लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने शोषितों के हक की लड़ाई लड़ी: राजद

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Ajit Kumar

बिहार
लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने शोषितों के हक की लड़ाई लड़ी: राजद

लालू-तेजस्वी पर राजद का बयान, रामविलास पासवान के सम्मान का मुद्दा

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 15 फरवरी 2026: बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय और दलित-वंचित वर्गों के अधिकारों को लेकर एक बार फिर बयानबाज़ी तेज हो गई है.राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद ने कहा है कि पार्टी ने हमेशा से शोषितों, वंचितों और दलित समाज के सम्मान, हक और अधिकार की लड़ाई लड़ी है. उन्होंने दावा किया है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कठिन समय में स्वर्गीय रामविलास पासवान के परिवार का साथ देकर सामाजिक न्याय की राजनीति का उदाहरण प्रस्तुत किया है.

सामाजिक न्याय की राजनीति और राजद का दावा

एजाज अहमद ने कहा कि राजद का इतिहास ही सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़ा रहा है. उन्होंने कहा कि पार्टी ने हमेशा उन वर्गों की आवाज़ उठाई है, जिन्हें लंबे समय तक सत्ता और व्यवस्था में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला. उनका कहना है कि लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में सामाजिक न्याय की विचारधारा को मजबूत आधार मिला, जिसका असर आज भी बिहार की राजनीति में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.

राजद प्रवक्ता के अनुसार, जब लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के पास एक भी विधायक नहीं था और रामविलास पासवान हाजीपुर लोकसभा चुनाव में पराजित हो गए थे, तब लालू प्रसाद यादव ने अपने कोटे से उन्हें राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया.इसे उन्होंने राजनीतिक सहयोग नहीं बल्कि सामाजिक सम्मान और
वैचारिक एकजुटता का प्रतीक बताया.

12 जनपथ विवाद और सम्मान का सवाल

एजाज अहमद ने आरोप लगाया कि रामविलास पासवान के निधन के बाद केंद्र की भाजपा-नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने दिल्ली स्थित उनके आवास 12 जनपथ को खाली करवाया.उन्होंने दावा किया कि इस दौरान उनके आदमकद प्रतिमा और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के चित्रों के साथ अपमानजनक व्यवहार हुआ और सामानों को सड़क पर फेंका गया.

राजद प्रवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि उस समय दिल्ली पुलिस द्वारा किए गए व्यवहार ने दलित समाज की भावनाओं को आहत किया था. उनका कहना है कि उस कठिन परिस्थिति में लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने आगे आकर रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान और उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की और हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया.

राजनीतिक समीकरण और आरोप-प्रत्यारोप

राजद की ओर से यह भी कहा गया कि आज बदलते राजनीतिक समीकरणों में चिराग पासवान द्वारा पुतला दहन कार्यक्रम आयोजित करना समझ से परे है.एजाज अहमद ने आरोप लगाया कि भाजपा को खुश रखने और एनडीए में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए ही इस तरह के कार्यक्रम किए जा रहा हैं.

उन्होंने सवाल उठाया कि जिस अपमान के समय चिराग पासवान की आंखों में आंसू थे और उस समय जब कोई साथ देने को तैयार नहीं था, तब लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने ही उन्हें राजनीतिक और नैतिक समर्थन दिया था.ऐसे में अब उन लोगों के खिलाफ कार्यक्रम करना, जिन्होंने कठिन समय में साथ दिया, दलित और वंचित समाज के बीच सवाल खड़ा करता है.

दलित-वंचित समाज की भावनाओं का मुद्दा

राजद प्रवक्ता ने कहा कि दलित, शोषित और वंचित समाज आज भी यह सवाल पूछ रहा है कि आखिर राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के साथ रुख क्यों बदल गया. उनका कहना है कि सामाजिक न्याय की राजनीति केवल चुनावी रणनीति नहीं बल्कि एक वैचारिक प्रतिबद्धता होनी चाहिये.

उन्होंने यह भी कहा कि रामविलास पासवान की राजनीति हमेशा दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के लिए समर्पित रही। ऐसे में उनके सम्मान से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर नहीं तौलना चाहिए. राजद का दावा है कि वह आगे भी सामाजिक न्याय की इस परंपरा को जारी रखेगा.

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बिहार की राजनीति में संदेश

विश्लेषकों के अनुसार, यह बयानबाज़ी बिहार की आगामी राजनीतिक रणनीतियों का संकेत हो सकता है. सामाजिक न्याय, दलित सम्मान और पिछड़े वर्गों के अधिकार जैसे मुद्दे बिहार की राजनीति के केंद्र में हमेशा रहा हैं.राजद इन मुद्दों को फिर से उभारकर अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.

वहीं दूसरी ओर, चिराग पासवान और एनडीए के साथ उनके संबंधों को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं. राजद का यह बयान सीधे तौर पर उनके राजनीतिक रुख पर सवाल उठाता है और दलित राजनीति के नैतिक आधार पर बहस को फिर से जीवित करता है.

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, एजाज अहमद का बयान बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय बनाम राजनीतिक गठबंधन की बहस को फिर से केंद्र में ले आया है. राजद ने एक बार फिर यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसकी राजनीति का मूल आधार शोषित, वंचित और दलित समाज के सम्मान और अधिकारों की लड़ाई है. अब देखना यह होगा कि इस बयान का राजनीतिक प्रभाव क्या पड़ता है और दलित राजनीति के समीकरण किस दिशा में आगे बढ़ते हैं.

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