मॉब लिंचिंग: भीड़ का उन्माद या प्रशासन की विफलता?
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,13 दिसंबर — बिहार एक बार फिर एक दिल दहला देने वाली घटना के कारण राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है.नवादा जिले में फेरी लगाने वाले अतहर हुसैन की धर्म पूछकर की गई निर्मम पिटाई और मौत ने न सिर्फ मानवता को शर्मसार किया है, बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़ा कर दिया हैं. इस अमानवीय घटना को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद का बयान न केवल पीड़ित परिवार की पीड़ा की आवाज़ है, बल्कि समाज और सरकार के लिए एक चेतावनी भी है.
मॉब लिंचिंग: भीड़ का उन्माद या प्रशासन की विफलता?
एजाज अहमद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज बिहार में स्थिति यह हो गई है कि लोग धर्म और जाति पूछकर कानून अपने हाथ में ले रहे हैं.मॉब लिंचिंग केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि यह राज्य की प्रशासनिक असफलता और सामाजिक गिरावट का खतरनाक संकेत है. जब भीड़ खुद को कानून से ऊपर समझने लगती है, तब लोकतंत्र और संविधान दोनों खतरे में पड़ जाते हैं.
नवादा की घटना इस बात का प्रमाण है कि अपराधियों के मन से कानून का भय समाप्त हो चुका है. जिस नृशंसता के साथ अतहर हुसैन की पिटाई की गई, वह किसी भी सभ्य समाज में अस्वीकार्य है.
सरकार की चुप्पी: सबसे बड़ा सवाल
राजद प्रवक्ता ने सबसे बड़ा सवाल यही उठाया कि इतनी गंभीर और हृदय विदारक घटना पर सरकार और प्रशासन की खामोशी क्यों है? जब गृहमंत्री लॉ एंड ऑर्डर पर बड़े-बड़े दावे करते हैं, तब ऐसी घटनाएं उन दावों की पोल खोल देती हैं.
सरकार की चुप्पी अपराधियों का मनोबल बढ़ाती है. यह संदेश जाता है कि सत्ता और पुलिस तंत्र अपराधियों को रोकने में असमर्थ है या इच्छुक नहीं है. यही वजह है कि अपराधी बेखौफ होकर इंसानियत को कुचलने का साहस कर रहे हैं.
सैंया भय कोतवाल तो डर काहे का
एजाज अहमद ने बेहद सटीक कहावत के माध्यम से मौजूदा हालात को बयान किया,
जब शासन और प्रशासन की पकड़ कमजोर हो, तब अपराधी यही मानते हैं कि उन्हें कोई सजा नहीं मिलेगी. यही सोच मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं को जन्म देती है.
मॉब लिंचिंग: संविधान और मानवाधिकारों का उल्लंघन
भारत का संविधान हर नागरिक को जीवन और समानता का अधिकार देता है.मॉब लिंचिंग सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है. यह सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला है.
जब किसी से उसका धर्म पूछकर उसे मारा जाता है, तब सवाल सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और भाईचारे का भी होता है.
स्पीडी ट्रायल और सख्त सजा: समय की मांग
एजाज अहमद ने मांग किया है कि इस मामले में अविलंब सभी दोषियों की गिरफ्तारी हो और स्पीडी ट्रायल चलाकर उन्हें कठोर सजा दिया जाये.
स्पीडी ट्रायल इसलिए जरूरी है ताकि,
पीड़ित परिवार को समय पर न्याय मिले
समाज में यह संदेश जाए कि कानून से कोई ऊपर नहीं
भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगे
यदि दोषियों को त्वरित और कठोर सजा नहीं मिली, तो यह अपराधियों के लिए एक नजीर बन जाएगा, न कि समाज के लिए.
ये भी पढ़े :देश में वोट चोरी का आरोप: चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर कांग्रेस के गंभीर सवाल
ये भी पढ़े :दीघा में डॉक्टर संग पुलिस की मारपीट: क्या सम्राट चौधरी के आदेश बेअसर?
समाज की जिम्मेदारी भी उतनी ही अहम
यह सच है कि सरकार और प्रशासन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है, लेकिन समाज भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता. नफरत, अफवाह और उन्माद के खिलाफ आवाज़ उठाना हर नागरिक का कर्तव्य है.
मॉब लिंचिंग को अगर आज नहीं रोका गया, तो कल कोई भी इसका शिकार हो सकता है.
निष्कर्ष
नवादा की घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक चेतावनी है.यह चेतावनी सरकार के लिए है, प्रशासन के लिए है और समाज के हर उस व्यक्ति के लिए है जो चुप रहकर अपराध को बढ़ावा देता है.
एजाज अहमद की मांग बिल्कुल स्पष्ट है कि,
दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी, स्पीडी ट्रायल और सख्त सजा.
तभी बिहार में कानून का राज बहाल हो सकेगा और मानवता पर लगे इस कलंक को मिटाया जा सकेगा.

I am a blogger and social media influencer. I have about 5 years experience in digital media and news blogging.



















