नेतृत्व की जवाबदेही और पार्टी की दिशा: क्या लालूवाद से दूर हो रही है राजनीति?
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,25 जनवरी बिहार की राजनीति में एक बार फिर लालू प्रसाद यादव की विचारधारा, जिसे लालूवाद के नाम से जाना जाता है, चर्चा के केंद्र में आ गई है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से जुड़ी रोहिणी आचार्य के हालिया बयान ने पार्टी के भीतर चल रही उथल-पुथल को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है.उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि जो भी सच्चा लालूवादी होगा, वह पार्टी की मौजूदा बदहाली के लिए जिम्मेदार लोगों से सवाल जरूर करेगा. यह बयान न सिर्फ पार्टी नेतृत्व पर सीधा प्रहार माना जा रहा है, बल्कि राजद की वैचारिक दिशा पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है.
लालूवाद की मूल भावना और संघर्ष की विरासत
रोहिणी आचार्य ने अपने बयान में लालू प्रसाद यादव की उस राजनीतिक विरासत को याद किया, जो हाशिए पर खड़े समाज, वंचितों और कमजोर तबकों के अधिकारों की लड़ाई के लिए जानी जाती है.उनके मुताबिक, लालू जी ने सामाजिक-आर्थिक न्याय के लिए जिस निःस्वार्थ संघर्ष की नींव रखी, उसी ने पार्टी को जन-जन की आवाज बनाया.
उनका कहना है कि लालूवाद केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि सम्मान, बराबरी और हक-हकूक की लड़ाई का प्रतीक है. इसलिए जो लोग इस विचारधारा से जुड़ा हैं, उनका कर्तव्य बनता है कि वे पार्टी की मौजूदा स्थिति पर चुप न रहें.
पार्टी की मौजूदा स्थिति पर तीखी चिंता
अपने बयान में रोहिणी आचार्य ने वर्तमान हालात को कड़वी, चिंताजनक और दुखद सच्चाई बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि आज जिस पार्टी को जनता के अधिकारों की लड़ाई के लिए जाना जाता था, उसकी असली कमान ऐसे लोगों के हाथों में चली गई है जो लालूवाद को कमजोर करने के इरादे से भीतर भेजा गया हैं.
उनके अनुसार, ये कथित घुसपैठिए और साजिशकर्ता न सिर्फ पार्टी पर कब्जा जमाए बैठे हैं, बल्कि अपने मकसद में काफी हद तक सफल भी दिखाई दे रहे हैं.यह आरोप पार्टी के भीतर गहरी दरार और अविश्वास को उजागर करता है.
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नेतृत्व की भूमिका और जवाबदेही पर सवाल
रोहिणी आचार्य ने सबसे तीखा हमला पार्टी के मौजूदा नेतृत्व पर किया. उन्होंने कहा कि नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल रहे लोगों को सवालों से भागने या भ्रम फैलाने के बजाय तथ्यात्मक और तार्किक जवाब देने चाहिये.
उनका आरोप है कि लालूवाद और पार्टी हित की बात करने वालों के साथ दुर्व्यवहार, अभद्र आचरण और अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया जा रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि अगर नेतृत्व सवालों पर चुप्पी साधता है, तो यह अपने-आप में साजिश रचने वाले गिरोह से मिलीभगत का संकेत माना जाएगा.
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राजनीतिक संकेत और आगे की राह
रोहिणी आचार्य का यह बयान केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य को लेकर एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है.यह सवाल उठता है कि क्या राजद अपनी मूल विचारधारा की ओर लौटेगी या आंतरिक संघर्ष और आरोप-प्रत्यारोप उसे और कमजोर करेंगे.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयान पार्टी नेतृत्व पर दबाव बढ़ाते हैं और आने वाले समय में संगठनात्मक बदलाव या वैचारिक मंथन की मांग को तेज कर सकते हैं. लालूवाद की राजनीति हमेशा से संघर्ष और सवाल पूछने की रही है, ऐसे में यह देखना अहम होगा कि पार्टी इन सवालों का सामना कैसे करती है.
न्यूज़ स्रोत :रोहिणी आचार्य के ट्विटर पोस्ट में दिए गए बयान के आधार पर.

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