माफियाओं को सत्ता का संरक्षण — अरुण यादव की कड़ी चेतावनी
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 11 दिसंबर 2025 — बिहार में खाद की कालाबाजारी एक बार फिर राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है.राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश प्रवक्ता अरुण कुमार यादव ने नीतीश-भाजपा सरकार पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि, खाद माफिया और जमाखोरों को सरकार व प्रशासन का खुला संरक्षण मिल रहा है.
राजद प्रवक्ता के अनुसार, रबी सीजन में किसानों की बढ़ती जरूरत का फायदा उठाते हुए खाद दुकानदारों और साहूकारों द्वारा खुलेआम महंगे दामों पर यूरिया और डीएपी की बिक्री किया जा रहा है.यादव ने दावा किया है कि इस अवैध खेल में प्रशासन, स्थानीय जनप्रतिनिधि और सत्ता पक्ष के लोग मिलीभगत से भूमिका निभा रहा हैं.
किसानों पर डाला जा रहा है आर्थिक बोझ – 1350 की जगह 2000 तक DAP, 267 की जगह 500 में यूरिया
यादव ने नवगछिया, खरीक, बिहपुर, नारायणपुर और आसपास के बाजारों का उदाहरण देते हुए कहा कि निर्धारित सरकारी मूल्य से अधिक कीमत वसूली अब सामान्य बात हो गया है.
डीएपी खाद (सरकारी कीमत 1350 रु.)
किसानों को 1800–2000 रु. में मिल रही है.
यूरिया की कीमत (सरकारी 267 रु.)
बाजार में 400–500 रु. ली जा रही है.
उन्होंने स्पष्ट कहा कि रबी सीजन में गेहूं, मक्का, केला और अन्य फसलों के लिए यह खाद किसानों की सबसे बड़ी आवश्यकता है. ऐसे समय में कृत्रिम संकट खड़ा कर किसानों से अधिक पैसा वसूलना शोषण और धोखाधड़ी के समान है.
शासन-प्रशासन की मिलीभगत, माफियाओं की बल्ले-बल्ले – राजद का आरोप
राजद प्रवक्ता ने कहा कि खाद की इस कालाबाजारी के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय पुलिस और प्रशासन माफिया के लिए ढाल का काम कर रहे हैं.उन्होंने आरोप लगाया कि,
दुकानदारों और जमाखोरों से मोती रकम की वसूली की जा रही है.
अवैध कारोबार करने वाले माफियाओं को नेटा-अफसरों का पूरा संरक्षण प्राप्त है.
किसान शिकायत करते हैं, लेकिन उन पर ही दबाव बनाया जाता है या शिकायत दर्ज नहीं होती.
उन्होंने आगे कहा कि जब शासन की प्राथमिकता ही किसानों को राहत देने के बजाय माफियाओं को बचाना हो जाए, तो गांव-गांव में संकट बढ़ना तय है.
सरकार किसानों का शोषण रोकने में असफल — राजद
यादव ने कहा कि बिहार में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का सबसे कमजोर स्तंभ किसान है.
ऐसे में सरकार द्वारा खाद की उपलब्धता सुनिश्चित न करना, और माफियाओं को रोकने में विफल रहना, किसानों के साथ सीधा विश्वासघात है.
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि,
सरकार किसानों का शोषण बंद करे, नहीं तो राजद सड़कों पर उतरकर संघर्ष करेगा.
उन्होंने माँग की कि,
खाद की कालाबाजारी में शामिल दुकानदारों और माफियाओं पर तुरंत कठोर कार्रवाई हो.
कालाबाजारी पर रोक लगाने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स गठित की जाए.
सभी जिलों में खाद के स्टॉक और बिक्री की जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए.
किसानों को नियमानुसार सही कीमत पर खाद उपलब्ध कराई जाए.
फील्ड रिपोर्ट्स प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोल रही हैं.
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार में खाद का संकट कृत्रिम रूप से पैदा किया गया है.
यदि डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम पारदर्शी हो और प्रशासन कड़ाई से मॉनिटरिंग करे तो न तो स्टॉक की कमी होगी और न ही किसानों को बेवजह पैसा लुटाना पड़ेगा.
लेकिन वर्तमान हालात बताते हैं कि,
गोदामों में पर्याप्त स्टॉक होते हुए भी बाजार में कमी का माहौल बनाया जा रहा है.
जमाखोरों को रात में ट्रकों से खाद ब्लैक मार्केट में भेजने की छूट है.
कई स्थानों पर व्यापारी कैश में 200–300 रुपये प्रति बोरी एक्स्ट्रा वसूल रहे हैं.
ऐसी स्थितियों में किसान दोहरी मार झेल रहे हैं.
एक तरफ महंगाई, दूसरी तरफ लूट.
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किसानों में बढ़ता आक्रोश – हमारी मेहनत की कीमत और भी बढ़ जाएगी
किसानों का कहना है कि खाद की ऊँची कीमत से उत्पादन लागत कई गुना बढ़ जाएगी. गेहूं, मक्का और सब्जियों की कीमतें आने वाले महीनों में और बढ़ेंगी.
एक किसान नेता ने बताया कि,
सरकार कहती है कि चिंता न करें, पर मैदान में पूरा खेल उल्टा चल रहा है.दुकानदार कहते हैं कि ऊपर तक सब सेट है.
निष्कर्ष: बिहार में खाद संकट का असली कारण कौन?
राजद ने जिस तरह से सीधे तौर पर सरकार पर उंगलियां उठाई हैं, उससे यह सवाल और तीखा हो गया है कि.
क्या बिहार में खाद की कमी वास्तव में है, या सुनियोजित कालाबाजारी?
क्या प्रशासन की सक्रियता कम है, या संरक्षण मिलने से माफिया बेखौफ हैं?
जवाब चाहे जो भी हो, इतना तय है कि,
बिहार के किसान परेशानी में हैं.
खाद की कीमतें नियंत्रण से बाहर हैं.
और सरकार के सामने यह एक बड़ा कृषि-संकट बनकर उभरा है.
राजद की चेतावनी के बाद अब नज़र इस बात पर है कि सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है.

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