओर से मानदेय बढ़ाकर ₹3,000 से ₹8,000 करने पर विचार जरूर किया जा रहा है.लेकिन यह अभी केवल प्रस्ताव स्तर पर है. अगर ₹8,000 की राशि लागू किया जाता है.तो इससे राज्य सरकार पर हर महीने लगभग ₹550 करोड़ का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा. फिर भी. यह निर्णय लाखों रसोइयों के परिवारों के लिए उम्मीद की एक नई रोशनी बन सकता है.

रसोइयों की प्रमुख मांगें:

  • ₹18,000 मासिक वेतन
  • सरकारी कर्मचारी का दर्जा
  • मातृत्व अवकाश
  • भविष्य निधि और पेंशन
  • स्वास्थ्य बीमा
  • सामाजिक सुरक्षा लाभ

इनमें से अधिकतर रसोइयां हाशिए पर रहने वाले समुदायों से आती हैं. और ये मांगें उनके लिए केवल आर्थिक नहीं सामाजिक सुरक्षा और सम्मान से जुड़ी हुई हैं.

जन आंदोलन का रूप लेता विरोध

बिहार राज्य मिड-डे मील रसोइया संयुक्त संघर्ष समिति के नेतृत्व में 7 जनवरी को शुरू हुई हड़ताल ने अब एक बड़ा आंदोलन रूप ले लिया है. इसमें बिहार राज्य स्कूल रसोइया संघ के साथ-साथ कई ट्रेड यूनियन और राजनीतिक दलों खासतौर पर CPI-ML के विधायकों का समर्थन भी मिल रहा है.आंदोलनकारियों की मांग है कि जब तक उनकी मांगे नहीं मानी जातीं वे पीछे नहीं हटेंगी.

आर्थिक नहीं, सामाजिक न्याय का मुद्दा

रसोइयों की यह मांग केवल वेतन तक सीमित नहीं है. यह लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय और गरिमा से जुड़ा सवाल है.उनका उचित मूल्यांकन न केवल उन्हें सशक्त करेगा, बल्कि मिड-डे मील योजना को भी मजबूती देगा जिससे लाखों बच्चों को बेहतर पोषण मिलेगा और उनकी स्कूल में उपस्थिति बढ़ेगी.

निष्कर्ष:

बिहार की स्कूल रसोइयों की यह लड़ाई हमारे समाज की उस अनदेखी हकीकत को उजागर करती है. जहां ज़रूरी काम करने वालों को अक्सर सबसे कमतर माना जाता है. अब समय है कि सरकार इन मेहनती महिलाओं की बात सुने और ठोस कदम उठाए।प्रस्तावित वेतन वृद्धि और सामाजिक सुरक्षा लाभों की शुरुआत इस दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है. यह सिर्फ एक वेतन वृद्धि नहीं, बल्कि इंसाफ की पहली किस्त होगी.

नोट :विभिन्न समाचार पत्रों और सोशल मीडिया स्रोतों के जानकारी के आधार पर यह प्रकाशित किया गया है .

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