विकास से ध्यान हटाने की राजनीति या इतिहास मिटाने की कोशिश
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,13 दिसंबर 2025 भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है. इस बार मुद्दा योजना के दायरे या बजट का नहीं, बल्कि उसके नाम को बदलने की मानसिकता को लेकर है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने मनरेगा के नाम से महात्मा गांधी हटाकर पूज्य बापू जोड़ने पर गंभीर सवाल खड़ा किया है . उनका कहना है कि यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि एक गहरी राजनीतिक और वैचारिक सोच को दर्शाता है .
महात्मा गांधी: नाम नहीं, वैश्विक पहचान
राजद प्रवक्ता ने स्पष्ट किया है कि महात्मा गांधी कोई सामान्य नाम नहीं है , बल्कि भारत की आत्मा और विश्व शांति का प्रतीक हैं . राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महात्मा गांधी को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं है. वे एक हैं और अद्वितीय हैं. इसके विपरीत, बापू शब्द का उपयोग कई संदर्भों में किया जाता रहा है, जिनमें कुछ बेहद विवादास्पद भी हैं.ऐसे में मनरेगा जैसी ऐतिहासिक योजना के नाम में यह बदलाव केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि भ्रम पैदा करने वाला कदम है.
क्या नाम बदलना ही उपलब्धि है?
चित्तरंजन गगन का आरोप है कि एनडीए सरकार के पास न कोई नया विजन है, न कोई नया मिशन है. बीते ग्यारह वर्षों में केंद्र सरकार एक भी ऐसी नई जनकल्याणकारी योजना शुरू नहीं कर सका है , जो मनरेगा जैसी व्यापक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव वाली हो. इसके बजाय यूपीए सरकार के कार्यकाल में शुरू की गई 32 से अधिक योजनाओं के नाम बदलकर उन्हें अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है.
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब योजना का स्वरूप, उद्देश्य और आधार वही है, तो केवल नाम बदलने से क्या सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है?
जिसे विफल कहा, आज उसी का श्रेय
राजद प्रवक्ता ने याद दिलाया कि यही मनरेगा कभी एनडीए नेताओं द्वारा यूपीए सरकार की विफलता का जीता-जागता स्मारक कहा जाता था. आज वही लोग इस योजना को अपनी सफलता का प्रतीक बताने में लगे हैं.यह राजनीतिक अवसरवादिता नहीं तो और क्या है?
मनरेगा की शुरुआत यूपीए सरकार के दौरान राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के सुझाव, यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी, तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. डॉ. मनमोहन सिंह की सहमति और ग्रामीण विकास मंत्री स्व. डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह के प्रयासों से हुई थी. इसका उद्देश्य ग्रामीण गरीबों को सम्मानजनक रोजगार और आर्थिक सुरक्षा देना था.
सुधार की जरूरत थी, नाम बदलने की नहीं
राजद का स्पष्ट मत है कि मनरेगा में नाम बदलने के बजाय व्यवहारिक सुधार किए जाने चाहिए थे. बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव लगातार यह मांग करते रहे हैं कि मनरेगा को कृषि कार्यों से जोड़ा जाए. इससे किसानों को सरकारी खर्च पर मजदूर मिलेंगे और मजदूरों को निरंतर रोजगार सुनिश्चित होगा. यह एक दूरदर्शी और व्यावहारिक सुझाव है, जिसे नजरअंदाज किया गया है.
मनरेगा को कमजोर करने के आरोप
राजद प्रवक्ता ने केंद्र सरकार पर मनरेगा को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने का आरोप लगाया है.
काम करने के बाद भी मजदूरी का भुगतान एक-एक साल तक लंबित रहता है.
बड़े पैमाने पर फर्जी भुगतान की शिकायतें सामने आ रही हैं.
योजना का मूल स्वरूप मांग आधारित था, लेकिन अब छह महीने तक केवल 60 प्रतिशत आवंटन की सीमा तय कर दी गई है.
यूपीए सरकार के समय तय की गई मजदूरी दर में आज तक एक पैसा भी बढ़ोतरी नहीं की गई है.
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100 से 125 दिन का दावा: हकीकत क्या?
एनडीए सरकार द्वारा न्यूनतम कार्यदिवस 100 से बढ़ाकर 125 करने की बात कही जा रही है, लेकिन जब जमीनी हकीकत यह है कि मजदूरों को 100 दिन का काम भी नहीं मिल रहा, तो यह घोषणा केवल आंखों में धूल झोंकने के समान है.संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करते हुए मजदूरों को उनका हक नहीं दिया जा रहा.
निष्कर्ष
मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की जीवनरेखा है. उसके नाम के साथ छेड़छाड़ करना, असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है.सवाल नाम का नहीं, नियत और नीति का है.अगर सरकार सच में महात्मा गांधी के विचारों का सम्मान करती है, तो उसे योजना को मजबूत करना चाहिए, मजदूरों को समय पर भुगतान देना चाहिए और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संबल देना चाहिए.
नाम बदलने से इतिहास नहीं बदलता, लेकिन काम करने से वर्तमान और भविष्य दोनों बदलते हैं.

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