बजट 2026-27: विकसित भारत के दावों के पीछे छुपी आम जनता की अनदेखी
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली, 1 फ़रवरी 2026— केंद्रीय बजट 2026-27 ऐसे समय में पेश किया गया है, जब देश तेज़ी से बढ़ती आर्थिक असमानता, रिकॉर्ड स्तर की बेरोज़गारी, घटती क्रय-शक्ति, और लड़खड़ाते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से जूझ रहा है. वैश्विक स्तर पर आर्थिक-राजनीतिक अनिश्चितता और व्यापार युद्धों के माहौल में पेश यह बजट, विकसित भारत के दावों के बावजूद, आम जनता की ज़मीनी ज़रूरतों से पूरी तरह कटा हुआ दिखाई देता है.
भाकपा(माले) लिबरेशन की केंद्रीय कमेटी के अनुसार, यह बजट पिछले वर्षों की तरह ही जनविरोधी नीतियों को आगे बढ़ाता है और मज़दूरों, किसानों, युवाओं, महिलाओं, आदिवासियों तथा गरीब तबकों की उपेक्षा को और गहरा करता है.
बढ़ती असमानता और बेरोज़गारी पर बजट की चुप्पी
देश की अधिकांश आबादी आज कम आय, महंगाई, और रोज़गार की कमी के दबाव में जी रही है. ऐसे समय में बजट से यह अपेक्षा थी कि आम लोगों की आय बढ़ाने, रोज़गार सृजन और मांग को मज़बूत करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे. लेकिन बजट 2026-27 इस मोर्चे पर पूरी तरह विफल रहा.
आम जनता की ठहरी हुई आमदनी को बढ़ाने के लिए न तो कोई प्रभावी योजना लाई गई और न ही मज़दूरी, सामाजिक सुरक्षा या शहरी-ग्रामीण रोज़गार को लेकर कोई ठोस घोषणा की गई.
सामाजिक कल्याण योजनाओं में कटौती या ठहराव
बजट में सामाजिक सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन से जुड़ी योजनाओं के लिए आवंटन या तो घटा दिया गया है या फिर वास्तविक ज़रूरतों के मुकाबले स्थिर रखा गया है. महंगाई के दौर में यह कटौती आम लोगों के जीवन पर सीधा हमला है.
वित्त वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमानों में भी यह साफ़ दिखता है कि,
कृषि और संबद्ध क्षेत्रों
शिक्षा और स्वास्थ्य
सामाजिक कल्याण
ग्रामीण व शहरी विकास
जैसे अहम सेक्टरों में पिछले साल की तुलना में कम वास्तविक खर्च किया गया.
तय बजट भी खर्च नहीं करना: सरकार की गैर-जिम्मेदारी
सरकार ने कई प्रमुख जनकल्याणकारी योजनाओं में खुद तय किए गए बजट से भी कम खर्च किया, जिनमें शामिल हैं,
PMAY (शहरी) – 7,500 करोड़
PMAY (ग्रामीण) – 32,500 करोड़
स्वच्छ भारत मिशन – 2,000 करोड़
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना – 11,000 करोड़
आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन – 2,443 करोड़
यह दिखाता है कि सरकार ने जानबूझकर जनहित की योजनाओं को नज़रअंदाज़ किया है.
स्वास्थ्य और शिक्षा: ज़रूरत से बहुत कम बजट
सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था आज डॉक्टरों, नर्सों, दवाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी से जूझ रही है.इसके बावजूद बजट में स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए की गई बढ़ोतरी हकीकत से बहुत कम है.
इसके उलट सरकार निजी क्षेत्र आधारित स्वास्थ्य और शिक्षा मॉडल को बढ़ावा दे रही है, जिससे आम लोगों के लिए इलाज और पढ़ाई और महंगी होती जा रही है.
कृषि और किसानों की अनदेखी जारी
कृषि आज भी देश की बहुसंख्यक आबादी का आधार है, लेकिन बजट 2026-27 में,
किसानों की आय
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)
जलवायु परिवर्तन का असर
भंडारण और फूड प्रोसेसिंग
जैसे मुद्दों पर कोई गंभीर चर्चा या ठोस प्रावधान नहीं है.
ड्रोन, एआई और कॉरपोरेट-केंद्रित कृषि मॉडल को आगे बढ़ाया जा रहा है, जबकि कृषि अनुसंधान और शिक्षा के बजट में कटौती सरकार की असल प्राथमिकताओं को उजागर करती है.
शिक्षा को सस्ते श्रम में बदलने की नीति
यह बजट शिक्षा को ज्ञान और आलोचनात्मक सोच का माध्यम मानने के बजाय, कॉरपोरेट के लिए सस्ता श्रम तैयार करने का औज़ार बना रहा है.
औद्योगिक गलियारों में एजुकेशनल टाउनशिप, कंटेंट लैब और गेमिंग इंडस्ट्री के लिए स्किल ट्रेनिंग,यह सब छात्रों को स्थायी रोज़गार नहीं, बल्कि अस्थायी और असुरक्षित काम की ओर धकेलता है.
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महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों की अनदेखी
करोड़ों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के ज़रिए माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के कर्ज़ जाल में फंसी हुई हैं. बजट इस समस्या को हल करने के बजाय उसी नीतिगत ढांचे को आगे बढ़ाता है, जो निजी कंपनियों को और अधिक शोषण की छूट देता है.
पर्यावरण और आदिवासियों के लिए ख़तरा
डेटा सेंटर, रेयर अर्थ कॉरिडोर और कॉरपोरेट प्रोजेक्ट्स को दी गई टैक्स छूट,
भूजल संकट, ऊर्जा की अत्यधिक खपत
प्रदूषण, बड़े पैमाने पर विस्थापन, का रास्ता खोलती है। इससे आदिवासियों और गरीबों की ज़मीन व रोज़गार पर गंभीर खतरा पैदा होगा.
अमीरों को राहत, गरीबों पर बोझ
बजट अमीरों और बड़ी कंपनियों को टैक्स इंसेंटिव देता है, लेकिन,
सुपर रिच पर टैक्स
कॉरपोरेट मुनाफ़े पर अतिरिक्त कर
जैसे कदम उठाने से बचता है। बिना असमानता कम किए आर्थिक विकास संभव नहीं है, लेकिन बजट में इसका कोई विज़न नहीं दिखता।
निष्कर्ष: जनविरोधी बजट
कुल मिलाकर, केंद्रीय बजट 2026-27 एक ऐसा दस्तावेज़ है जो,
जनकल्याण की उपेक्षा करता है.
सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा को कमजोर करता है.
कृषि, रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा में कटौती करता है.
पर्यावरण और गरीब तबकों को जोखिम में डालता है.
देश को आज जिस बजट की ज़रूरत थी, वह था.रोज़गार की गारंटी, मज़बूत सार्वजनिक सेवाएँ, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक समानता. लेकिन यह बजट उस दिशा में जाने के बजाय, नवउदारवादी नीतियों को और गहराता है.
नोट यह न्यूज़ केंद्रीय कमेटी, भाकपा(माले) लिबरेशन के वयान पर आधारित है .

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