बिहार में नौकरी-रोजगार के दावों पर सियासी घमासान: श्वेत पत्र की मांग

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Ajit Kumar

बिहार
पटना में राजद प्रवक्ता चित्तरंजन गगन द्वारा NDA सरकार के रोजगार दावों पर प्रेस बयान

चित्तरंजन गगन ने NDA के रोजगार दावों को बताया झूठ

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 15 फरवरी : बिहार में नौकरी और रोजगार को लेकर सियासी बयानबाजी एक बार फिर तेज हो गया है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने राज्य की एनडीए सरकार पर बड़ा हमला बोलते हुए नौकरी और रोजगार के दावों को चुनौती दिया है और सरकार से श्वेत पत्र जारी करने की मांग किया है.उनका कहना है कि 2020 से 2025 के बीच 50 लाख युवाओं को नौकरी और रोजगार दिए जाने का दावा ,सरासर झूठ है और यदि इसमें सच्चाई है तो सरकार विभागवार पूरी जानकारी सार्वजनिक करे.

एनडीए के दावों पर उठे सवाल

राजद प्रवक्ता का आरोप है कि एनडीए के नेता लगातार यह दावा करते रहा हैं कि राज्य में बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध कराया गया है, लेकिन इस दावे का कोई स्पष्ट आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है. उन्होंने मांग किया कि सरकार यह बताए कि किस विभाग में कब और कितनी नियुक्तियां हुईं, किन प्रखंडों में किन लोगों को रोजगार दिया गया और 2005 से अब तक कुल कितनी नियुक्तियां हुईं तथा कितने कर्मचारी सेवानिवृत्त हुआ है .

राजनीतिक रूप से यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि बिहार में युवाओं के बीच बेरोजगारी हमेशा बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है.ऐसे में राजद की यह मांग सीधे तौर पर सरकार के रोजगार संबंधी दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है.

1990 से 2005 के दौर का उल्लेख

राजद प्रवक्ता ने अपने बयान में 1990 से 2005 के बीच के शासनकाल का उल्लेख करते हुए दावा किया है कि उस समय विभिन्न विभागों में नियमित बहाली होती था.उन्होंने कहा कि उस दौर में पिछड़े, अति पिछड़े, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के युवाओं को बड़ी संख्या में सरकारी सेवाओं में अवसर मिला. लेक्चरर, प्रोफेसर, दारोगा, सिपाही, शिक्षक, इंजीनियर और प्रशासनिक सेवाओं में नई नियुक्तियों का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि नए जिले, अनुमंडल, अंचल, प्रखंड और थानों के सृजन से बड़े पैमाने पर पदों का निर्माण हुआ.

उन्होंने सात नए विश्वविद्यालयों की स्थापना का हवाला देते हुए कहा है कि इसके अनुरूप शिक्षक और कर्मचारियों की नियुक्ति भी की गई. साथ ही राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री काल में शिक्षा मित्रों की 1.90 लाख बहाली का भी जिक्र किया गया, जिसे दलित और अति पिछड़े इलाकों में शिक्षा विस्तार का बड़ा कदम बताया गया है.

2005 के बाद संविदा नियुक्तियों का आरोप

राजद प्रवक्ता ने 2005 के बाद सत्ता में आई एनडीए सरकार पर आरोप लगाया है कि नियमित नियुक्तियों की जगह संविदा आधारित बहाली की परंपरा शुरू कर दिया गया है .उनका कहना है कि इससे स्थायी रोजगार के अवसर कम हुआ है और युवाओं को अस्थिर रोजगार की ओर धकेला गया है.इस आरोप के जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश किया है कि वर्तमान सरकार रोजगार सृजन के बजाय ठेका आधारित नियुक्तियों को बढ़ावा दे रही है.

महागठबंधन सरकार और नियुक्तियों का दावा

उन्होंने 2022 में बनी महागठबंधन सरकार का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय तत्कालीन उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के दबाव में विभिन्न विभागों में नियमित नियुक्तियों की प्रक्रिया शुरू हुई. उनके अनुसार बिहार लोक सेवा आयोग, राज्य कर्मचारी चयन आयोग, तकनीकी सेवा आयोग, पुलिस अवर सेवा आयोग और केंद्रीय चयन पर्षद (सिपाही) सहित विभिन्न आयोगों के माध्यम से कुल 4,30,999 पदों पर बहाली हुई, जिसका श्रेय तेजस्वी यादव को दिया जाना चाहिये.

यह दावा राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे महागठबंधन अपने शासनकाल को रोजगार सृजन के संदर्भ में बेहतर बताने की कोशिश कर रहा है, जबकि एनडीए अपने कार्यकाल के उपलब्धियों का दावा करता रहा है.

कौशल विकास योजना पर भी सवाल

राजद प्रवक्ता ने रोजगार से जुड़े दावों को और भी रोचक बताते हुए कौशल विकास योजना पर भी सवाल उठाया है, उनका कहना है कि इस योजना के तहत 6.33 लाख युवाओं को प्रशिक्षण देने और उन्हें रोजगार देने का दावा किया गया, लेकिन संसद में पेश कैग रिपोर्ट में इस योजना की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया गया हैं.रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि कई पंजीकृत नाम, ट्रेनिंग सेंटर और प्लेसमेंट देने वाली कंपनियां फर्जी पाया गया है .

यह आरोप यदि तथ्यात्मक रूप से प्रमाणित होता है तो राज्य सरकार की रोजगार नीतियों पर बड़ा असर डाल सकता है. हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.

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श्वेत पत्र की मांग क्यों अहम?

राजद की ओर से श्वेत पत्र की मांग का सीधा अर्थ है कि सरकार को नियुक्तियों और रोजगार से जुड़े सभी आंकड़े पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करने होंगे. इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि वास्तव में कितनी सरकारी नौकरियां दिया गया और कितने युवाओं को रोजगार मिला है .बिहार जैसे राज्य में, जहां हर साल लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता हैं, यह मुद्दा सामाजिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से बेहद संवेदनशील है.

राजनीतिक परसेप्शन बनाम जमीनी हकीकत

राजद प्रवक्ता का कहना है कि सरकार केवल परसेप्शन बनाकर जनता को गुमराह कर रही है, जबकि जमीनी हकीकत इसके उलट है. यह बयान सीधे तौर पर सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है और आगामी राजनीतिक माहौल में रोजगार को बड़ा मुद्दा बना सकता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में रोजगार का सवाल केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी क्षेत्र, उद्योग, स्टार्टअप और कौशल विकास योजनाओं से भी जुड़ा है. ऐसे में केवल सरकारी नियुक्तियों के आंकड़ों से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती.फिर भी सरकारी नौकरियों का मुद्दा हमेशा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली रहा है.

निष्कर्ष

बिहार में नौकरी और रोजगार को लेकर शुरू हुआ यह सियासी विवाद आने वाले समय में और तेज हो सकता है. राजद द्वारा श्वेत पत्र की मांग से सरकार पर दबाव बढ़ेगा कि वह अपने दावों के समर्थन में ठोस आंकड़े पेश करे. वहीं सरकार यदि विस्तृत डेटा जारी करती है तो इससे वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी. फिलहाल इतना तय है कि रोजगार का मुद्दा बिहार की राजनीति के केंद्र में बना रहेगा और आने वाले दिनों में इस पर और तीखी बहस देखने को मिल सकती है.

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