बिहार में,65 लाख वोटर बाहर, भाजपा अछूती क्यों? माले

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Ajit Kumar

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बिहार में,65 लाख वोटर बाहर, भाजपा अछूती क्यों? माले

चुनाव आयोग या ओमीशन आयोग? माले का सधा हुआ हमला

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 24 अगस्त 2025 —बिहार की राजनीति में इन दिनों मतदाता सूची को लेकर जबरदस्त हलचल मचा हुआ है.भाकपा-माले (CPI-ML) के महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग और सत्ताधारी भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कई गंभीर सवाल उठाये हैं.

चुनाव आयोग या ओमीशन आयोग? माले का सधा हुआ हमला

उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर, प्रक्रिया के दौरान बिहार में करीब 65 लाख मतदाताओं को बाहर कर दिया गया है. और चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से किसी भी भाजपा समर्थक के नाम कटने की कोई खबर सामने नहीं आया है.

इलेक्शन कमीशन अब इलेक्शन ओमीशन बन गया है:माले

का. दीपंकर ने तीखा तंज कसते हुए कहा है कि,चुनाव आयोग अब इलेक्शन ओमीशन बन गया है. आयोग की भूमिका निष्पक्ष नहीं दिख रहा है. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर राज्य में सबसे अधिक बीएलए (Booth Level Agents) भाजपा का हैं और वे इतने ही सक्रिय हैं. तो उन्होंने अब तक एक भी आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई?

उन्होंने यह भी दावा किया कि भाजपा और चुनाव आयोग के बीच गहरी सांठगांठ का संकेत साफ दिख रहा है.

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सुप्रीम कोर्ट में आयोग की सफाई पर सवाल

22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग द्वारा दिये गये दलील पर भी का.दीपंकर भट्टाचार्य ने सवाल खड़ा किया कि आयोग ने कोर्ट में कहा था कि,राजनीतिक दलों के पास 1.5 लाख बीएलए हैं. फिर वे क्या कर रहे हैं? इस पर माले महासचिव ने जोर देकर कहा कि मतदाता सूची का जिम्मा राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि संविधान के तहत खुद चुनाव आयोग का है.

बीएलए को लेकर डेटा में विसंगति

का. दीपंकर ने बताया कि चुनाव आयोग माले के 1500 बीएलए होने की बात कह रहा है. जबकि बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के डैशबोर्ड पर यह संख्या 2500 दर्ज है. हैरानी की बात यह है कि इनमें से करीब 1000 बीएलए अब तक लंबित रखा गया है.यानी उन्हें अभी तक अधिकारिक मान्यता नहीं मिला है.

उन्होंने पूछा कि, जब आयोग खुद ही बीएलए को मान्यता देने में असफल है. तो उनसे यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे आपत्ति दर्ज करें?

आपत्तियों पर लगाई गई सीमा भी सवालों के घेरे में

माले महासचिव ने बताया कि एक बीएलए एक दिन में अधिकतम 30 आपत्तियां ही दर्ज कर सकता है.ऐसे में अगर किसी बूथ पर 50 या 100 विसंगतियां हैं. तो बाकी नाम कैसे बचाया जायेगा? उन्होंने आरोप लगाया कि यह सीमा खुद ही यह दर्शाता है कि चुनाव आयोग नाम हटाने को प्राथमिकता दे रहा है. न कि उन्हें बचाने को.

अब वोट की चोरी नहीं होने देंगे

का. दीपंकर ने कहा कि बिहार की जनता अब जाग चुकी है. इस बार वोट की चोरी नहीं होने दिया जायेगा.वोटर अधिकार यात्रा को ज़बर्दस्त जनसमर्थन मिल रहा है.

उन्होंने कहा कि एसआईआर की अपारदर्शी प्रक्रिया और एनडीए की 20 वर्षों की विफलता के खिलाफ जनता के अंदर जबरदस्त आक्रोश है और बदलाव की तीव्र इच्छा साफ झलक रहा है.

निष्कर्ष

भाकपा-माले ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर की गई कटौती को एक सुनियोजित साजिश करार दिया है. चुनाव आयोग की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए माले ने इस मुद्दे को आगामी विधानसभा चुनावों के लिए एक बड़ा राजनीतिक सवाल बना दिया है.

अब देखना यह होगा कि चुनाव आयोग इस पर क्या स्पष्टीकरण देता है और विपक्षी दल मिलकर इसे किस तरह एक चुनावी आंदोलन में तब्दील करते हैं.

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