सुप्रीम कोर्ट के यूजीसी नियमों पर फैसले ने फिर खड़ा किया संस्थागत भेदभाव का सवाल
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,30 जनवरी— भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव का मुद्दा एक बार फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है. रोहित वेमुला, पायल तड़वी और हाल ही में आईआईटी बॉम्बे के छात्र दर्शन सोलंकी की मौतें केवल व्यक्तिगत त्रासदियां नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने देश के शैक्षणिक ढांचे में मौजूद गहरे सामाजिक भेदभाव को उजागर किया है. इसके बावजूद, अब तक किसी भी अदालत ने इन मामलों को संस्थागत हत्या के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं दिया .
इसी पृष्ठभूमि में, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा कैंपसों में जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए जारी किए गए समानता संबंधी नियमों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में जातिविहीन समाज की दिशा में एक प्रतिगामी बाधा बताया जाना, कई सवाल खड़ा करता है.
रोहित, पायल और दर्शन: अलग संस्थान, एक जैसी पीड़ा
2016 में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला की मौत ने देश को झकझोर दिया था.इसके बाद 2019 में मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज में आदिवासी छात्रा पायल तड़वी और 2023 में आईआईटी बॉम्बे के दलित छात्र दर्शन सोलंकी की मौत ने यह स्पष्ट कर दिया कि समस्या किसी एक संस्थान तक सीमित नहीं है.
इन सभी मामलों में पीड़ितों के परिवारों और सामाजिक संगठनों ने लगातार जातिगत उत्पीड़न, मानसिक दबाव और संस्थागत उपेक्षा के आरोप लगाया.हालांकि जांच आयोग बने, रिपोर्टें आईं, लेकिन न्यायिक स्तर पर इन्हें कभी भी एक व्यवस्थित सामाजिक समस्या के रूप में स्वीकार नहीं किया गया. है
अदालतों की चुप्पी और संस्थागत अस्वीकार्यता
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था अक्सर जातिगत भेदभाव को व्यक्तिगत टकराव या अनुशासनात्मक विवाद के रूप में देखती है, न कि एक संरचनात्मक समस्या के रूप में.यही कारण है कि अब तक किसी भी फैसले में यह नहीं कहा गया कि इन मौतों के पीछे संस्थागत विफलता जिम्मेदार था .
यही चुप्पी उन परिवारों और समुदायों के लिए सबसे पीड़ादायक है, जो न्याय की उम्मीद में वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ते रहते हैं.
यूजीसी के नियम और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
यूजीसी ने हाल के वर्षों में विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया था. कि वे एंटी-डिस्क्रिमिनेशन सेल, शिकायत निवारण तंत्र और समानता से जुड़े दिशा-निर्देश लागू करें.इन नियमों को आलोचक भले ही कमजोर और अपर्याप्त बताते हों, लेकिन यह पहली बार था जब संस्थागत स्तर पर जातिगत भेदभाव को स्वीकार करते हुए कोई ढांचा तैयार किया गया.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि ऐसे नियम जातिविहीन समाज के लक्ष्य के विपरीत हैं, कई सामाजिक चिंतकों को असहज करती . सवाल यह है कि जब समाज पहले से ही जातिविहीन नहीं है, तो समानता के लिए बनाए गए नियम कैसे प्रतिगामी हो सकते हैं?
दीपंकर भट्टाचार्य का सवाल: असहज लेकिन ज़रूरी
सीपीआई(एमएल) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने इसी संदर्भ में तीखा सवाल उठाया है.उनके अनुसार, यदि अदालतें न तो संस्थागत हत्याओं को मान्यता देती हैं और न ही उन्हें गंभीर सामाजिक समस्या मानती हैं, फिर समानता के प्रयासों को ही बाधा बताना एक गहरे विरोधाभास को दर्शाता है.
उनका तर्क है कि यह स्थिति स्वयं इस बात का प्रमाण है कि जाति आज भी हमारे सामाजिक ढांचे को नियंत्रित और संचालित कर रही है,चाहे हम इसे मानें या न मानें.
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क्या जातिविहीन समाज एक संवैधानिक आदर्श है या वर्तमान वास्तविकता?
संविधान समानता और सामाजिक न्याय की बात करता है, लेकिन वह यह भी स्वीकार करता है कि ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए विशेष उपाय जरूरी हैं. आरक्षण, सुरक्षा कानून और समानता से जुड़े नियम इसी सोच का परिणाम हैं.
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक कैंपसों में भेदभाव की वास्तविकता मौजूद है, तब तक उसे नकार कर जातिविहीन समाज की बात करना जमीनी सच्चाई से आंख मूंदने जैसा है.
आगे का रास्ता: इनकार नहीं, स्वीकार्यता
आज आवश्यकता इस बात की है कि उच्च शिक्षा संस्थान, न्यायपालिका और नीति-निर्माता भेदभाव के अस्तित्व को स्वीकार करें.बिना स्वीकार्यता के न तो सुधार संभव है और न ही भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सकता है.
रोहित वेमुला से लेकर दर्शन सोलंकी तक की कहानियां केवल अतीत नहीं हैं,वे आज के भारत की सामाजिक हकीकत का आईना हैं. सवाल यह नहीं कि हम जातिविहीन समाज चाहते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम उस समाज तक पहुंचने के लिए सच्चाई का सामना करने को तैयार हैं?
नोट :यह रिपोर्ट दीपंकर भट्टाचार्य के सार्वजनिक बयान और हालिया सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी के संदर्भ पर आधारित है.

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