मुस्लिम महिला के हिजाब से जुड़ा विवाद: क्या यह महिलाओं के सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है?

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Ajit Kumar

बिहार
मुस्लिम महिला के हिजाब से जुड़ा विवाद: क्या यह महिलाओं के सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है?

एक महिला का हिजाब, पूरे लोकतंत्र की परीक्षा बन गया है

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना 15 दिसंबर 2025 — भारत एक ऐसा लोकतांत्रिक देश है जिसकी आत्मा उसके संविधान में बसती है. यह संविधान न सिर्फ नागरिकों को अधिकार देता है, बल्कि उनके सम्मान, आस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा भी करता है. लेकिन जब सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे लोग ही इन मूल्यों पर सवाल खड़ा करने लगें, तो लोकतंत्र की सेहत पर गंभीर चिंता होना स्वाभाविक है. बिहार में हाल ही में सामने आया एक मामला इसी चिंता को और गहरा करता है, जिसमें मुख्यमंत्री द्वारा एक मुस्लिम महिला के चेहरे से कथित तौर पर जबरन हिजाब हटवाने का आरोप लगाया गया है.

क्या है पूरा मामला?

बिहार प्रदेश राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रवक्ता एजाज अहमद ने एक कड़े बयान में आरोप लगाया है कि नियुक्ति पत्र प्रदान करने के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक मुस्लिम महिला के चेहरे से हिजाब हटवाया गया. एजाज अहमद के अनुसार यह केवल एक महिला का नहीं, बल्कि पूरे महिला समाज का अपमान है और साथ ही मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य है.

उनका कहना है कि यह घटना इस बात का संकेत है कि एनडीए सरकार की सोच अल्पसंख्यकों और विशेषकर मुस्लिम समाज के प्रति किस दिशा में जा रही है.

हिजाब: आस्था, पहचान और सम्मान का प्रतीक

हिजाब केवल एक कपड़ा नहीं है. यह करोड़ों मुस्लिम महिलाओं की धार्मिक आस्था, व्यक्तिगत पसंद और पहचान से जुड़ा हुआ विषय है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और उसके अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है.

जब कोई महिला स्वेच्छा से हिजाब पहनती है, तो यह उसका मौलिक अधिकार है. उसे जबरन हटवाना न सिर्फ उस महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि संविधान की मूल भावना के भी खिलाफ है.

महिला सशक्तिकरण या महिला अपमान?

सरकारें अक्सर महिला सशक्तिकरण की बात करती हैं,बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारे दिए जाते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या महिला सशक्तिकरण का मतलब यह है कि राज्य यह तय करे कि महिला क्या पहने और क्या नहीं?

एजाज अहमद का कहना है कि मुख्यमंत्री द्वारा किया गया यह कृत्य महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि महिला अपमान का उदाहरण है. एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी वर्गों, धर्मों और महिलाओं के सम्मान की रक्षा करे, न कि उन्हें असहज स्थिति में डाले.

भाजपा-आरएसएस की राजनीति का प्रभाव?

राजद प्रवक्ता ने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब भाजपा और आरएसएस को खुश करने की राजनीति में लग गए हैं.उनके अनुसार यह घटना इस बात का प्रमाण है कि बिहार में अब संघ की विचारधारा पर आधारित शासन चल रहा है, जहां धार्मिक विविधता और सहिष्णुता के बजाय एकरूपता थोपी जा रही है.

यह आरोप केवल राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक सवाल को जन्म देता है,क्या सत्ता में बने रहने के लिए संवैधानिक मूल्यों से समझौता किया जा रहा है?

संविधान बनाम सत्ता की मानसिकता

भारत का संविधान यह स्पष्ट करता है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा और सभी नागरिक कानून की नजर में समान होंगे. जब राज्य का मुखिया ही किसी एक धर्म की महिला के धार्मिक पहनावे में हस्तक्षेप करता दिखाई दे, तो यह संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन का मामला बन जाता है.

एजाज अहमद ने मुख्यमंत्री से इस पूरे प्रकरण पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है. उनका कहना है कि यह माफी केवल एक महिला के लिए नहीं, बल्कि पूरे महिला समाज और अल्पसंख्यक समुदाय के सम्मान की बहाली के लिए जरूरी है.

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समाज के लिए क्या संदेश जाता है?

ऐसी घटनाएं समाज में गलत संदेश देती हैं.इससे अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ती है और महिलाओं को यह महसूस कराया जाता है कि उनकी पसंद और आस्था का सम्मान नहीं किया जाएगा.

लोकतंत्र में सत्ता का दायित्व जनता को डराना नहीं, बल्कि भरोसा दिलाना होता है.जब भरोसा टूटता है, तो उसका असर सिर्फ राजनीति पर नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ता है.

निष्कर्ष

यह मामला केवल एक हिजाब या एक महिला तक सीमित नहीं है.यह सवाल है संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता, महिला सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों का.अगर आज चुप्पी साध ली गई, तो कल किसी और की पहचान, आस्था या स्वतंत्रता पर सवाल उठ सकता है.

ज़रूरत है कि सरकार इस पूरे प्रकरण पर स्पष्ट और संवेदनशील रुख अपनाए, ताकि यह भरोसा कायम रहे कि भारत और बिहार दोनों ही आज भी संविधान से चलते हैं, किसी विचारधारा के दबाव से नहीं.

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