हिमालय का विकास या विनाश?—चारधाम परियोजना, पेड़ों की कटाई और सरकार की दोहरी नीति पर बड़ा सवाल

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Ajit Kumar

भारत
हिमालय का विकास या विनाश?—चारधाम परियोजना, पेड़ों की कटाई और सरकार की दोहरी नीति पर बड़ा सवाल

सरकार की दोहरी नीति: एक पेड़ मां के नाम बनाम हजारों पेड़ों की कटाई

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,8 दिसंबर 2025 — भारत की विकास यात्रा में हिमालय हमेशा से एक संवेदनशील और पवित्र क्षेत्र रहा है. यहां की नदियाँ, जंगल, जैव-विविधता और पहाड़ी संरचना न केवल करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, बल्कि देश की पर्यावरणीय सुरक्षा का आधार भी है. ऐसे में जब सरकार विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और पहाड़ों के चौड़ीकरण की अनुमति देती है, तो यह स्वाभाविक है कि प्रश्न उठते हैं.

राज्यसभा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणजीत रंजन ने चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना, पेड़ों की कटाई और सरकार के पर्यावरणीय वादों पर बड़ा सवाल उठाया है.यह वही मुद्दे हैं जिन्हें कांग्रेस ने अपने आधिकारिक X पोस्ट में भी उठाया है,विकास बनाम विनाश के बीच खड़ी सरकार की दोहरी कथनी और करनी.

सरकार की दोहरी नीति: एक पेड़ मां के नाम बनाम हजारों पेड़ों की कटाई

प्रधानमंत्री द्वारा एक पेड़ मां के नाम लगाने की अपील एक संवेदनशील और सकारात्मक कदम लगता है. लेकिन उसी समय, सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई की अनुमति देना इस संदेश को खोखला बना देता है.

कांग्रेस के अनुसार,

सरकार सार्वजनिक रूप से पर्यावरण संरक्षण की बात करती है,

लेकिन फैसलों में पर्यावरणीय नियमों को सबसे पहले कुर्बान कर देती है.

रणजीत रंजन ने सदन में स्पष्ट कहा है कि,
देवदार वृक्ष को नहीं काटा जाएगा—यह सरकार का वादा था.
लेकिन भागीरथी के पास स्थित इको-सेंसिटिव ज़ोन में 6,000 से अधिक पेड़ों की कटाई को मंजूरी दे दी गई है.

यह सिर्फ पेड़ काटना नहीं, बल्कि एक पूरे संवेदनशील इकोसिस्टम को खतरे में डालने जैसा है.

इको-सेंसिटिव जोन पर हमला क्यों?

हिमालय का इको-सेंसिटिव जोन, विशेष रूप से उत्तराखंड के क्षेत्र में, ग्लेशियरों, नदियों, पहाड़ों और जैव-विविधता का सबसे नाजुक क्षेत्र माना जाता है.यहां की किसी भी छेड़छाड़ का सीधा असर पूरे उत्तर भारत की जल-व्यवस्था, मानसून, खेती और जीवन पर पड़ता है.

लेकिन सरकार द्वारा इस क्षेत्र में. एक्सट्रा वाइड सड़कें बनाने, सुरंगों की खुदाई,

पहाड़ों को काटकर हाईवे बनाने, और हज़ारों पेड़ों को साफ करने

की अनुमति देकर यह साबित किया जा रहा है कि विकास की कीमत अब पर्यावरण की कुर्बानी बन गई है.

पर्यावरण विशेषज्ञ पहले ही कई बार चेतावनी दे चुके हैं कि हिमालय का भूगोल मैदानी इलाकों जैसा नहीं है.यहाँ हर छोटी छेड़छाड़ भी भूकंप, भूस्खलन और ग्लेशियर टूटने की घटनाओं को बढ़ा सकती है.

चारधाम ऑल वेदर रोड: सड़क या संकट?

चारधाम परियोजना को शुरू में तीर्थयात्रियों की सुविधा के नाम पर घोषित किया गया था. लेकिन जैसे-जैसे इसका आकार बढ़ा, यह सुविधाओं से ज्यादा पर्यावरणीय जोखिम बनती चली गई.

रणजीत रंजन ने राज्यसभा में चेतावनी दी है कि,

चौड़ीकरण की वजह से पहाड़ों की कटाई तेज हो रही है.

लगातार भूस्खलन बढ़ रहे हैं.

यात्रियों और सेना के जवानों की सुरक्षा खतरे में है.

