जंतर मंतर पर महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन में उमड़ा जनसैलाब

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Ajit Kumar

भारतबिहार
12 फरवरी 2026 को जंतर मंतर, नई दिल्ली में महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन के दौरान चंद्रशेखर आजाद और हजारों समर्थक BT Act रद्द करने की मांग करते हुए

महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन: 12 फरवरी 2026 को जंतर मंतर से उठी नई ऊर्जा

तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली, 12 फरवर — भारत की धार्मिक और सामाजिक चेतना में महाबोधि महाविहार का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है. बिहार के बोधगया स्थित यह वही पवित्र स्थल है जहां गौतम बुद्ध ने बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया था. 12 फरवरी 2026 को दिल्ली के जंतर मंतर पर आयोजित महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन ने इस ऐतिहासिक स्थल के प्रबंधन को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया है.

इस प्रदर्शन में नगीना सांसद और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद की भागीदारी ने आंदोलन को नई ऊर्जा दी है.हजारों की संख्या में बौद्ध अनुयायी, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि जंतर मंतर पर एकत्र हुए और BT Act 1949 को रद्द करने की मांग को दोहराया है.

महाबोधि महाविहार का ऐतिहासिक महत्व

महाबोधि महाविहार केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि विश्व बौद्ध समुदाय की आस्था का केंद्र है.गौतम बुद्ध ने यहीं ज्ञान प्राप्त किया था. सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व यहां मंदिर और वज्रासन का निर्माण करवाया. बाद में गुप्त और पाल शासकों के काल में इसका विस्तार हुआ था .

आज यह स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और विश्वभर से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं . इसकी वास्तुकला, 55 मीटर ऊंचा केंद्रीय शिखर और ऐतिहासिक महत्व इसे विशिष्ट बनाता हैं.

BT Act 1949 क्या है और विवाद क्यों?

1949 में पारित Bodh Gaya Temple Act के तहत मंदिर के प्रबंधन के लिए Bodh Gaya Temple Management Committee (BTMC) का गठन किया गया.इस समिति में चार हिंदू और चार बौद्ध सदस्य होते हैं, जबकि अध्यक्ष गया जिले के जिलाधिकारी होता हैं.

आंदोलनकारी बौद्ध संगठनों का मानना है कि यह व्यवस्था पूर्ण धार्मिक स्वायत्तता प्रदान नहीं करता है. उनका तर्क है कि चूंकि यह स्थल बौद्ध धर्म का सर्वोच्च तीर्थ है, इसलिए इसका पूर्ण प्रबंधन बौद्ध समुदाय के हाथों में होना चाहिये.

इसी मांग को लेकर समय-समय पर प्रदर्शन होते रहा हैं.1891 में अनागारिका धम्मपाल द्वारा शुरू किया गया आंदोलन हो या 2013 के बाद तेज हुई मांग,यह मुद्दा लगातार चर्चा में रहा है.

12 फरवरी 2026: जंतर मंतर का प्रदर्शन

दिल्ली के जंतर मंतर पर 12 फरवरी 2026 को आयोजित प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुये. प्रदर्शनकारियों ने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें रखीं और BT Act को रद्द करने का आह्वान किया.

चंद्रशेखर आजाद की उपस्थिति इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रही. उन्होंने अपने संबोधन में इसे संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक समानता से जुड़ा मुद्दा बताया.उनके भाषण के दौरान जय भीम और जय संविधान के नारे गूंजते रहे.

आंदोलन के संयोजकों ने इसे लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का प्रयास बताया और कहा कि यह संघर्ष किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि अधिकारों की स्पष्टता और प्रबंधन संरचना में बदलाव की मांग है.

सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ

महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन केवल धार्मिक प्रबंधन का प्रश्न नहीं है. इसे कई लोग सामाजिक न्याय और समानता के व्यापक विमर्श से जोड़कर देखते हैं.

डॉ. भीमराव अंबेडकर के 1956 के बौद्ध दीक्षा आंदोलन के बाद से भारत में बौद्ध पहचान और अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ी है. ऐसे में यह मुद्दा दलित-बौद्ध समुदायों के आत्मसम्मान से भी जुड़ता है.

राजनीतिक रूप से भी यह विषय महत्वपूर्ण है, क्योंकि विभिन्न दल और संगठन इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते हैं.हालांकि, अब तक सरकार की ओर से BT Act में किसी बड़े संशोधन की घोषणा नहीं हुई है.

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आंदोलन का संदेश और आगे की राह

जंतर मंतर का यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा और लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर अपनी मांग रखने का उदाहरण बना. आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि उनकी मांगों पर विचार नहीं किया गया, तो भविष्य में बड़े स्तर पर संवाद और प्रदर्शन की योजना बनाई जाएगी.

विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय पर सभी पक्षों के बीच संवाद की आवश्यकता है, ताकि धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक परंपरा और संवैधानिक प्रावधानों के बीच संतुलन स्थापित हो सके.

महाबोधि महाविहार भारत की बहुलतावादी संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है.इसलिए इससे जुड़ा कोई भी निर्णय व्यापक सहमति और संवेदनशील दृष्टिकोण के साथ लिया जाना आवश्यक है.

निष्कर्ष

महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन ने एक बार फिर यह दिखाया कि भारत में धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता और भागीदारी निरंतर बनी हुई है.12 फरवरी 2026 का जंतर मंतर प्रदर्शन इस बहस को राष्ट्रीय विमर्श में लाने का महत्वपूर्ण क्षण साबित हुआ.

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और संबंधित पक्ष इस मांग पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देते हैं.फिलहाल, यह आंदोलन संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वायत्तता और सामाजिक न्याय की चर्चा को आगे बढ़ा रहा है.

समाचार स्रोत:यह जानकारी आंदोलन स्थल से प्राप्त प्रत्यक्ष विवरण, आयोजकों के बयान और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है.

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