लोकतंत्र की लड़ाई का नया प्रतीक भैंस बाले बाबा’ को लालू यादव ने किया सम्मान
तीसरा पक्ष डेक्स पटना :बिहार की राजनीति में इन दिनों एक अनोखा नाम चर्चा में है.भैंस बाले बाबा, हाल ही में हुए बिहार बंद के दौरान अपनी भैंसों के साथ अनोखे अंदाज़ में प्रदर्शन करने वाले यह व्यक्ति न केवल सोशल मीडिया पर वायरल हुये बल्कि उन्हें अब राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव द्वारा सम्मानित भी किया गया है.

कौन हैं भैंस बाले बाबा?
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भैंस बाले बाबा का असली नाम केदार प्रसाद है. इन्होंने 9 जुलाई 2025 को महागठबंधन द्वारा आयोजित बिहार बंद में भाग लेते हुए अपनी दो भैंसों को सड़क पर बाँधकर और खुद चादर ओढ़कर बीच सड़क पर लेटकर विरोध प्रदर्शन किया था. उनका यह तरीका आम लोगों को तुरंत आकर्षित कर गया और कुछ ही घंटों में यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था.
क्यों किया गया यह प्रदर्शन?
बिहार बंद का आयोजन विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) के खिलाफ किया था. महागठबंधन, खासकर RJD और कांग्रेस, का आरोप है कि यह प्रक्रिया दलित, पिछड़े वर्ग, और गरीब तबके के लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने का एक साजिश है.
लालू यादव ने क्यों दिया सम्मान?
लालू यादव ने केदार प्रसाद उर्फ ‘भैंस बाले बाबा को पटना स्थित अपने आवास पर बुलाकर पारंपरिक गमछा पहनाकर सम्मानित किया.उन्होंने कहा कि यह सम्मान एक साधारण व्यक्ति की लोकतंत्र के लिए लड़ाई को समर्पित है. हम गरीबों, वंचितों और मेहनतकश जनता की आवाज हैं.
लालू का यह बयान विपक्ष की उस छवि को और भी मजबूत करता है.जिसमें RJD खुद को आम आदमी और हाशिए पर खड़े वर्गों का प्रतिनिधि बताती है.
राजनीतिक रंग और सोशल मीडिया पर हलचल
भैंस बाले बाबा की तस्वीर पर जहाँ कुछ लोग व्यंग्य और आलोचना कर रहे हैं. वहीं महागठबंधन समर्थक इसे लोकतंत्र बचाने की बहादुर कोशिश बता रहे हैं.सोशल मीडिया पर यह घटना तेजी से वायरल हुआ.जिसमें कई RJD समर्थकों ने केदार प्रसाद को.जनता का योद्धा” और “ग्रासरूट हीरो” बताया है.
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SIR पर विवाद और कोर्ट की निगरानी
SIR को लेकर विवाद गहराता जा रहा है. विपक्ष का कहना है कि ब्यूरोक्रेटिक प्रक्रिया के नाम पर लाखों वैध मतदाताओं को हटाया जा सकता है. जबकि निर्वाचन आयोग का दावा है कि यह सिर्फ मतदाता सूची को ‘शुद्ध’ करने की एक प्रक्रिया है.
इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दाखिल हुई और सुनबाई भी हुई इस सुनबाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्देश भी दिये चुनाव आयोग से कुछ सवालों का जबाब भी मांगा गया है लेकिन अभी भी यह मामला कोर्ट में है अभी अंतिम फैसला पर निर्णय होना बाकि है और आने वाले दिनों में इस पर सुनवाई होने की संभावना है
क्या कहता है यह सब बिहार की राजनीति के बारे में?
‘भैंस बाले बाबा’ को दिया गया सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि एक सांकेतिक विरोध की वैधता को राजनीतिक समर्थन देने का प्रतीक है.जैसे-जैसे 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं. ऐसे प्रतीकों का राजनीति में इस्तेमाल बढ़ता दिखाई दे रहा है.
इस घटना ने साफ कर दिया है कि विपक्ष सामाजिक न्याय और जन अधिकारों को चुनावी मुद्दा बना कर सामने ला रहा है.जबकि सत्तारूढ़ NDA गठबंधन पर चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर के आरोप लगातार तेज़ हो रहे हैं.
निष्कर्ष: लोकतंत्र की लड़ाई अब गली-कूचों तक
भैंस बाले बाबा की कहानी यह दिखाती है कि लोकतंत्र की लड़ाई अब केवल संसद और विधानसभाओं तक सीमित नहीं रह गया है.यह लड़ाई अब आम लोगों के बीच.सड़क पर, भैंसों के साथ और चादर ओढ़े लेटे कार्यकर्ताओं के जरिए लड़ी जा रही है.
RJD ने इस प्रतीक को अपनाकर एक स्पष्ट संदेश दिया है.हम उन्हीं के साथ हैं, जो सड़क पर हैं, संघर्ष में हैं और लोकतंत्र को बचाने के लिए लड़ रहे हैं

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