हिमालय के पहाड़ कठोर ग्रेनाइट नहीं, बल्कि परतदार चट्टानों से बने होते हैं. इन्हें जितना काटा जाता है, ये उतने ही अस्थिर हो जाते हैं.
इसका प्रमाण पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड में देखने को भी मिला है.

केदारनाथ मार्ग पर कई बार सड़कें टूटकर बह गया,

जोशीमठ जैसे शहर धीरे-धीरे धंसने लगे,

सेना के कई काफिले भूस्खलन की वजह से फँस गए,

निर्माण सामग्री के भार से पहाड़ की सतह अस्थिर हुई,

यह विकास नहीं, बल्कि विनाश का रोडमैप प्रतीत होता है.

क्या सरकार लोगों की अपील सुन रही है?

रणजीत रंजन ने सदन में बताया कि स्थानीय लोग, पर्यावरण कार्यकर्ता और विशेषज्ञ लगातार मांग कर रहे हैं कि,

इको-सेंसिटिव जोन को बचाया जायें.

सड़क चौड़ीकरण की जगह सुरक्षित विकल्प अपनाए जाएँ,

पेड़ों की कटाई रोकी जाए.

लेकिन सरकार एक तरफ सदन में पर्यावरण संरक्षण का आश्वासन देती है, और दूसरी तरफ बाहर जाकर उन ही क्षेत्रों को काटने की मंज़ूरी जारी कर देती है.

कांग्रेस ने अपने X पोस्ट में लिखा है कि,
सरकार सदन में कुछ और कहती है, बाहर कुछ और करती है.

यह आरोप केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि एक गंभीर सवाल भी है.क्या Himalayas में विकास की रणनीति वैज्ञानिक है या सिर्फ राजनीतिक?

हिमालय में विकास मॉडल की असफलता

4,000–10,000 फीट की ऊँचाई पर बड़े निर्माण कार्य कभी भी आसान नहीं होते. हिमालय की भूगर्भीय प्रकृति बताती है कि यहां का विकास संतुलित, सीमित और पर्यावरण को केंद्र में रखकर ही होना चाहिए.

लेकिन आज की स्थिति कुछ यूं है.

पहाड़ टूट रहे हैं.

नदियाँ उग्र हो रही हैं.

कस्बे धंस रहे हैं.

भूस्खलन लगातार बढ़ रहे हैं.

सेना और तीर्थयात्री जोखिम में हैं.

रणनीतिक दृष्टि से भी यह खतरनाक है.
जो सड़कें सेना की आवाजाही के लिए बनाई जा रही हैं, वे भूस्खलन से बार-बार बंद हो जाती हैं.
इससे सुरक्षा और राहत कार्य दोनों प्रभावित होते हैं.

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क्या यही है विकास की परिभाषा?

विकास का अर्थ सिर्फ चौड़ी सड़कें, बड़ी सुरंगें या कंक्रीट के ढांचे भर नहीं होते है .
विकास का असली मतलब यह है कि,

प्रकृति सुरक्षित रहे, आने वाली पीढ़ियों को स्थायी भविष्य मिले,

स्थानीय समुदायों का जीवन आसान हो, कठिन नहीं

सुरक्षा, आस्था और पर्यावरण तीनों संतुलित रहें

लेकिन आज जब. हज़ारों पेड़ काटे जा रहे हों,

पहाड़ों को क्षति पहुंच रही हो,

यात्रियों और सेना की जान खतरे में पड़ रही हो,

और सरकार अपने ही वादों से मुकर रही हो,

तो सवाल उठना लाजमी है.
क्या यह विकास है या हिमालय के भविष्य को गिरवी रखने की शुरुआत?

निष्कर्ष: हिमालय बचाना है तो विकास और पर्यावरण दोनों में संतुलन ज़रूरी

रणजीत रंजन और कांग्रेस द्वारा उठाए गए मुद्दे केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि एक चेतावनी हैं. हिमालय सिर्फ पहाड़ नहीं—भारत की जल-व्यवस्था, संसाधन और सुरक्षा की रीढ़ है.अगर आज हमने इसे अंधाधुंध निर्माण की भेंट चढ़ा दिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी.

सरकार को चाहिए कि,

इको-सेंसिटिव ज़ोन में बड़े निर्माण पर रोक लगाए,

वैज्ञानिक तरीकों से सड़क निर्माण करे,

पेड़ों की कटाई के बजाय वैकल्पिक रूट ढूंढे,

स्थानीय समुदायों की सुनवाई करे,

और सदन तथा जनता के सामने एक जैसी नीति अपनाए,

हिमालय का भविष्य आज लिए गए फैसलों पर निर्भर करता है,और यह जिम्मेदारी किसी एक सरकार या दल की नहीं, पूरे देश की है.

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