झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को मिली नई ऊँचाई
तीसरा पक्ष ब्यूरो झारखंड — 14–27 नवंबर 2025 तक आयोजित भारतीय अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला (IITF) में इस वर्ष झारखंड राज्य ने अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को नए अंदाज में प्रस्तुत किया है. Jharkhand Culture (@JharkhndCulture) द्वारा साझा जानकारी के अनुसार, मेला परिसर में आयोजित विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने न केवल दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया, बल्कि झारखंड की पारंपरिक विरासत, लोककला और लोकसंस्कृति को भी राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दिया है.

सांस्कृतिक कार्य निदेशालय द्वारा प्रस्तुत इन कार्यक्रमों में झारखंड के जीवन, समाज और परंपराओं की झलक साफ दिखाई दिया है. पारंपरिक नगाड़ा, मांदर, बाँसुरी और प्रसिद्ध छऊ नृत्य समेत कई लोकनृत्यों ने दर्शकों को झारखंड की गहरी सांस्कृतिक जड़ों से रूबरू कराया है.

झारखंड की भागीदारी क्यों रही विशेष?
झारखंड प्राकृतिक संसाधनों, आदिवासी संस्कृति और समृद्ध लोककला से भरपूर राज्य है.लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसके पारंपरिक कला रूपों और सांस्कृतिक धरोहर को वह पहचान कई बार नहीं मिल पाती जिसकी वह हकदार है.
IITF 2025 जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर झारखंड की सहभागिता ने इस कमी को पूरा किया और लाखों लोगों को झारखंड की असली सांस्कृतिक छवि से परिचित कराया है.
मुख्य आकर्षण
पारंपरिक लोकनृत्य
जनजातीय संगीत
राज्य की समृद्ध हेंडीक्राफ्ट परंपरा
रंग-बिरंगे सांस्कृतिक प्रदर्शन
आदिवासी जीवनशैली को दर्शाते प्रदर्शन
इन प्रस्तुतियों ने दर्शकों को अनोखे अनुभव से भर दिया और राज्य की संस्कृति की विविधता को उजागर किया है.

छऊ नृत्य: आकर्षण का केंद्र
झारखंड, बंगाल और ओडिशा में प्रचलित छऊ नृत्य इस बार भी लोगों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण का केन्द्र बना.पारंपरिक मुखौटे, दमदार संगीत, ऊर्जा से भरे कदम और पौराणिक कथाओं पर आधारित प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया है.
छऊ कलाकारों ने महाभारत और रामायण के कुछ चुनिंदा प्रसंगों को आधुनिक मंच पर ढाल कर पेश किया, जिससे कार्यक्रम और भी रोचक बन गया.
यह नृत्य झारखंड की सांस्कृतिक शक्ति, सामुदायिक एकता और कलात्मक कौशल का प्रतीक है.
लोकनृत्य और संगीत ने बांधा समां
झारखंड की सांस्कृतिक प्रस्तुति अपने जीवंत लोकनृत्यों के बिना अधूरी होती है. सांस्कृतिक निदेशालय द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में कई प्रमुख जनजातीय और पारंपरिक नृत्य रूपों को शामिल किया गया, जैसे —
झूमर नृत्य
नगाड़ा वादन
पाइका नृत्य
डोमकच
इन सभी प्रस्तुतियों ने मेले आने वाले देश–विदेश के आगंतुकों को झारखंड की सांस्कृतिक विरासत के करीब लाया है. कलाकारों ने पारंपरिक परिधानों और स्थानीय वाद्ययंत्रों के साथ अपने प्रदर्शन को और भी भव्य बनाया.

पारंपरिक हस्तशिल्प ने भी लूटी वाहवाही
सिर्फ संस्कृति ही नहीं, बल्कि झारखंड की लोककला और हेंडीक्राफ्ट को भी जबरदस्त सराहना मिली है. प्रदर्शनी में लगे स्टॉलों पर दर्शकों ने देखा कि कैसे बांस, लकड़ी, धातु और प्राकृतिक तंतु से बने उत्पाद झारखंड की शिल्पकला की क्षमता को दर्शाते हैं.
झारखंड के प्रमुख हस्तशिल्प जिनकी डिमांड रही तेज,
डोकरा कला
बांस और बेंत उत्पाद
काष्ठ कला
टेराकोटा और मिट्टी शिल्प
ये सभी उत्पाद आगंतुकों के आकर्षण का केंद्र रहे और कई ने इन्हें खरीदकर झारखंड की कला को अपने घर का हिस्सा बनाया.
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झारखंड के स्टॉलों पर उमड़ी भारी भीड़
IITF 2025 में झारखंड के मंडपों पर लोगों की भारी भीड़ ने साबित कर दिया कि उनकी संस्कृति न केवल अनूठी है बल्कि लोगों को अपनी ओर खींचने वाली भी है.
Jharkhand Culture द्वारा साझा किए गए पोस्ट में दिखाया गया कि प्रदर्शनी क्षेत्र में आयोजित कार्यक्रमों को देखने देशभर के लोग आए और कई विदेशी पर्यटकों ने भी अपनी विशेष रुचि दिखाई है.

झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को मिली नई ऊँचाई
यह आयोजन झारखंड के लिए सिर्फ एक मेला नहीं बल्कि वैश्विक मंच पर अपनी सांस्कृतिक पहचान दर्ज कराने का अवसर भी था.
कलाकारों को मिला प्रोत्साहन
लोककला को मिला राष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन
पर्यटन को बढ़ावा मिला
राज्य की सकारात्मक छवि को मजबूती मिली
Jharkhand Culture द्वारा साझा पोस्ट से यह साफ दिखता है कि झारखंड अपने पारंपरिक धरोहर को आधुनिक समय में भी उतनी ही मजबूती से जीवित रख रहा है.
निष्कर्ष
IITF 2025 में झारखंड की प्रस्तुतियाँ केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं थीं, बल्कि उन परंपराओं की जीवंत झलक थीं जो पीढ़ियों से लोगों के जीवन का हिस्सा रही हैं. इस आयोजन ने सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय कला की भव्यता को न सिर्फ प्रदर्शित किया बल्कि झारखंड की पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ऊँचाई भी दी.
मेले में झारखंड की शानदार भागीदारी ने यह संदेश दिया कि राज्य की संस्कृति जितनी प्राचीन है, उतनी ही आधुनिक समय में भी प्रासंगिक है.

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