लाल आंख की बात थी, व्यापार बढ़ गया — चीन पर सुप्रिया श्रीनेत का सरकार से सवाल

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Ajit Kumar

भारत
सुप्रिया श्रीनेत चीन-भारत व्यापार घाटे पर मोदी सरकार की आलोचना करती हुई

चीन से व्यापार घाटा 116 अरब डॉलर पहुँचा, कांग्रेस का सरकार पर सवाल

तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली, 15 जनवरी — भारत और चीन के रिश्तों को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गया है. कांग्रेस नेता और पार्टी की सोशल मीडिया एवं डिजिटल संचार प्रमुख सुप्रिया श्रीनेत ने भारत-चीन व्यापार घाटे को लेकर मोदी सरकार पर गंभीर सवाल खड़ा किया हैं. उनका दावा है कि भारत का चीन से व्यापार घाटा 116 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुका है, जबकि सीमा पर तनाव और सुरक्षा चुनौतियाँ लगातार बनी हुई हैं.

सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया मंच X (पूर्व में ट्विटर) पर एक विस्तृत पोस्ट में कहा कि मोदी सरकार चीन से बेधड़क सामान खरीद रही है, जबकि चीन भारत के रणनीतिक हितों को लगातार चुनौती दे रहा है.उन्होंने सवाल उठाया कि जिस चीन को कभीलाल आंख दिखाने की बात कही गई थी, उसी के साथ व्यापार घाटा ऐतिहासिक स्तर तक कैसे पहुँच गया.

सुप्रिया श्रीनेत का सीधा बयान

मोदी जी, बात तो लाल आंख दिखाने की हुई थी, व्यापार बढ़ाने की थोड़े ही! चीन आज भी हमारी जमीन पर घुसा बैठा है और हम उससे रिकॉर्ड स्तर पर व्यापार कर रहे हैं.

भारत–चीन संबंधों से जुड़े प्रमुख मुद्दे

सुप्रिया श्रीनेत ने अपनी पोस्ट में चीन के खिलाफ कई बिंदुओं को गिनाया. उनके अनुसार, चीन, लद्दाख में भारतीय क्षेत्र में अब भी मौजूद है.

गलवान घाटी में हुई झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हुये.

डोकलाम क्षेत्र के पास सड़कों का निर्माण कर रहा है.

अरुणाचल प्रदेश के स्थानों के नाम बदल रहा है.

भारतीय सीमा के भीतर कथित तौर पर गांव बसा रहा है.

जम्मू-कश्मीर की शक्सगाम घाटी पर दावा करता है.

पाकिस्तान को सैन्य और रणनीतिक सहयोग देता है.

अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों से चीनी पासपोर्ट लेने की बात करता है.

संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ अड़चनें पैदा करता है.

इन आरोपों के बीच कांग्रेस नेता का सवाल है कि जब कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर तनाव बना हुआ है, तो आर्थिक निर्भरता क्यों बढ़ रही है.

व्यापार घाटा क्यों है चिंता का विषय?

अर्थशास्त्रियों के अनुसार, व्यापार घाटा तब चिंता का विषय बनता है जब वह रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी देश के साथ हो. चीन भारत का सबसे बड़ा आयात साझेदार है.इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयों के कच्चे माल, मशीनरी और मोबाइल उपकरणों में भारत की निर्भरता चीन पर काफी अधिक है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्भरता न सिर्फ आर्थिक, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है. सीमा पर तनाव के समय आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने का खतरा बढ़ जाता है.

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सरकार का पक्ष क्या है?

सरकार का अब तक का रुख यह रहा है कि व्यापार और कूटनीति को अलग-अलग देखा जाना चाहिए। सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत घरेलू विनिर्माण बढ़ाने, मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों के जरिए आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहा है.

हालांकि, विपक्ष का तर्क है कि ज़मीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती है .

विश्लेषण: राजनीति या नीतिगत असफलता?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुप्रिया श्रीनेत का हमला ऐसे समय में आया है जब चीन को लेकर देश में पहले से ही संवेदनशीलता है. यह मुद्दा केवल विपक्षी राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि आम जनता के मन में भी सवाल पैदा करता है.
क्या आर्थिक मजबूरी सुरक्षा चिंताओं से बड़ी हो गई है?

निष्कर्ष: सार्वजनिक हित का सवाल

भारत-चीन संबंध सिर्फ कूटनीति का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान, सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है. सुप्रिया श्रीनेत के बयान ने एक बार फिर इस बहस को केंद्र में ला दिया है कि क्या भारत को अपने व्यापारिक फैसलों में भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को अधिक महत्व देना चाहिए.

यह सवाल केवल सरकार या विपक्ष का नहीं, बल्कि देश की भविष्य की दिशा से जुड़ा हुआ है.

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