भारतीय लोकतंत्र बनाम संस्थागत संकटकाल: RJD के आरोपों का विश्लेषण

| BY

Ajit Kumar

बिहार
भारतीय लोकतंत्र बनाम संस्थागत संकटकाल: RJD के आरोपों का विश्लेषण

ECI सुप्रीम कोर्ट को भी बाईपास कर रहा है — क्या यह संवैधानिक संकट है?

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,12 दिसम्बर 2025— भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ मतदाता की आवाज़ सिर्फ अधिकार नहीं बल्कि राष्ट्रीय चरित्र की पहचान मानी जाती है.लेकिन पिछले कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर चल रही बहस ने नए सवाल और नई चिंताएँ खड़ी कर दिया दिया है .इसी संदर्भ में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) द्वारा किया गया ताजा बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन चुका है.

RJD ने अपने आधिकारिक X (Twitter) पोस्ट में आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वास्तविक लड़ाई विपक्षी दलों से नहीं बल्कि भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था से है. पार्टी का दावा है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान अब स्वतंत्र प्रहरी न होकर सरकार के प्रभाव में काम कर रहा हैं. इस कथित प्रभाव के कारण, RJD के अनुसार, लोकतांत्रिक ढांचे की आत्मा पर चोट पहुँच रही है.

चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल

भारत का चुनाव आयोग, संविधान द्वारा स्थापित एक स्वतंत्र संस्था है, जिसे देश में मुक्त, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.लेकिन RJD का आरोप है कि आयोग अब इस मूल उद्देश्य से भटक गया है.

RJD का दावा है कि निर्वाचन आयुक्त भाजपा की गहरी जेब से पैदा हुआ हैं,और अपने पद का इस्तेमाल विपक्षी दलों के मतदाताओं को वोट देने से वंचित करने में कर रहा हैं. यह सीधा आरोप चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है. लोकतंत्र का आधार स्वतंत्र चुनाव है,और यदि यही संस्था विवादों के घेरे में आ जाए तो यह स्थिति स्वाभाविक रूप से खतरनाक मानी जाएगी.

पार्टी का आरोप है कि चुनाव आयोग सर्वोच्च न्यायालय तक को बाईपास करने की प्रवृत्ति दिखा रहा है, जो संवैधानिक संतुलन के लिए चुनौतीपूर्ण है.न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन भारत की लोकतांत्रिक वास्तु का मूल स्तम्भ है. यदि कोई संस्था न्यायपालिका के अधिकार को दरकिनार करने की कोशिश करे, तो यह न केवल संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि लोकतंत्र के लिए गहरी चिंता का विषय भी है.

RJD का बड़ा आरोप: तानाशाही मॉडल की तैयारी

RJD ने अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी पर तानाशाही प्रणाली स्थापित करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है.पार्टी का कहना है कि सरकार और चुनाव आयोग मिलकर ऐसा माहौल तैयार कर रहे हैं जिसमें विपक्ष को निष्प्रभावी किया जा सके.

RJD के मुताबिक,

चुनाव आयोग विपक्ष को समान अवसर (Level Playing Field) देने में असफल रहा है.

सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है.

विपक्षी दलों के मतदाताओं के अधिकार छीने जा रहे हैं.

संवैधानिक संस्थाओं पर सरकार का प्रभाव असहज रूप से बढ़ रहा है.

इन आरोपों से यह स्पष्ट होता है कि RJD भारत की मौजूदा चुनावी व्यवस्था को गंभीर संकट में मानती है.

SIR को लेकर उठ रहे सवाल

RJD के बयान में SIR का ज़िक्र विशेष रूप से किया गया है. पार्टी का कहना है कि मोदी सरकार इस SIR प्रक्रिया को जल्द से जल्द लागू करवाकर खुद को तानाशाह के रूप में स्थापित करना चाहती है. हालांकि SIR क्या है और इसका वास्तविक तंत्र क्या होगा,यह अभी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा है. लेकिन RJD का आरोप है कि चुनाव आयोग में बैठे भ्रष्ट अधिकारी सर्वोच्च न्यायालय की अनदेखी करते हुए इसे आगे बढ़ाने के लिए तत्पर हैं.

यदि ऐसा है, तो यह न केवल राजनीतिक रूप से विवादास्पद है बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे पर भी प्रहार माना जा सकता है. किसी भी नीति या चुनावी प्रक्रिया में सुधार का रास्ता अदालतों और संसद की निगरानी से होकर ही जाना चाहिए.

सांसद सुधाकर सिंह का आरोप और लोकतांत्रिक चेतावनी

RJD के सांसद सुधाकर सिंह ने भी चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं.उनका कहना है कि BJP और प्रधानमंत्री मोदी संविधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने में लगे हैं.

उन्होंने यह कहा कि,

चुनाव आयोग, BJP, PM मोदी और उनके SIR के षड्यंत्र के कारण भारतीय लोकतंत्र पर अभूतपूर्व खतरा मंडरा रहा है.

उनका यह बयान उन सभी चिंताओं को उजागर करता है जो विपक्षी दल लंबे समय से जताते रहे हैं,संस्थागत कब्ज़ा, लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास और असंतोष की आवाज़ों को दबाने के प्रयास.

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में विपक्ष सिर्फ विरोध नहीं बल्कि संतुलन का स्तंभ है. यदि विपक्ष को दबाया जाए, यदि उनकी पहुंच मतदाताओं तक सीमित कर दी जाए, और यदि चुनाव आयोग जैसी संस्थाएँ भरोसा खोने लगें,तो यह स्थिति किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए खतरनाक हो सकती है.

RJD का आरोप चाहे राजनीतिक हो, पर लोकतांत्रिक मूल्यों पर चिंता का उठना स्वाभाविक है.
क्योंकि लोकतंत्र की शक्ति सिर्फ मतपत्र में नहीं, बल्कि विश्वास और पारदर्शिता में होती है.

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जनता के लिए संदेश: लोकतंत्र की रक्षा सामूहिक जिम्मेदारी

RJD के बयान को केवल एक राजनीतिक बयान समझकर अनदेखा नहीं किया जा सकता है.यह लोकतंत्र की नींव से जुड़ा मुद्दा है,और जनता के एक छोटे से वर्ग के बजाय पूरे देश से जुड़ा हुआ है.

यदि संस्थाएँ कमजोर होती हैं तो लोकतंत्र खोखला हो जाता है.
यदि पक्षपात हावी होता है तो जनता की आवाज़ बेअसर हो जाती है.
और यदि संविधान की मर्यादा टूटती है,तो राष्ट्र की आत्मा आहत होती है.

इसलिए आवश्यक है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर उठ रहे सवालों की निष्पक्ष जांच हो, पारदर्शिता बनी रहे और अदालतों का सम्मान सर्वोपरि रखा जाए.

निष्कर्ष

RJD का यह बयान भारतीय राजनीति में नया विवाद अवश्य पैदा करता है, लेकिन यह चिंताओं को अनदेखा करने का बहाना भी नहीं देता.लोकतंत्र बहस, सवाल और जवाबदेही पर चलता है,और यदि कोई पक्ष यह आरोप उठाता है कि लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, तो संस्थाओं का यह दायित्व है कि वे इन आरोपों को गंभीरता से लें.

संविधान, संस्थाएँ और जनता,इन तीनों की सामूहिक शक्ति ही भारत को लोकतंत्र बनाती है.
इस शक्ति की रक्षा हर नागरिक की जिम्मेदारी है.

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