राजनीति में राष्ट्रवाद: इतिहास, बहस और आज की सच्चाई
तीसरा पक्ष आलेख पटना,25 जनवरी — देशभक्ति भारत में केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक भाव, एक संस्कार और एक साझा जिम्मेदारी है. लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह भावना राजनीतिक बहसों का सबसे बड़ा हथियार बनता जा रहा है. चुनावी भाषणों से लेकर सोशल मीडिया तक, अक्सर यह सवाल उठता है कि — क्या देशभक्ति अब किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा की पहचान बन चुका है?
विपक्षी दल आरोप लगाते हैं कि सत्ता पक्ष ने देशभक्ति का, ठेका ले लिया है, जबकि सत्तारूढ़ दल विपक्ष को देश-विरोधी बताने से नहीं चूकता है. ऐसे में असली सवाल यह है कि क्या राष्ट्रवाद को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना लोकतंत्र के लिए सही है?
यह रिपोर्ट इतिहास, वर्तमान राजनीति और विशेषज्ञों की राय के आधार पर इसी सवाल की पड़ताल करती है.
स्वतंत्रता संग्राम से आज तक: देशभक्ति की ऐतिहासिक जड़ें
भारत की आज़ादी की लड़ाई में देशभक्ति की सबसे सशक्त मिसाल रहा है. महात्मा गांधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. आंबेडकर जैसे नेताओं ने अलग-अलग विचारधाराओं के बावजूद राष्ट्र को सर्वोपरि रखा है.
आजादी के बाद भी देशभक्ति को संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों से जोड़ा गया.लेकिन समय के साथ-साथ अब इसकी व्याख्या राजनीतिक रंग लेने लगा है .
इतिहास में वंदे मातरम को लेकर हुए विवाद इसका उदाहरण हैं. 1920 के दशक में कांग्रेस अधिवेशनों में इस गीत पर आपत्तियां उठीं और बाद में इसके केवल पहले दो छंदों को आधिकारिक रूप से अपनाया गया.आज भी यह मुद्दा राजनीतिक बहसों में बार-बार उछाला जाता है.
इसी तरह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कांग्रेस के बीच ऐतिहासिक मतभेदों को भी देशभक्ति के चश्मे से देखा जाता रहा है. एक पक्ष जहां इसे राष्ट्र सेवा से जोड़ता है, वहीं दूसरा पक्ष सवाल उठाता है कि क्या राष्ट्रवाद की परिभाषा समय-समय पर बदली जाती रही है.
मौजूदा राजनीति में राष्ट्रवाद: आरोप और जवाबी हमले
आज की राजनीति में देशभक्ति सबसे प्रभावी नैरेटिव बन चुका है.
विपक्षी दलों का कहना है कि राष्ट्रवाद को असहमति दबाने के औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य दल कई बार अंधराष्ट्रवाद, जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं.
वहीं, सत्ताधारी दल के नेता अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा, सेना और तिरंगे को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखता हैं.तिरंगा यात्राएं, भारत माता की जय के नारे और राष्ट्र गौरव से जुड़े कार्यक्रम लगातार आयोजित किया जाता हैं.
हाल के वर्षों में यह भी देखा गया है कि सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने को देश-विरोध से जोड़ दिया जाता है, जिससे लोकतांत्रिक संवाद प्रभावित होता है.
सोशल मीडिया और राष्ट्रवाद की नई लड़ाई
सोशल मीडिया ने देशभक्ति की बहस को और तीखा बना दिया है.
यहां देशभक्त होने का प्रमाण पोस्ट, ट्रेंड और हैशटैग से तय होने लगा है. कोई सरकार की आलोचना करे तो उसे देश-विरोधी कहा जाता है, और कोई सवाल पूछे तो उसकी नीयत पर शक किया जाता है.
राजनीतिक दलों के समर्थक एक-दूसरे पर, देशभक्ति का ठेका लेने का आरोप लगाते हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है और असली मुद्दे पीछे छूट जाता हैं.
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विशेषज्ञ क्या कहते हैं: राष्ट्रवाद बनाम लोकतंत्र
रक्षा विशेषज्ञ और पूर्व सैन्य अधिकारी लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि सेना और राष्ट्रवाद को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिये.
कारगिल युद्ध के बाद भी यह राय सामने आई थी कि सैन्य बलों को चुनावी प्रचार का हिस्सा न बनाया जाना चाहिये .
वरिष्ठ पत्रकारों और इतिहासकारों का मानना है कि भारत का राष्ट्रवाद बहुलतावादी रहा है.इसे किसी एक धर्म, पार्टी या विचारधारा में सीमित करना देश की आत्मा के खिलाफ है.
जवाहरलाल नेहरू ने भी अपने समय में चेताया था कि राष्ट्रवाद अगर संकीर्ण हो गया, तो वह लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाएगा.
संस्कृति, सिनेमा और समाज में देशभक्ति
देशभक्ति केवल राजनीति तक सीमित नहीं है.
फिल्में, साहित्य, संगीत और सामाजिक आयोजन भी इसे जीवित रखता हैं. देशभक्ति पर बनी फिल्में युवाओं को प्रेरित करता हैं, वहीं सांस्कृतिक कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता का संदेश देता हैं.
लेकिन जब धर्म, आस्था और राजनीति को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया जाता है, तो विवाद खड़ा होता हैं. कई सामाजिक घटनाएं इस बात का संकेत देता हैं कि देशभक्ति का धार्मिककरण समाज को बांट सकता है.
निष्कर्ष: देशभक्ति किसी की जागीर नहीं
देशभक्ति न तो किसी पार्टी की संपत्ति है और न ही किसी विचारधारा का एकाधिकार.
यह संविधान, समानता, न्याय और लोकतंत्र में विश्वास से जन्म लेती है.
राजनीतिक दल आएंगे-जाएंगे, लेकिन देश रहेगा.
सच्ची देशभक्ति सवाल पूछने, जिम्मेदारी निभाने और समाज को जोड़ने में है — न कि दूसरों को देशभक्त या देश-विरोधी घोषित करने में.
आज ज़रूरत है कि राष्ट्रवाद को राजनीति के शोर से निकालकर नागरिक मूल्यों और संवैधानिक चेतना से जोड़ा जाए.
नोट :यह रिपोर्ट विभिन्न स्रोतों से एकत्रित तथ्यों पर आधारित है.

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