बालू माफिया के इशारे पर कार्रवाई का आरोप, मजदूरों और पर्यावरण के पक्ष में आवाज़ उठाने पर गिरफ्तारी
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 6 फरवरी— बिहार में बालू खनन को लेकर लंबे समय से विवाद, संघर्ष और आंदोलनों का सिलसिला चलता आ रहा है. बालू माफिया, प्रशासनिक संरक्षण और आम जनता के जीवन पर पड़ते दुष्परिणाम,ये सभी मुद्दे समय-समय पर सुर्खियों में बना रहा है.इसी कड़ी में भोजपुर जिले से भाकपा(माले) के युवा नेता और जिला कमेटी सदस्य कामरेड सुधीर कुमार की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बिहार में जनपक्षधर आवाज़ों के लिए लोकतांत्रिक स्पेस लगातार संकुचित किया जा रहा है?
गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि
पटना में 6 फरवरी 2026 को जारी प्रेस बयान में भाकपा(माले) के राज्य सचिव कुणाल ने कामरेड सुधीर कुमार की गिरफ्तारी को अत्यंत निंदनीय करार दिया है.उनका कहना है कि यह गिरफ्तारी कानून-व्यवस्था के नाम पर नहीं, बल्कि बालू माफिया के इशारे पर किया गया कार्रवाई है.
भोजपुर जिले में बालू खनन से जुड़े मजदूर और स्थानीय ग्रामीण लंबे समय से अपनी समस्याओं को लेकर संघर्षरत हैं. अवैध और अंधाधुंध मशीनी खनन के कारण नदियों का जलस्तर गिरता जा रहा है, भूजल संकट गहराता जा रहा है और पर्यावरणीय संतुलन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.
बालू खनन, मजदूर और आजीविका का संकट
बालू खनन से जुड़े हजारों मजदूरों की आजीविका इस क्षेत्र पर निर्भर रहता है.जब मशीनी खनन को बढ़ावा मिलता है, तो पारंपरिक मजदूरों का रोजगार छिन जाता है. दूसरी ओर, बालू माफिया भारी मुनाफा कमाता है, जबकि मजदूर बेरोजगारी और भूख के कगार पर पहुंच जाता हैं.
कामरेड सुधीर कुमार इन्हीं मजदूरों और प्रभावित ग्रामीणों की आवाज़ को संगठित कर रहे थे. वे जल संकट, पर्यावरणीय विनाश और स्थानीय लोगों के अधिकारों को लेकर प्रशासन से जवाब मांग रहा था.लेकिन सरकार ने समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय आंदोलनकारी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना बना चूका है. .
सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल
भाकपा(माले) का आरोप है कि एनडीए सरकार जनहित के मुद्दों पर संवेदनशील होने के बजाय दमनकारी रवैया अपना रहा है. जब कोई जनपक्षधर कार्यकर्ता मजदूरों और पर्यावरण के पक्ष में खड़ा होता है, तो उस पर मुकदमे लाददिया जाता है या उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है.
यह स्थिति यह दर्शाता है कि सरकार की प्राथमिकता आम जनता नहीं, बल्कि वे ताकतें हैं जो प्राकृतिक संसाधनों की लूट से लाभ कमा रहा हैं. बालू माफिया के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने के बजाय, उनकी आलोचना करने वालों को जेल भेजना लोकतंत्र के मूल्यों पर सीधा हमला है.
लोकतंत्र और जनसंघर्ष पर हमला
कुणाल ने अपने बयान में स्पष्ट कहा है कि यह तानाशाही दमन संघर्ष की आवाज़ को दबा नहीं सकता.इतिहास गवाह है कि जब-जब जन आंदोलनों को कुचलने की कोशिश की गई है, तब-तब संघर्ष और अधिक मजबूत होकर उभरा है.
कामरेड सुधीर कुमार की गिरफ्तारी सिर्फ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतीक है जो सवाल पूछने वालों को अपराधी मानता है.लोकतंत्र में असहमति और विरोध कोई अपराध नहीं, बल्कि एक अधिकार है.
पर्यावरणीय संकट की अनदेखी
अंधाधुंध बालू खनन से नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है.इससे न केवल जल संकट पैदा हो रहा है, बल्कि खेती, पशुपालन और पीने के पानी पर भी गंभीर असर पड़ रहा है.स्थानीय लोग इस तबाही के खिलाफ आवाज़ उठा रहा हैं, लेकिन उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की जा रहा है.
कामरेड सुधीर कुमार जैसे नेता पर्यावरण और जनता के हित में खड़े होकर सरकार को आईना दिखा रहा था, जो शायद सत्ता को रास नहीं आया है.
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माले की मांग और जनता से अपील
भाकपा(माले) ने स्पष्ट शब्दों में कामरेड सुधीर कुमार की तत्काल और बिना शर्त रिहाई की मांग किया है. पार्टी का कहना है कि अगर सरकार सच में कानून और न्याय की बात करता है, तो उसे बालू माफिया पर कार्रवाई करना चाहिए, न कि जनसंघर्ष के नेताओं पर.
साथ ही, माले ने आम जनता, मजदूर संगठनों और लोकतांत्रिक शक्तियों से अपील किया है कि वे इस दमन के खिलाफ आवाज़ उठाएं और संघर्ष को मजबूत करें.
निष्कर्ष
कामरेड सुधीर कुमार की गिरफ्तारी बिहार की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है. यह घटना बताता है कि कैसे जनहित, पर्यावरण और मजदूरों के मुद्दे सत्ता के लिए असुविधाजनक बनते जा रहा हैं.
लेकिन इतिहास यह भी सिखाता है कि दमन से आंदोलन खत्म नहीं होता. जनसंघर्ष की आवाज़ को जेल की दीवारों में कैद नहीं किया जा सकता. कामरेड सुधीर कुमार की रिहाई की मांग सिर्फ एक पार्टी की नहीं, बल्कि हर उस नागरिक की मांग है जो लोकतंत्र, पर्यावरण और सामाजिक न्याय में विश्वास रखता है.

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