राज्यव्यापी विरोध दिवस: आजीवन कारावास फैसले पर भाकपा(माले) का आंदोलन तेज

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Ajit Kumar

बिहार
बुद्ध स्मृति पार्क पटना में जितेंद्र पासवान सजा के खिलाफ विरोध सभा

जितेंद्र पासवान को सजा पर भाकपा(माले) का राज्यव्यापी विरोध

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 16 फरवरी 2026 — गोपालगंज जिला कोर्ट द्वारा भाकपा(माले) के राज्य कमिटी सदस्य व आरवाईए के राज्य अध्यक्ष का. जितेंद्र पासवान तथा का. श्रीराम कुशवाहा को कथित हत्या मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के विरोध में राज्यभर में प्रतिवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया है. इस फैसले के खिलाफ पार्टी ने इसे न्याय के बजाय राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित बताया और व्यापक जनआंदोलन तेज करने की घोषणा किया है.

फैसले के खिलाफ राज्यभर में विरोध

भाकपा(माले) और आरवाईए के संयुक्त बैनर तले बिहार के कई जिलों में आज विरोध दिवस मनाया गया. राजधानी पटना के ऐतिहासिक स्थल बुद्ध स्मृति पार्क में आयोजित प्रतिरोध सभा में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक शामिल हुआ है. नेताओं ने आरोप लगाया है कि यह फैसला निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया से अधिक राजनीतिक दबाव का परिणाम प्रतीत होता है.

इस मामले में मुख्य आरोपी के रूप में नामित जितेंद्र पासवान और श्रीराम कुशवाहा को आजीवन कारावास के साथ 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है.पार्टी नेताओं ने दावा किया कि यह मामला राजनीतिक विरोध को दबाने के उद्देश्य से गढ़ा गया है.

कोर्ट के फैसले पर राजनीतिक आरोप

यह सजा गोपालगंज जिला कोर्ट द्वारा सुनाया गया है, जिसके बाद पार्टी और सहयोगी संगठनों ने राज्यव्यापी आंदोलन की घोषणा कर दिया है, सभा में वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में भोरे विधानसभा क्षेत्र से भाकपा(माले) उम्मीदवार रहे जितेंद्र पासवान को मात्र 400 मतों से पराजित घोषित किया गया था, जबकि जदयू प्रत्याशी सुनील कुमार को विजयी बताया गया.

नेताओं ने आरोप लगाया है कि चुनावी हार के बाद राजनीतिक बदले की भावना से यह मुकदमा खड़ा किया गया. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को अपराधीकरण करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है.

लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला का आरोप

सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि विपक्षी नेताओं पर झूठे मुकदमे लगाकर उन्हें जेल भेजना लोकतांत्रिक आवाज को कुचलने की कोशिश है.इस दौरान पूर्व विधायक दल के नेता महबूब आलम सहित अन्य नेताओं ने कहा है कि यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई है.

वक्ताओं ने यह भी याद दिलाया कि इससे पहले भी भाकपा(माले) नेता मनोज मंजिल को कथित झूठे मामलों में फंसाए जाने का आरोप लगाया गया था. नेताओं का कहना है कि यह सिलसिला विपक्ष की राजनीतिक आवाज को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा है.

विभिन्न जिलों में प्रतिवाद कार्यक्रम

पटना के अलावा राज्य के कई जिलों में विरोध कार्यक्रम आयोजित किया गया.इनमें प्रमुख रूप से जहानाबाद, गोपालगंज, अरवल, आरा और गया शामिल रहा .इन जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं ने मार्च, धरना और सभा आयोजित कर फैसले का विरोध जताया.

सभा में केडी यादव, सरोज चौबे, कुमार परवेज, रणविजय कुमार और प्रमोद यादव समेत कई नेताओं ने भाग लिया. कार्यक्रम की अध्यक्षता नगर सचिव जितेंद्र कुमार ने की, जबकि संचालन आरवाईए पटना जिला संयोजक विनय कुमार ने किया। बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की मौजूदगी ने इसे एक व्यापक राजनीतिक प्रतिरोध का स्वरूप दिया.

न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल और आगे की रणनीति

भाकपा(माले) नेताओं ने कहा कि इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील किया जायेगा. साथ ही जनआंदोलन के जरिए न्यायिक पुनर्विचार का मांग भी उठाया जायेगा . उनका कहना है कि यदि निर्दोष लोगों को राजनीतिक कारणों से सजा दी जाती है तो यह लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

पार्टी ने यह भी कहा कि इसी मामले में पांच अन्य लोग पहले से ही आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं, जिससे इस मुकदमे की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होता हैं. नेताओं का आरोप है कि जांच प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया गया.

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लोकतंत्र और राजनीतिक संघर्ष का प्रश्न

इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में न्याय, राजनीतिक प्रतिशोध और लोकतांत्रिक अधिकारों पर नई बहस छेड़ दिया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्षी नेताओं पर लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं होती, तो इससे राजनीतिक ध्रुवीकरण और बढ़ सकता है.

विरोध सभा में यह भी कहा गया कि लोकतंत्र में असहमति की आवाज को दबाना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है.नेताओं ने स्पष्ट किया कि वे इस मुद्दे को जन-जन तक ले जाएंगे और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेंगे.

निष्कर्ष

गोपालगंज कोर्ट के फैसले के बाद बिहार की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। भाकपा(माले) और आरवाईए द्वारा राज्यव्यापी विरोध दिवस मनाए जाने से यह संकेत मिला है कि आने वाले समय में यह मुद्दा बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकता है.अब सबकी नजरें उच्च न्यायालय में होने वाली अपील और आगे की राजनीतिक रणनीति पर टिकी हैं.

इस घटनाक्रम ने न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता, राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा जैसे गंभीर प्रश्नों को फिर से केंद्र में ला दिया है.

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