अन्नदाता जेल में, अपराधी आज़ाद?—केजरीवाल का बड़ा सवाल
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,8 दिसंबर 2025 — भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में किसी भी नागरिक को अपनी बात कहने का अधिकार है.लेकिन हाल ही में कुछ घटनाओं ने यह चिंता बढ़ा दिया है कि क्या सरकारें अब आलोचना और सवालों से डरने लगी हैं? इसी संदर्भ में अरविंद केजरीवाल का X (Twitter) पोस्ट एक तीखा सवाल खड़ा करता है कि,
इन्होंने मुझे भी जेल में डाला था. मेरा कसूर क्या था?
उनका कहना है कि उन्होंने दिल्ली में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और नागरिक सुविधाओं को सुधारने का काम किया.क्या यही उनका अपराध था?
यह बयान केवल एक नेता की शिकायत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक माहौल में बढ़ती संवेदनहीनता की ओर इशारा करता है.
गुजरात में किसानों की गिरफ्तारी: असल मुद्दा क्या है?
अरविंद केजरीवाल ने अपने पोस्ट में कहा कि गुजरात के कई हिस्सों में किसानों को पकड़–पकड़ कर जेल भेजा जा रहा है. किसान अपनी समस्याओं, फसल कीमतों, सिंचाई और सरकारी लापरवाही के खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे.और इसी आवाज़ को दबाने के लिए कार्रवाई की जा रही है.
किसानों की गिरफ्तारी पर सवाल इसलिए भी उठता है, क्योंकि,
वे अपनी मांगे लोकतांत्रिक तरीके से रख रहे थे.
वे हिंसा या अव्यवस्था नहीं फैला रहे थे.
वे अपनी फसल, अपनी जमीन और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे.
जब अन्नदाता अपनी बात भी न कह सके, तो लोकतंत्र का क्या अर्थ रह जाता है?
नकली शराब और नशे के कारोबार पर चुप्पी क्यों?
गुजरात के कई इलाकों में नकली शराब और नशे का कारोबार खुलेआम चल रहा है.
यह समस्या वर्षों से चली आ रही है, और कई बार मौतों की खबरें भी सामने आती रही हैं.
लेकिन हैरानी की बात यह है कि,
नकली शराब का नेटवर्क जस का तस चलता रहता है.
ड्रग्स की सप्लाई पर कड़ी कार्रवाई नहीं दिखती है .
अपराधियों के खिलाफ सिस्टम सक्रिय नहीं दिखता है .
लेकिन जब किसान अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो गिरफ्तारी तुरंत हो जाती है.
यह दोहरा रवैया जनता के बीच सवाल पैदा करता है कि आखिर कानून किसके लिए और किसके खिलाफ चलाया जा रहा है?
केजरीवाल का बयान: सिर्फ़ राजनीतिक हमला नहीं, व्यवस्था पर सवाल
अपने पोस्ट में केजरीवाल ने जो बातें कही हैं, वे केवल सरकार पर हमला नहीं हैं.
वे इस बात की तरफ़ इशारा हैं कि,
जहाँ जनता की आवाज़ को दबाना आसान है.
जहाँ विरोध को अपराध समझा जाता है.
जहाँ सुविधाओं और सुधार के काम को भी साजिश कहा जाता है.
वहाँ लोकतंत्र का भविष्य खतरे में पड़ जाता है.
उनका यह कहना कि, मेरा कसूर स्कूल बनाना, इलाज और बिजली मुफ्त करना था एक सशक्त व्यंग्य है.
यह संदेश देता है कि लोकतंत्र में काम करने वाले, आवाज़ उठाने वाले और सवाल पूछने वाले लोग ही आज निशाने पर हैं.
किसानों की भूमिका: देश की रीढ़ लेकिन सम्मान में कमी
भारत की 60% से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है.
किसान न सिर्फ़ अन्नदाता हैं बल्कि,
देश की अर्थव्यवस्था को चलाते हैं.
खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं.
ग्रामीण भारत को जीवित रखते हैं.
ऐसे समुदाय के साथ कठोरता, गिरफ्तारी और धमकी देना केवल नीतिगत गलती नहीं बल्कि सामाजिक अन्याय भी है.
केजरीवाल का कहना सही प्रतीत होता है कि, अन्नदाता अन्याय नहीं सहेंगे.
किसान अपने तरीके से जवाब ज़रूर देते हैं,और सबसे बड़ा हथियार है जनतंत्र.
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क्या वाकई विरोध की आवाज़ को दबाने की कोशिश?
आज का भारत ऐसे समय से गुजर रहा है जहाँ,
विरोध को नक्सलवाद कहा जाता है.
आंदोलन को अराजकता कहा जाता है.
सवाल पूछने वाले को देशद्रोही कहा जाता है.
और किसानों को जेल में भेजा जा रहा है.
इस माहौल में केजरीवाल का बयान केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि चेतावनी भी है.
निष्कर्ष: लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब आवाज़ें सुनी जाएँ
गुजरात में किसानों की गिरफ़्तारी और व्यवस्था की चुप्पी एक गंभीर सवाल उठाती है कि ,
क्या जनता की आवाज़ अब सरकार को असहज करने लगी है?
अरविंद केजरीवाल का पोस्ट इस बहस को और ज़रूरी बना देता है.
किसानों की मांगें यदि जेल में डालकर नहीं, बल्कि संवाद के जरिए सुनी जाएँ, तो न संघर्ष होगा और न असंतोष.
लोकतंत्र का असली अर्थ यही है.
जनता बोले, सत्ता सुने; सत्ता बोले, जनता भरोसा करे.
लेकिन जब जनता बोले और सत्ता चुप रहे, तो संघर्ष अवश्य जन्म लेता है.

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