20 साल की,निकम्मी नीतियों का आरोप, बहुआयामी सुधार का वादा
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 16 सितंबर 2025 – बिहार की सियासत में शिक्षा फिर से बड़ा मुद्दा बन गई है.राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने एनडीए सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि पिछले दो दशकों की गलत नीतियों ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था को, गहरी खाई में धकेल दिया है.आरजेडी के शिक्षक प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में बोलते हुए और अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट के ज़रिए उन्होंने शिक्षा क्षेत्र की खामियों को विस्तार से गिनाया है.

एनडीए सरकार की नीतियों पर निशाना
तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि बिहार में शिक्षा की गिरती गुणवत्ता के लिए एनडीए की,निकम्मी नीतियां जिम्मेदार हैं. उनका कहना है कि शिक्षकों से गैर-शिक्षण कार्य करवाना, पारदर्शिता की कमी, और बुनियादी सुविधाओं की उपेक्षा ने हालात को बद से बदतर कर दिया है. उन्होंने कहा कि इससे स्कूल ड्रॉपआउट दर में तेजी आई है, शिक्षकों की भारी कमी हो गई है और साक्षरता दर देश में सबसे निचले स्तर पर अटकी हुई है.
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बिहार की शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत
साक्षरता दर: बिहार की साक्षरता दर अब भी केवल 70.9% है – पुरुषों में 79.7% और महिलाओं में 60.5%। यह लैंगिक असमानता और शिक्षा तक सीमित पहुंच को दर्शाता है.
स्कूल ड्रॉपआउट: आर्थिक सर्वेक्षण 2024 के अनुसार, हर चौथा बच्चा कक्षा 8 के बाद स्कूल छोड़ देता है. लड़कियों की ड्रॉपआउट दर 40.3% है, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है.
शिक्षकों की कमी: राज्य में लगभग 1.35 लाख शिक्षकों की कमी है.हाल ही में हुए तबादलों के बाद दर्जनों स्कूल शिक्षकविहीन हो गए, जबकि सैकड़ों स्कूल सिर्फ एक शिक्षक पर निर्भर हैं.
बुनियादी ढांचा: 2025 तक भी 183 स्कूल बिना इमारत के चल रहे हैं, 20 हजार से ज्यादा स्कूलों में बिजली नहीं है और 69% में चिकित्सा सुविधा का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल संसाधन लगभग न के बराबर हैं.

तेजस्वी का पलटवार और वादा
तेजस्वी ने कहा कि उनकी 17 महीने की सरकार के दौरान शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा दिया गया और 2.20 लाख से अधिक शिक्षकों की पारदर्शी भर्ती हुई.उन्होंने वादा किया कि सत्ता में आने पर –
वित्त रहित संस्थानों के शिक्षकों को नियमित वेतनमान मिलेगा.
सभी विद्यालयों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी.
शिक्षा में डिजिटल संसाधनों का विस्तार किया जाएगा.
और शिक्षा नीति में व्यावसायिक प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जाएगी.
उच्च शिक्षा भी पिछड़ी
तेजस्वी ने यह भी सवाल उठाया कि NIRF 2025 रैंकिंग में बिहार का कोई भी कॉलेज शामिल नहीं हुआ है. उनका आरोप है कि सरकार उच्च शिक्षा को लेकर गंभीर नहीं है.पटना यूनिवर्सिटी में व्यावसायिक पाठ्यक्रम बंद होना इसका बड़ा उदाहरण है.
शिक्षा बन रही है चुनावी मुद्दा
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार जैसे युवा-बहुल राज्य में शिक्षा सुधार सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है. एनडीए सरकार ने भले ही 60,954 करोड़ रुपये का शिक्षा बजट पेश किया है, लेकिन जमीनी स्तर पर सुधार बेहद सीमित नजर आते हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, गरीबी, पारिवारिक दबाव और शिक्षा की खराब गुणवत्ता ही ड्रॉपआउट और कमजोर परिणामों के मुख्य कारण हैं.
निष्कर्ष
तेजस्वी यादव के आरोप और वादे साफ संकेत देते हैं कि आगामी चुनावों में शिक्षा एक केंद्रीय मुद्दा बनने जा रही है. सवाल यह है कि क्या इस बार राजनीतिक बयानबाज़ी से आगे बढ़कर ठोस कार्ययोजना भी सामने आएगी? फिलहाल इतना तय है कि बिहार की दो पीढ़ियां पहले ही इस अव्यवस्था का खामियाज़ा भुगत चुकी हैं और अब अगली पीढ़ी को बेहतर भविष्य देने के लिए गंभीर पहल की ज़रूरत है.
नोट : यह न्यूज तेजस्वी यादव के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और विभिन्न समाचारपत्रों के जानकारी के आधारआधार पर प्रकाशित किया गया है.

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