जब सांसद को भी अस्पताल में बेड नहीं: पप्पू यादव का सवाल और सिस्टम पर करारा प्रहार

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Ajit Kumar

बिहार
पप्पू यादव अस्पताल बेड मुद्दे पर स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल

सांसद को नहीं मिला बेड, तो आम जनता का क्या?

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 8 फरवरी— देश की राजनीति में कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो केवल सत्ता से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से टकराता हैं. वरिष्ठ सांसद और जनपक्षधर नेता पप्पू यादव का हालिया X (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट ऐसा ही एक सवाल बनकर सामने आया है. उन्होंने लिखा है कि,

जब एक वरिष्ठतम सांसद को बेड नहीं तो आम लोगों की दशा क्या होगी?

यह एक पंक्ति नहीं, बल्कि देश की जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना है. यह सवाल सत्ता की चकाचौंध के पीछे छिपी उस सच्चाई को उजागर करता है, जिसे आम आदमी रोज़ झेलता है, लेकिन शायद ही कभी सुना जाता है.

पप्पू यादव का X पोस्ट: केवल बयान नहीं, एक चेतावनी

पप्पू यादव ने अपने पोस्ट में सिर्फ़ अपनी बात नहीं रखी, बल्कि करोड़ों आम नागरिकों की पीड़ा को शब्द दिया है. उन्होंने साफ कहा कि जब कोई वरिष्ठ सांसद, जिसके पास पहचान, संसाधन और पहुँच है, अगर उसे अस्पताल में बेड नहीं मिलता, तो आम गरीब, मज़दूर, किसान और मध्यमवर्गीय व्यक्ति की हालत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है.

टीम पप्पू यादव के अनुसार,

इसी अन्याय को उजागर करते हैं तो हुक्मरानों के पेट मरोड़ होने लगता है.

यह पंक्ति बताती है कि सच बोलना आज भी सत्ता को असहज कर देता है.

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था: दावे बनाम ज़मीनी हकीकत

सरकारें बार-बार विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाओं का दावा करता है .

आयुष्मान भारत, नए मेडिकल कॉलेज, स्मार्ट अस्पताल

लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि आज भी,

सरकारी अस्पतालों में बेड की भारी कमी है.

डॉक्टरों और नर्सों का अभाव है .

दवाइयों की किल्लत है .और इलाज के लिए लंबी लाइनें, आम बात बन चुका है.

पप्पू यादव का सवाल इन खोखले दावों को सीधा चुनौती देता है.

आम आदमी का दर्द: जिसे कोई नहीं सुनता

अगर एक आम मज़दूर अपने बीमार बच्चे को लेकर सरकारी अस्पताल पहुँचता है और उसे कहा जाता है,
बेड नहीं है,तो उसके पास क्या विकल्प बचता है?

महंगे निजी अस्पताल, कर्ज़

या इलाज के बिना मौत का इंतज़ार

पप्पू यादव उसी आम आदमी की आवाज़ बनते हैं, जिसकी आवाज़ अक्सर फाइलों और आंकड़ों में दबा दी जाती है.

सत्ता को असहज क्यों करता है यह सवाल?

जब कोई नेता चुप रहता है, तो उसे जिम्मेदार कहा जाता है.
लेकिन जब कोई नेता सिस्टम की खामियों को उजागर करता है, तो उसे,

विवादास्पद, परेशान करने वाला

या असुविधाजनक, कह दिया जाता है.

पप्पू यादव का सवाल इसलिए सत्ता को चुभता है क्योंकि यह झूठे विकास मॉडल की पोल खोलता है.

पप्पू यादव: राजनीति से आगे जनसंघर्ष

पप्पू यादव को सिर्फ़ एक सांसद के रूप में देखना उनकी भूमिका को कम करके आंकना होगा. वे,

सड़क से संसद तक संघर्ष करने वाले नेता,आपदा, बाढ़, महामारी में ज़मीन पर उतरने वाले जनप्रतिनिधि और बिना डर सवाल पूछने वाली राजनीति के प्रतीक

रहे हैं.

उनका यह पोस्ट भी उसी परंपरा का हिस्सा है,जनता के हक़ की लड़ाई.

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क्या बदलेगा कुछ?

यह सवाल अब केवल पप्पू यादव का नहीं रहा। यह सवाल बन गया है.

हर उस परिवार का, जिसने इलाज के अभाव में अपनों को खोया.

हर उस नागरिक का, जिसने अस्पताल के गेट पर रात बिताई.

हर उस मां-बाप का, जो बेड के इंतज़ार में टूट गया.

अगर इस सवाल का जवाब नहीं दिया गया, तो लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया बनकर रह जाएगा.

निष्कर्ष: सवाल ज़िंदा रहना चाहिए

पप्पू यादव का X पोस्ट हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र में सबसे ज़रूरी चीज़ सवाल पूछना है.
जब सवाल मर जाते हैं, तब सिस्टम सड़ने लगता है.

आज ज़रूरत है कि,

स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिले, अस्पतालों में बेड, डॉक्टर और दवाइयाँ हों और सवाल पूछने वालों को चुप कराने की बजाय सुना जाए

क्योंकि जब एक सांसद को बेड नहीं,तो आम आदमी की हालत की कल्पना ही इस सिस्टम पर सबसे बड़ा आरोप है.

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